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ग़ज़ल (था नाम दिल पे नक़्श मिटाया नहीं गया)

221 2121 1221 212

था  नाम  दिल  पे   नक़्श  मिटाया  नहीं  गया
मुझसे   तुम्हारा    प्यार    भुलाया   नहीं  गया

कल  को   सँवारने   में    गई   बीत   ज़िन्दगी
जो  सामने  था   लुत्फ़    उठाया    नहीं  गया

कोशिश बहुत की, राज़-ए- मुहब्बत अयाँ न हो
अल्फ़ाज़    से   मगर   ये   छिपाया  नहीं  गया

बीवी  बहन  बहू   न     मिलेगी     कोई    तुम्हें
बेटी   को  कोख़   में   जो  बचाया   नहीं   गया

मंदिर  में  जाके  भोज  कराते  हो  किस   लिए
माँ  बाप  को  तो  तुमसे   खिलाया   नहीं  गया

पलको   से   रोकने  की   हुईं   कोशिशें    मगर
आसूँ  का  बोझ  दिल   से   उठाया   नहीं  गया

चहरे  को   रोज़   अपने    बदलता  रहूँ   जनाब
मुझको  हुनर   यही   तो   सिखाया   नहीं  गया

आती थीं  जिस  तरफ़  से  नज़र  ख़ूबियाँ  मेरी
क्यों उस तरफ़  से  मुझको   दिखाया  नहीं गया

मुश्किल  कहाँ  थे  वादे  मुहब्बत  के  'नाथ' पर
तुमसे    हमारा   साथ    निभाया    नहीं    गया

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Samar kabeer on April 3, 2021 at 7:43pm

जनाब नाथ सोनांचली जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

कुछ टंकण त्रुटियाँ सुधार लें ।

Comment by Aazi Tamaam on March 31, 2021 at 5:48pm

खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई आदरणीय नाथ जी

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on March 30, 2021 at 8:10pm

जनाब नाथ सोनांचली जी आदाब, बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है, शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। आठवाँ शे'र और मक़्ता ख़ास पसंद आया है। कुछ टंकण त्रुटियों की ओर आपका ध्यानाकर्षण चाहता हूँ- 'कोख़' से नुक़्ता हटा लीजिए, 'पलको' को 'पलकों', 'आसूँ' को 'आँसू' कर लें।  सादर। 

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