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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत '
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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

क़ीमत सनम ने प्यार की ऐसे वसूल की (३७ )

क़ीमत सनम ने प्यार की ऐसे वसूल की दे दी शब-ए-फ़िराक़ सज़ा एक भूल की **सरसब्ज़  हैं रक़ीब के घर में सभी शजर कामिल हुई न आरज़ू इस दिल के फूल की **रुसवाई के ख़याल को अब छोड़िये हुज़ूर बातों को अब न और ज़रूरत है तूल  की **इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई तो हरगिज़ न दीजिये सोचे  बिना ही आप की शर्तें क़ुबूल की **जो भी किया ख़ुदा अता हमको क़ुबूल है तेरी रज़ा की है नहीं ज़ुर्रत उदूल की **देखा है तोड़ते हुए जिनको सदा उसूल अक़्सर करें जनाब वो बातें उसूल की **क्यों दोस्ती की आप अदू से करें उमीद कांटे बिछाना राह में फ़ितरत बबूल की **सिखलाये…See More
yesterday
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post उम्र भर जो भी ग़रीबी के निशाँ देखेगा (३६)
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । मतले का भाव स्पष्ट नहीं,ग़ौर करें । ''जो फ़क़त हुस्न कि फिर शोला-रुख़ाँ* देखेगा" इस मिसरे को यूँ करना उचित होगा:- 'जो तेरे हुस्न को ऐ शोला…"
Mar 12
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

उम्र भर जो भी ग़रीबी के निशाँ देखेगा (३६)

उम्र भर जो भी ग़रीबी के निशाँ देखेगा कैसे मुमकिन है वो बाँहों में जहाँ देखेगा ** कितना बारूद भरा होगा बताना मुश्किल लफ्ज़ से कोई निकलता जो धुआँ देखेगा **दिल की रानाई का अंदाज़ा लगाए कैसे जो फ़क़त हुस्न कि फिर शोला-रुख़ाँ* देखेगा **दर्द महसूस भला ग़म का उसे हो क्यों कर ज़िंदगी भर जो कोई ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ* देखेगा **ज़ख़्म से ख़ून भी रिसता है कोई क्या जाने सिर्फ़ तस्वीर में जो नोक-ए-सिना* देखेगा **नौजवाँ आज परेशान वतन में कब तक हार कर बैठा हुआ कार-ए-जियाँ* देखेगा **कब तलक जिस्म शहीदों के फ़ना होंगे और मुल्क…See More
Mar 8
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत (३५)
"आपकी पुरखुलूस हौसला अफ़ज़ाई का दिल से शुक्रग़ुज़ार हूँ . नवाज़िश जनाब Hariom Shrivastava जी |"
Mar 8
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत (३५)
"आदरणीय Samar kabeer साहब | आदाब | आपकी क़ीमती दाद मेरे लिए वाइस-ए-फ़ख्र है मोहतरम | नवाज़िश-ओ-करम का दिल से शुक्रिया |"
Mar 8
Hariom Shrivastava commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत (३५)
"वाह,बहुत सुंदर ग़ज़ल कही आदरणीय गहलोत जी।"
Mar 7
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत (३५)
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।"
Mar 7
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post खिजाँ ने गुलशनों में दर्द यूँ बिखेरे हैं (३४ )
"आदरणीय Samar kabeer साहेब | आदाब ,आपकी हौसला आफ्जाई के लिए दिली शुक्रिया | आपने सही फ़रमाया दो बार बेच का प्रयोग मुझे भी खटक रहा था लेकिन कुछ सुझा नहीं | आपने समस्या हल कर दी | "
Mar 5
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post खिजाँ ने गुलशनों में दर्द यूँ बिखेरे हैं (३४ )
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'ज़मीर बेच के ईमान बेच देते हैं' इस मिसरे में 'बेच' शब्द दो बार खटकता है,आप चाहें तो यूँ कर सकते हैं:- 'यहाँ पे देखिये ईमान बेच…"
Mar 5
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post खिजाँ ने गुलशनों में दर्द यूँ बिखेरे हैं (३४ )
"आदरणीय सतविन्द्र कुमार राणा  जी , आपकी सुंदर प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन हुआ। हार्दिक आभार। "
Mar 5
सतविन्द्र कुमार राणा commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post खिजाँ ने गुलशनों में दर्द यूँ बिखेरे हैं (३४ )
"आदरणीय गहलोत जी सादर नमन! हार्दिक बधाई स्वीकारें!"
Mar 5
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत (३५)

मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत डरे फ़िराक़-ओ-ग़मों से उसको न इश्क़ फरमाने की ज़रूरत **सफ़र मुहब्बत की मंजिलों का हुज़ूर होता कभी न आसाँ यहाँ न साहिल का कुछ पता है न तय सफ़र की है कोई मुद्दत**न जाने कितने हैं इम्तिहाँ और क़दम क़दम पर बिछे हैं कांटे रह-ए-मुहब्बत पे है जो चलना तो दिल में रक्खें ज़रा सी हिम्मत **रक़ीब गर मिल गया कोई तो बढ़ेंगी दुश्वारियां सफ़र की दिखाई दरियादिली अगर तो बढ़ेगी चाहत की और दिक्कत **यहाँ समुन्दर में डूबने का बना रहेगा हमेशा ख़तरा न अपने हाथों में नाव अपनी न अपने…See More
Mar 5
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मुख़्तलिफ़ हमने यहाँ सोच के पहलू देखे (३३ )
"भाई बृजेश कुमार 'ब्रज' जी , हार्दिक आभार और अभिनंदन आपका।"
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मुख़्तलिफ़ हमने यहाँ सोच के पहलू देखे (३३ )
"बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..वाकई में बेमिसाल"
Mar 4
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Mar 4
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मुख़्तलिफ़ हमने यहाँ सोच के पहलू देखे (३३ )
"आदरणीय Samar kabeer साहेब आदाब | रचना की सराहना और हौसला आफ़जाई के लिए सादर आभार | आप द्वारा दिए गए सभी सुझाव निश्चित रूप से बहुत ही सुन्दर है | तदनुसार संशोधन कर रहा हूँ | "
Mar 3

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क़ीमत सनम ने प्यार की ऐसे वसूल की (३७ )

क़ीमत सनम ने प्यार की ऐसे वसूल की 

दे दी शब-ए-फ़िराक़ सज़ा एक भूल की 

**

सरसब्ज़  हैं रक़ीब के घर में सभी शजर 

कामिल हुई न आरज़ू इस दिल के फूल की 

**

रुसवाई के ख़याल को अब छोड़िये हुज़ूर 

बातों को अब न और ज़रूरत है तूल  की 

**

इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई तो हरगिज़ न दीजिये 

सोचे  बिना ही आप की शर्तें क़ुबूल…

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Posted on March 18, 2019 at 3:30pm

उम्र भर जो भी ग़रीबी के निशाँ देखेगा (३६)

उम्र भर जो भी ग़रीबी के निशाँ देखेगा 

कैसे मुमकिन है वो बाँहों में जहाँ देखेगा 

** 

कितना बारूद भरा होगा बताना मुश्किल 

लफ्ज़ से कोई निकलता जो धुआँ देखेगा 

**

दिल की रानाई का अंदाज़ा लगाए कैसे 

जो फ़क़त हुस्न कि फिर शोला-रुख़ाँ* देखेगा 

**

दर्द महसूस भला ग़म का उसे हो क्यों कर 

ज़िंदगी…

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Posted on March 8, 2019 at 1:00am — 1 Comment

मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत (३५)

मिला न जो हिज़्र इश्क़ में तो कहाँ मुक़म्मल हुई मुहब्बत 

डरे फ़िराक़-ओ-ग़मों से उसको न इश्क़ फरमाने की ज़रूरत 

**

सफ़र मुहब्बत की मंजिलों का हुज़ूर होता कभी न आसाँ 

यहाँ न साहिल का कुछ पता है न तय सफ़र की है कोई मुद्दत

**

न जाने कितने हैं इम्तिहाँ और क़दम क़दम पर बिछे हैं कांटे 

रह-ए-मुहब्बत पे है जो चलना तो दिल में रक्खें ज़रा सी हिम्मत 

**

रक़ीब गर मिल गया कोई तो बढ़ेंगी…

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Posted on March 5, 2019 at 10:30am — 4 Comments

खिजाँ ने गुलशनों में दर्द यूँ बिखेरे हैं (३४ )

खिजाँ ने गुलशनों में दर्द यूँ बिखेरे हैं 

चमन के बागबाँ के बच्चे आज भूखे हैं 

**

बहार तुझ पे है दारोमदार अब सारा 

कि फूल कितने चमन में ख़ुशी के खिलते हैं 

**

अजीब शय है तरक़्क़ी भी लोग जिस के लिए 

ज़मीर बेच के ईमान बेच देते हैं 

**

क़ुबूल कर ली खुदा ने हर इक दुआ जब भी 

दुआ में ग़ैर की खातिर ये हाथ उट्ठे…

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Posted on March 3, 2019 at 7:30pm — 4 Comments

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