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तृप्ति

चहुँ ओर उलझा कटा-पिटा सत्य

कितना आसान है हर किसी का

स्वयं को क्षमा कर देना

हो चाहे जीवन की डूबती संध्या

आन्तरिक द्वंद्व और आंदोलन

मानसिक सरहदें लाँघते अशक्ति, विरोध

स्वयं से टकराहट

व्यक्तित्व .. यंत्रबद्ध खंड-खंड

जब देखो जहाँ देखो हर किसी में

पलायन की ही प्रवृत्ति

एक रिश्ते से दूसरे ...

एक कदम इस नाव

एक ... उस नाव

कल्पना-जाल ही तो है

यह आज की ईमानदारी

कोई कहे इसको प्रगतिशीलता

कोई कहे समाई है इसी में

मानव-मुक्ति

नहीं ज़रूरत है मुझको

ऐसी मानव-मुक्ति की

ऐसे पलायन की

ज़रूरत है मुझको

तृप्ति की, केवल तृप्ति की

इस सबसे कहीं दूर ...

आओ प्रिय, सुनो गुनगुनाहट

दे दो हाथ, बाहों में बाहें डाल

एक ही नाव में चलें हम दोनो

इसी क्षण, आँखें बंद

एक संग  "उस"  पार

आओ, पा लें हम अपनापन

उफ़ ! छा गया घना अँधेरा 

नदी के पानी पर भी है

अब बेमाप चादर काली

जल टूट रहा है ... और

प्रिय, कहाँ हो तुम ?

तृप्ति ...

मेरी तृप्ति

अपनी-सी धड़कन

कहाँ हो तुम ?

           ------

--  विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on March 23, 2020 at 11:30am

प्रिय मित्र लक्ष्मण जी, सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 21, 2020 at 10:53am

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन । अच्छी कविता हुई है। हार्दिक बधाई ।

Comment by vijay nikore on March 21, 2020 at 9:34am

प्रिय भाई समर कबीर जी, सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार। आपसे जब कुछ सीखने को मिलता है तो और भी अच्छा लगता है।

मैं ग़लती को सही कर दूँगा।

Comment by Samar kabeer on March 19, 2020 at 6:07pm

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब, बहुत उम्द: रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'स्वयं को माफ़ कर देना'

इस पंक्ति में 'माफ़' को "मुआफ़" कर लें ।

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