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गाँव के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

गाँव के दोहे

संगत में जब से पड़ा, सभ्य नगर की गाँव
अपना घर वो त्याग कर, चला गैर के ठाँव।१।
***
मिलना जुलना बतकही, पनघट पर थी खूब
सब  अपनापन  मर  गया, मोबाइल  में  डूब।२।
***
बिछी सड़क कंक्रीट की, झुलसे जिसमें पाँव
पीपल कटकर गुम हुये, कौन करे फिर छाँव।३।
**
सेज माल  के  वास्ते, कटे  खेत  खलिहान
जिससे लोगों मिट गयी, गाँवों की पहचान।४।
**
सड़क योजना खा गयी, पगडंडी हर ओर
पहले सी होती  नहीं, अब  गाँवों  की भोर।५।
**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2019 at 11:19am

आ. भाई विजय जी, दोहों पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 9, 2019 at 9:21pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी , दोहे बहुत ही सटीक हैं , मोबाइल वाला भी , अब संबंधों का नहीं सिर्फ सूचना का युग है , आदमी आदमी को सूचना देता है , संवेदना- शून्य होकर। बधाई इस प्रस्तुति हेतु , सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 9, 2019 at 11:23am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से मन आस्वस्थ हुआ । दोहों का मान बढ़ाने के लिए आभार।

Comment by Samar kabeer on August 8, 2019 at 3:38pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,गाँव का दर्द समेटे अच्छे दोहे लिखे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 7, 2019 at 4:51pm

आ भाई विजय जी, सादर आभार।

Comment by vijay nikore on August 7, 2019 at 10:04am

आपने दोहे बहुत अच्छे लिखे हैं। बधाई, आदार्णीय लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 7, 2019 at 5:25am

आ.सीएम उपाध्याय जी, सादर अभिवादन।दोहों की प्रशंशा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 7, 2019 at 5:23am

आ. भाई प्रदीप जी, सादर अभिवादन।दोहों पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 6, 2019 at 7:06pm

 लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी,
कथ्य और शिल्प  दोनों दृष्टि से बेजोड़ दोहों के लिए हार्दिक बधाई | 

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 6, 2019 at 4:49pm

उत्तम दोहे बधाई धामी जी

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