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ग़ज़ल: जैसे जैसे ही ग़ज़ल रुदाद ए कहानी पड़ेगी

2122 1122 2112 2122

जैसे जैसे ही ग़ज़ल रूदाद ए कहानी पड़ेगी

वैसे वैसे ही सनम दिल की फज़ा धानी पड़ेगी

रश्म हर दिल को महब्बत में ये उठानी पड़ेगी

दिल जलाकर भी कसम दिल से ही निभानी पड़ेगी

ख़ुश न होकर भी ख़ुशी दिल में है दिखानी पड़ेगी

कुछ न कहकर भी रज़ा दिल की यूँ सुनानी पड़ेगी

हुस्न वालो की सुनो ना ख़ुद पे भी इतना इतराओ

लम्हा दर लम्हा महंगी तुम्हें न'दानी…

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Added by Aazi Tamaam on April 7, 2021 at 3:00pm — 4 Comments

( बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे......(ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे

कल घाट मौत के यूँ उतारा गया मुझे (1)

मैं जा रहा था रूठ के लेकिन सदा न दी

था सामने खड़ा तो पुकारा गया मुझे (2)

मैं एक साँस में कभी बाहर न आ सकूँ

दरिया में और गहरे उतारा गया मुझे (3)

अक्सर यही हुआ है मैं जब भी दुरुस्त था

बिगड़ा नहीं था फिर भी सुधारा गया मुझे (4)

देता रहूँ सबूत मैं कब तक वज़ूद का

हर बार हर क़दम पे नक़ारा गया मुझे…

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Added by सालिक गणवीर on April 7, 2021 at 1:51pm — 9 Comments

हमने कहीं पे लौट आ बचपन क्या लिख दिया-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२



हमने कहीं पे लौट आ बचपन क्या लिख दिया

बोली जवानी क्रोध  में दुश्मन क्या लिख दिया।१।

*

घर के बड़े  भी  काट  के  पेड़ों  को  खुश हुए

बच्चों ने चौड़ा चाहिए आँगन क्या लिख दिया।२।

*

तस्कर तमाम  आ  गये  गुपचुप  से  मोल को

माटी को यार देश की चन्दन क्या लिख दिया।३।

*

आँखों से उस की धार  ये  रुकती नहीं है अब 

भाता है जब से आपने सावन क्या लिख दिया।४।

*

वो  सब  विहीन  रीड़  के  श्वानों  से  बन …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 7, 2021 at 1:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल-मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

121   22   121   22   121   22

अगर कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना

मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

बिना तुम्हारे  ये ज़िन्दगी अब  कटेगी कैसे

जो तू नहीं तो नफ़स की डोरी भी तोड़ देना

जरा  सी कोई  रहे  हरारत  न जान  बाकी

कि  जाते जाते  बदन  हमारा निचोड़ देना

कभी हमारे ग़मों पे तुझको दुलार आये

वहीं उसी पल कतार भावों की मोड़ देना

तेरे ग़मो का उसे न होगा पता, है मुमकिन

मगर सिरा 'ब्रज' उदासियों का न जोड़…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 7, 2021 at 10:30am — 11 Comments

ग़ज़ल

2122    1212    22/ 112

  

भारती धर्म  अपना क़द करे हैं !

माँ की खायी कसम न मद करे हैं !

तीरगी को हटाया जाँ हमी ने,

रघुवंशी  हम उजालों क़द  करे है !

मोमबत्ती भी जिनसे जल न सकी,

सूरज  होने का दावा ज़द करे  हैं !

जाने  क्या वो अँधेरों  के  हामी 

वरिष्ठों के है अदु वो हद करे  हैं !

सावन  अंधे जुड़ाव  हो  कैसे ?

है  रतौंधी  उन्हें  अहद  करे…

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Added by Chetan Prakash on April 7, 2021 at 9:30am — No Comments

ग़ज़ल: माँ

2212 2212 2222 2

मुझको तेरी आवाज़ से खुशबू आती है

तेरे हर इक अल्फाज़ से खुशबू आती है

आँचल से जैसे इत्र सा झरता रहता है…

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Added by Aazi Tamaam on April 7, 2021 at 8:00am — 4 Comments

मिर्च कोई आग पर बोता है क्या- ग़ज़ल

2122 2122 212

मिर्च कोई आग पर बोता है क्या,
लोन-पानी ज़ख्म को धोता है क्या।

हो रहा जो अब भले होता है क्या,
कोई अपने आप को खोता है क्या।

बेबसी को तू हटा औज़ार बन,
इसका दामन थाम कर रोता है क्या।

इश्क़ करता, सब्ज़ धरती देख ले,
बीज इसका तू कभी बोता है क्या।

'बाल' चुप्पी साध लेना जुर्म पर,
जुर्म से खुद कम कभी होता है क्या।

लोन-नमक

मौलिक अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on April 6, 2021 at 8:06pm — No Comments

गर तबीयत जाननी है देश की -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२



सादगी से  घर  सँभाला कीजिए

लालसा को मत उछाला कीजिए।१।

*

यह धरा  तो  रौंद  डाली  जालिमों

चाँद का मुँह अब न काला कीजिए।२।

*

करके सूरज से उधारी आब की

चाँद से कहते उजाला कीजिए।३।

*

जब नया देने की कुव्वत ही नहीं

मत फटे में  पाँव  डाला कीजिए।४।

*

गर तबीयत  जाननी  है  देश की

सबसे पहले ठीक आला कीजिए।५।

*

चाँद तारे सिर्फ महलों को न दो

झोपड़ी में भी उजाला कीजिए।६।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 6, 2021 at 6:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल: रोयेंगे और मुस्कुरायेंगे

2122 1212 22/112

रोयेंगे और मुस्कुरायेंगे

उम्र भर तुम को गुनगुनायेंगे

तुम जो रहते हो बादलों में सनम

तुम को हम कैसे भूल पायेंगे

जब भी देखेंगे आसमानों को

दिल के अरमाँ मचल ही जायेंगे

ग़म की आँधी न रोक पायेंगे

अश्क आँखों से बहते जायेंगे

कैसे रोकेंगे हसरतें दिल की

चीख कर तुम को फ़िर बुलायेंगे

जी न पायेंगे मर न पायेंगे

दिल जलायेंगे…

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Added by Aazi Tamaam on April 5, 2021 at 11:00am — No Comments

संवेदना--लघुकथा

उस उजाड़ से गांव में बस कुछ टूटीफूटी झोपड़ियां ही मौजूद थीं जो वहाँ के लोगों के आर्थिक दशा और सरकार के विकास के नारे की तल्ख सच्चाई बयान कर रही थीं. उसको थोड़ा अजीब लगा, उसने अपने स्टाफ की बात को गंभीरता से नहीं लिया था. दरअसल जब भी इस गांव के लोगों से वसूली की बात होती, स्टाफ मना कर देता कि वहाँ जाने से कोई फायदा नहीं होगा. "सर, वहाँ लोगों के पास अभी खाने को नहीं है, बैंक की किश्त कैसे चुकाएंगे", अक्सर उसे यही बात सुनने को मिलती थीं.

लेकिन उसे लगा कि शायद दूर होने और वहाँ पैदल जाने के…

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Added by विनय कुमार on April 4, 2021 at 4:30pm — 6 Comments

अच्छा महफ़िल में तमाशा बना मेरा कल शब

2122 1122 1122 22 /112

1

अच्छा महफ़िल में तमाशा बना मेरा कल शब

दिल मेरा तोड़ा गया कह के ख़िलौना कल शब

2

ज़ख़्मी दिल पर तेरा जब नाम उकेरा कल शब

हाय रब्बा मेरे तब होंठों से निकला कल शब

3

झूठ की सुब्ह तलक माँग है बाज़ारों में

और मैं एक भी सच बेच न पाया कल शब

4

मेरे हाथों की लकीरें भी बदल जाएँगी

ख़्वाब आँखों ने दिखाया मुझे ऐसा कल शब

5

उस तरफ़ चाँद सितारों की चमक थी "निर्मल"

इस तरफ़ था…

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Added by Rachna Bhatia on April 4, 2021 at 7:00am — No Comments

ग़ज़ल (किसी की याद में...)

1212 - 1122 - 1212 - (112 / 22) 

किसी की याद में ख़ुद को भुला के देखते हैं

निशान ज़ख्मों  के हम  मुस्कुरा के देखते हैं 

 

निकल तो आए हैं तूफ़ाँ की ज़द से दूर बहुत 

भँवर हैं कितने ही  जो सर उठा के देखते हैं 

चले भी आओ कि अब  इंतज़ार  होता नहीं 

कि अब ये रस्ते हमें  मुँह चिढ़ा के  देखते हैं  

ये ज़िन्दगी भी फ़ना कर दी हमने जिनके लिए 

वही  तो  हैं  जो   हमें  आज़मा के  देखते  हैं 

 

तेरी जफ़ा …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 3, 2021 at 6:11pm — 18 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : कर्तव्य (गणेश जी बाग़ी)

एक साल हो गया था माँ से मिले हुए। मिलने का बहुत मन हो रहा था। इसलिए वह होली के अवसर पर गाँव जाना चाहता था। किन्तु छुट्टी का आवेदन अस्वीकार कर दिया गया। घर पहुँचते ही वह सीधे बिस्तर पर गिर पड़ा और सामने दीवार पर लगी स्वर्गीय पिता की तस्वीर को एकटक देखते-देखते कब आँख लग गई, कब वह सपनों में गोते खाने लगा, पता ही न चला।

"बेटा बहुत परेशान लग रहे हो!"

"हाँ पापा, इस कोरोना के कारण माँ से मिले एक साल हो गया, छुट्टी मिल नहीं रही है। क्या नौकरी का मतलब यही होता है कि आदमी घर-परिवार से ही कट…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 3, 2021 at 3:30pm — 8 Comments

"ओ बी ओ" की ग्यारहवीं सालगिरह का तुहफ़ा

ग़ज़ल

22 22 22 22 22 2

जिसने देखा वो ये बोला ओबीओ

कोई नहीं है तेरे जैसा ओबीओ

जब तक ज़िंदा हूँ मैं साथ निभाऊँगा

है ये तुझ से मेरा वादा ओबीओ

'बाग़ी' जी के साथ सभी ने मिलजुल कर

नाज़ों से तुझको है पाला ओबीओ

दुनिया के कोने कोने में फैल गया

तू ने जो भी पाठ पढ़ाया ओबीओ

तेरा नाम शिखर पर दुनिया लिखती थी

मैंने कल शब ख़्वाब में देखा…

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Added by Samar kabeer on April 1, 2021 at 2:52pm — 18 Comments

ग़ज़ल

नहीं आती हिसाबों में सताती हैं तेरी यादें।

भला ये साथ कैसा जो बताती हैं तेरी यादें।'

.

संभालोगे कहां खुद को गिराने आ गये जब वो,

उठाना हाथ रोको जो सुनाती हैं तेरी यादें।

.

ऐ इंसाँ अब न इतना भी ज़माने का हो कर रहना,

ज़रा दिल झाँक देखा याद आती हैं तेरी यादें।

.

बनाई जिंदगी मेरी कहानी जो सुना देते,

अगर भटके सफ़र में क्यूँ जताती हैं तेरी यादें।

.

ये दिल चाहे कहूं कोई ग़ज़ल अब प्यार में तेरे,

मगर अंदर ही फिर क्यूँ ये दबाती…

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Added by मोहन बेगोवाल on April 1, 2021 at 2:00pm — No Comments

कोशिश करो ! आगे बढ़ो...

कोशिश करो   हिम्मत करो 

आगे    बढ़ो    बढ़ते    रहो   आगे बढ़ो... आगे बढ़ो... 

गिरने  के  डर  से मत रुको 

गिर जाओ तो फिर से उठो   आगे बढ़ो... आगे बढ़ो... 

मंज़िल तुम्हें  मिल  जाएगी

क़िस्मत भी ये खुल जाएगी  

मंज़िल के मिलने तक चलो

चलते    रहो    चलते   रहो   आगे बढ़ो... आगे बढ़ो... 

रुकने से कुछ हासिल नहीं

रुक जाए जो कामिल नहीं   

उठते  क़दम  पीछे  न  लो 

पूरा   करो   जो …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 1, 2021 at 8:26am — 2 Comments

ग़ज़ल (महबूब ज़िन्दगी)

2212 - 1212 -  2212 - 12 

.

मुश्किल सहीह ये फिर भी है महबूब ज़िन्दगी

रब  का हसीन  तुहफ़ा  है क्या  ख़ूब ज़िन्दगी

.

आजिज़  हैं  ज़िन्दगी  से जो वो भी  मुरीद हैं

तालिब  सभी  हैं  इसके  है  मतलूब ज़िन्दगी

.

हर  लम्हा  शादमाँ  है  तेरे  दम  से  दिल मेरा

जब  से  हुई  है  तुझसे  ये   मन्सूब   ज़िन्दगी

.

जिसने  नज़र  उठा  के  भी  देखा  नहीं  मुझे 

उस  पर  हुई   है   देखिए   मरग़ूब   ज़िन्दगी

.

लोगों के दिल…

Continue

Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on March 31, 2021 at 9:22am — 4 Comments

ग़ज़ल- ज़ार ज़ार रोते हैं

212 1222

1

ज़ार ज़ार रोते हैं

जब वो होश ख़ोते हैं

2

ख़्वान ए इश्क वाले ही

तो फ़कीर होते हैं

3

लोग क्यों अदावत में

हाथ खूँ से धोते हैं

4

डोरी में वो सांसों की

आरज़ू पिरोते हैं

5

चाहतों की गठरी सब

उम्र भर सँजोते हैं

6

क्यों अज़ीज़ अपने ही

अश्कों में डुबोते हैं

7

ख़्वाब देखने वाले

रात भर न सोते हैं

मौलिक व अप्रकाशित

रचना…

Continue

Added by Rachna Bhatia on March 30, 2021 at 8:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल (था नाम दिल पे नक़्श मिटाया नहीं गया)

221 2121 1221 212

था  नाम  दिल  पे   नक़्श  मिटाया  नहीं  गया

मुझसे   तुम्हारा    प्यार    भुलाया   नहीं  गया

कल  को   सँवारने   में    गई   बीत   ज़िन्दगी

जो  सामने  था   लुत्फ़    उठाया    नहीं  गया

कोशिश बहुत की, राज़-ए- मुहब्बत अयाँ न हो

अल्फ़ाज़    से   मगर   ये   छिपाया  नहीं  गया

बीवी  बहन  बहू   न     मिलेगी     कोई    तुम्हें

बेटी   को  कोख़   में   जो  बचाया   नहीं   गया

मंदिर  में  जाके  भोज …

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Added by नाथ सोनांचली on March 30, 2021 at 5:30pm — 3 Comments

ग़लत है मीर तो उस से भी कुछ सवाल करें

(१२१२ ११२२ १२१२ २२/११२ )
ग़लत है मीर तो उस से भी कुछ सवाल करें
न हैसियत न रसूखों का फिर ख़याल करें
**…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 30, 2021 at 1:30pm — No Comments

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