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August 2018 Blog Posts

"ऊपरवाले, नीचेवाले" (लघुकथा)

"अब हमसें और न हो पेहे! दो-दो बोरे गेहूं तुम दोनों भाइयों और दो बोरे तुमाई बहना को भिजवा दये हते! अब मुंह फाड़के फिर आ गये गांव घूमवे के बहाने!"

"जे मत भूलो कि हमने अपने हिस्से के बड़े-बड़े बढ़िया खेत तुमें सस्ते में बेच दये हते! फसलों के ह़िस्से बिना मांगे हमें मिलते रहना चईये न! बड़े भाई हैं हम तुमाये; तुमाओ परिवार अकेले इते मजे करत रेहे का!"

"कौन ने कई हती कि अगल-बगल के शहरन में बस जाओ! पैसों से तो तुम औरन के मज़े हो रये हैं! हमारी मिहनत और हालात तुम कभऊं न समझ पेहो! सारी फसल तुम…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 26, 2018 at 12:00pm — 4 Comments

"वो रात फिर कभी नहीं आयेगी!" (लघुकथा)

भारी बारिश हो रही थी। बगीचे की टीन-शेड के नीचे बच्चे भीगे मौसम के साथ झूले के मज़े ले रहे थे। गरम पकोड़ों का लुत्फ़ लेते हुए उनके अब्बूजान अपने पुराने से अज़ीज़ ट्रांजिस्टर पर मुल्क की चुनावी राजनीतिक हलचलों, बाढ़ों के क़हर और तबाहियों के गरम समाचार सुन रहे थे । बच्चों की अम्मीजान भी समाचारों को झेल रहीं थीं। तभी बड़ी बेटी बोली - "अब्बू! ख़ुदा न करे! अगर नेताओं और अंग्रेज़ों के 'रिमोट कंट्रोल' से '1947 की रात' जबरन दुबारा रिपीट की गई और मुसलमानों को अलग किसी हिस्से में हांका गया, तो आप कहां तशरीफ़ ले…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 26, 2018 at 5:00am — 4 Comments

एक रंग है खून

हिन्दू - मुस्लिम का कहें, एक रंग है खून.

हिन्दू हिन्दू में फरक, क्यों करता कानून.

सबके दो हैं हाथ, पाँव भी सबके दो हैं.

नाक सभी के एक, सूँघते जिससे वो हैं.

नयन जिसे भी मिले,जगत के दर्शन करता.

कान और मुँह से, सुनता - वर्णन करता.

सात दिन मिले सभी को, हफ्ते में एक समान.

विद्यालय में गुरु सभी को, देता ज्ञान समान.

अन्न नहीं करता देने में, ताकत कोई भेद.

मनु के पुत्र सभी मनुष्य हैं, कहते सारे वेद.

सूरज सबके लिए चमकता, सबको राह दिखाता.

श्वांस सभी पवन से…

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on August 26, 2018 at 1:45am — 5 Comments

जिसे भी दिल मे बसाया वो चीर कर के गया--

1212 1122 1212 112

मैं किसका नाम गिनाऊँ जो पीर भर केे गया
जिसे भी दिल मे बसाया वो चीर कर के गया
किसी दीवार पे टाँगा हुआ आईना हूँ
निगाह जिसने मिलाई वही सँवर के गया
मेरी कथा भी किसी फल भरे शजर सी है
उसी ने चोट दी जो छाँव मेंं ठहर के गया
भला क्यूँ जाग रहा हूँ मैं रोज़ रातों से
न पूछियेगा कभी कौन नींद हर के गया
ग़ुरूर क्यूँ न करे खुद पे जबकि पंकज से
मिला है जो भी…
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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 26, 2018 at 1:00am — 15 Comments

ग़ज़ल (हर धड़कन पर इक आहट)

हर धड़कन पर इक आहट,
सोचूँ तो हो घबराहट..

यारों उससे पूंछो तो,
क्यूँ है मुझसे उकताहट..

लहजा उसका है शीरीं,
आँखें उसकी कड़वाहट..

मुझसे इतनी दूरी क्यूँ,
हर लम्हा है झुंझलाहट..

उससे हाले दिल कह कर,
देखी उसकी तिर्याहट..!!

मौलिक एवं अप्रकाशित।

Added by Zohaib Ambar on August 25, 2018 at 8:31pm — 3 Comments

तृप्ति ....

तृप्ति ....

मेरा कहाँ था
वो पल
जो बीत गया
वक्त के साथ
तुम्हारा आकर्षण भी
रीत गया
यादों के धागों पर
मिलते रहे
अतृप्त तृप्ति की
अव्यक्त अभियक्ति के साथ
कहीं तुम
कहीं हम

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 25, 2018 at 1:20pm — 5 Comments

अनुसरण- लघुकथा –

अनुसरण- लघुकथा –

माँ भारती अपनी संध्याकालीन पूजा अर्चना से निवृत होकर जैसे ही प्रांगण में आयीं। उन्होंने देखा कि उनके बच्चे दो गुट में बंटे हुए एक दूसरे पर तमंचों से गोलियाँ दाग रहे थे। एक गुट हर हर महादेव के जयकारे लगा रहा था और दूसरा गुट अल्ला हो अकबर के नारे लगा रहा था। माँ भारती स्तब्ध रह गयीं।

उन्होंने तुरंत बच्चों को रोका,"बच्चो, यह क्या कर रहे हो तुम लोग"?

"माँ, हम लोग हिंदू मुसलमान खेल रहे हैं"।

"पर यह खेल कौन सा है"?

"यह हिंदू मुस्लिम दंगा…

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Added by TEJ VEER SINGH on August 25, 2018 at 12:08pm — 8 Comments

निकलेगा आफ़ताब इसी आसमान से (ग़ज़ल)

221   2121  1221  212

क़ीमत ज़बान की है जहाँ बढ़के जान से

है वास्ता हमारा उसी ख़ानदान से

चढ़ना है गर शिखर पे, रखो पाँव ध्यान से

खाई में जा गिरोगे जो फिसले ढलान से

पल - पल झुलस रही है ज़मीं तापमान से

मुकरे हैं सारे अब्र अब अपनी ज़बान से

काली घटाएँ रास्ता रोकेंगी कब तलक?

निकलेगा आफ़ताब इसी आसमान से

ये दौलतों के ढेर मुबारक तुम्हीं को हों

हम जी रहे हैं अपनी फ़क़ीरी में शान से

क्या-क्या न हमसे छीन…

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Added by जयनित कुमार मेहता on August 25, 2018 at 11:03am — 8 Comments

गजल -सब कुछ तो है सच्चाई में

मस्त हुए वे प्रभुताई में

देश झुलसता महँगाई में

 

घास तलक उगना हो मुश्किल

क्या रक्खा उस ऊँचाई में

 

फटी…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on August 25, 2018 at 10:00am — 6 Comments

सुनो, नारी कभी नग्न नहीं होती है और सुनो, नारी कभी नहीं रोती है

सुनो, नारी कभी नग्न नहीं होती है

और सुनो, नारी कभी नहीं रोती है

नारी कभी नग्न नहीं होती

नग्न होती हैं ;

हमारी मातायें,

हमारी बहनें,

हमारी पत्नी,

हमारी बेटियां,

हमारी पुत्र-वधुयें,

हमारी विवशताएं

नारी कभी नहीं रोती है-

रोती हैं ;

हमारी मातायें,

हमारी बहनें,

हमारी पत्नी,

हमारी बेटियां,

हमारी पुत्र-वधुयें,

हमारी विवशताएं

फिर…

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Added by SudhenduOjha on August 24, 2018 at 6:30pm — 9 Comments

मिश्रित दोहे :

मिश्रित दोहे :

कड़वे बोलों से सदा, अपने होते दूर।

मीठी वाणी से बढ़ें, नज़दीकियाँ हुज़ूर।।

भानु किरण में काँच भी, हीरे से बन जाय।

हीरा तो अपनी चमक, तम में ही दिखलाय।।

घडी-घड़ी क्यों देखता, जीव घडी की चाल।

घड़ी गर्भ में ही छुपा, उसका अंतिम काल।।

हंस भेस में आजकल, कौआ बांटे ज्ञान।

पीतल सोना एक सा, कैसे हो पहचान।।

राखी का त्यौहार है बहना की मनुहार।

इक -इक धागे में बहिन, बाँधे अपना…

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Added by Sushil Sarna on August 24, 2018 at 4:15pm — 4 Comments

जीवन की धमाचौकड़ी

जीवन की धमाचौकड़ी में वो अस्त-व्यस्त था।

मिलता तो था सभी से मगर ज़्यादा व्यस्त था।।

 

हर चंद कोशिशें थीं  कि दीदार-ए-यार  हो।

पहरा मगर महल में बहुत ज़्यादा सख्त था।।

 

कहने को गर हैं भाई फिर मैदान-ए-जंग में।

गिरता था ज़मीन पे वो फिर किसका रक्त था।।

 

गर सब हैं बेगुनाह तो चल अब तू ही दे बता।

खंज़र मेरे शरीर में वो किसका पेवस्त था।।

 

जिससे भी जुड़ा रिश्ते में वो बंधता चला गया।

बस उसका ही मिजाज थोड़ा ज़्यादा…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 24, 2018 at 3:00pm — 1 Comment

वो बेबसी का कहर देखते हैं

वो बेबसी का
कहर देखते हैं
हम भी अपना
शहर देखते हैं

उतर गया है
पानी सैलाब का
मिट्टी से सना
घर देखते हैं

शर्म, हया, अना
कहाँ बची है
झुक के सभी
दीवारो-दर देखते हैं

घोल दी गई कुछ
इस तरह मिठास
ज़ुबाँ में ज़हर का
असर देखते हैं

इस उम्र न आओगे
लौट कर यहाँ
हम न जाने किसकी
डगर देखते हैं

मौलिक एवम अप्रकाशित
सुधेन्दु ओझा

Added by SudhenduOjha on August 24, 2018 at 12:20pm — 1 Comment


सदस्य टीम प्रबंधन
नया सवेरा आएगा

.........



सात दशक से आज़ादी की केसरिया चादर को ओढ़े

हम बैठे हैं मौन

किंतु अगर अब भी ना बोले तो असली मुद्दों की बातों

पर बोलेगा कौन



........

मद तंद्रा में जो बैठे हैं उनको हमें जगाना होगा....

जलते हुए सभी प्रश्नों को उनसे हल करवाना होगा....

‘नया सवेरा आएगा’ यह स्वप्न अगर मन में ज़िंदा है

तब हमको सबसे पहले ख़ुद को ही सूर्य बनाना होगा.....



मस्तक पर हम संविधान का तिलक लगा कर,

मौलिक अधिकारों की बात किया करते हैं....

लेकिन… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on August 24, 2018 at 1:05am — 6 Comments

फिर ज़ख़्मों को ...संतोष

अरकान:-

फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फ़ा

फिर ज़ख़्मों को धोने का दिल करता है

चुपके चुपके रोने का दिल करता है

जब जब…

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Added by santosh khirwadkar on August 22, 2018 at 10:09pm — 14 Comments

"ज़हनियत मुर्दाबाद!" (लघुकथा)

"ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद! जान ज़िन्दाबाद! .. ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद!"- सुंदर 'राष्ट्रीय राजमार्ग' पर मौत को करारी शिकस्त देती कुछ ज़िन्दगियां ख़ुशी की अश्रुधारा बहाती चिल्ला रहीं थीं। वहां दैनिक दिनचर्या तहत बेहद तीव्र गति में दौड़ रहे ट्रैफ़िक में एक बाइक को विपरीत दिशा से आते एक स्कूटर ने यूं टक्कर मारी कि दोनों पर सवार युवा किसी फुटबॉल या सिक्के माफ़िक टॉस करते हुए सड़क के डिवाइडर से टकराने के बावजूद चोटिल होकर ज़िंदा बच गये थे। वह बाइक अभी भी एक छोटे से बच्चे को यथावत बिठाले सड़क पर दौड़ती हुई डिवाइडर से…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 22, 2018 at 1:33pm — 8 Comments

आना मेरे दयार में कुर्बत अगर मिले

221 2121 1221 212

कुछ रंजो गम के दौर से फुर्सत अगर मिले ।

आना मेरे दयार में कुर्बत अगर मिले ।।1

यूँ हैं तमाम अर्जियां मेरी खुदा के पास ।

गुज़रे सुकूँ से वक्त भी रहमत अगर मिले ।।2

आई जुबाँ तलक जो ठहरती चली गयी ।

कह दूँ वो दिल की बात इजाज़त अगर मिले ।।3…

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Added by Naveen Mani Tripathi on August 22, 2018 at 1:25pm — 16 Comments

'सैलाब में प्रत्याशी, मतदाता या किसान!' (लघुकथा)

"कौन? ... कौन डूब रहा है इस सैलाब में इतने रेस्क्यू ऑपरेशंस के बावजूद?"

"आम आदमी साहिब! आम मतदाता डूब रहा है, उपेक्षा के सैलाब में या फिर अहसानात के सैलाब में... इस चुनावी सैलाब में!"

"रेस्कयू में हम कोई कसर नहीं छोड़ रहे ! धन, नौकरी, छोकरी, योजना, लोन-दान, वीजा-पासपोर्ट,  नये-नये बिल-क़ानून, पशु-रक्षा, धार्मिक-स्थल-मुद्दे, मीडिया-कवरेज , वाद-विवाद, पुलिस-समर्पण ... सब कुछ तो लगा दिया उनके लिए उनके हितार्थ! .. और क्या चाहिए!"

"जनता इनको चुनावी-हथकंडे मान रही है, रेस्क्यू नहीं!…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 22, 2018 at 12:30am — 5 Comments

आल्हा

आल्हा (वीर छन्द)

बरसे बादल उमड़ घुमड़ के,चहुँ दिशि गूँजे चीख पुकार

गाँव नगर सब डूब गया है,कुदरत की ऐसी है मार

विषम घड़ी आयी केरल में,बाढ़ मचाई है उत्पात

कांप उठा है कोना कोना, संकट से ना मिले निजात

भारी जन धन काल गाल में,कैसे सभी बचाएं जान

खेत सिवान झील में बदले,ध्वस्त हुए सारे अरमान

तहस नहस केरल की धरती,मची तबाही चारो ओर

नाव चले गलियों कूँचे में,काल क्रूर बन गया कठोर

जमींदोज सब भवन हो गए,आयी बाढ़ बड़ी…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on August 21, 2018 at 8:36pm — 14 Comments

ऐ आसमान ....

ऐ आसमान ....

क्या हो तुम

आज तक कोई नहीं

छू पाया तुम्हें

फिर भी तुम हो

ऐ आसमान

किसी बेघर की

छत हो

किसी का ख्वाब हो

किसी परिंदे का लक्ष्य हो

या

किसी रूह का

अंतिम धाम हो

क्या हो तुम

ऐ आसमान

नक्षत्रों का निवास हो

किसी चातक की प्यास हो

मेघों का क्रीड़ा स्थल हो

सूर्य का पथ हो

या

चाँद तारों का आवास हो

क्या हो तुम

ऐ आसमान

सुशील सरना

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on August 21, 2018 at 1:53pm — 14 Comments

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