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जिसे भी दिल मे बसाया वो चीर कर के गया--

1212 1122 1212 112

मैं किसका नाम गिनाऊँ जो पीर भर केे गया
जिसे भी दिल मे बसाया वो चीर कर के गया
किसी दीवार पे टाँगा हुआ आईना हूँ
निगाह जिसने मिलाई वही सँवर के गया
मेरी कथा भी किसी फल भरे शजर सी है
उसी ने चोट दी जो छाँव मेंं ठहर के गया
भला क्यूँ जाग रहा हूँ मैं रोज़ रातों से
न पूछियेगा कभी कौन नींद हर के गया
ग़ुरूर क्यूँ न करे खुद पे जबकि पंकज से
मिला है जो भी तबीअत से वो निखर के गया
मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 31, 2018 at 7:55am

आदरणीय रवि भैया, बहुत बहुत आभार

Comment by Ravi Shukla on August 29, 2018 at 4:18pm

आदरणीय पंकज जी अच्छी ग़ज़ल कही आपने कुछ रवानी की कमी महसूस हो रही थी वह आदरणीय समर साहब ने पूरी कर दी है उनके सलाह के मुताबिक इसे दुरुस्त करें। सादर

Comment by Samar kabeer on August 29, 2018 at 11:59am

जनाब अजय कुमार शर्मा जी जी आदाब,

देख रहा हूँ कि आजकल ओबीओ पर सोशल मीडिया की तरह टिप्पणीयाँ दी जा रही हैं,न उनमें रचनाकार को संबोधित किया जाता है,न जिस विधा में रचना होती है उसका हवाला होता है, ये ओबीओ की परिपाटी नहीं है,आप ओबीओ  के पुराने सदस्य हैं,आपसे निवेदन करता हूँ कि कृपा कर ओबीओ मंच की गरिमा का मान रखें,और हर सदस्य का ये कर्तव्य है कि जहाँ भी ऐसी टिप्पणी नज़र आये वहाँ टोकें ज़रूर, निवेदन है कि मेरी बात की गम्भीरता को समझें और इसे अन्यथा नहीं  लेंगे ।

Comment by Ajay Kumar Sharma on August 29, 2018 at 11:25am

बहुत शानदार गज़ल.

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 28, 2018 at 7:42pm

आदरणीय बाऊजी, प्रणाम....."से" के स्थान "को" ही समुचित है, संशोधन करता हूँ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 28, 2018 at 6:49pm

वाह आदरणीय मिश्र जी । बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 28, 2018 at 2:19pm

आ. भाई समर जी, कर्तव्य का भान कराने के लिए आभार ।

Comment by Samar kabeer on August 28, 2018 at 11:23am

'भला क्यूँ जाग रहा हूँ मैं रोज़ रातों से'

ये मिसरा आपने इस तरह किया है तो अंत में 'से' शब्द की जगह ' में' या "को" करना उचित होगा ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 27, 2018 at 10:48pm

आदरणीय बाऊजी बहुत सारा आभार, इस ग़ज़ल को इस्लाह के लिए ही मंच के हवाले किया है मैंने, इसीलिए इसे फेसबुक पर भी पोस्ट नहीं किया है मैंने।

आपके सुझाव के अनुरूप संशोधन अभी कर देता हूँ........प्रणाम

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 27, 2018 at 10:47pm

आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी सर, आदरणीय लक्ष्मण सर तथा आदरणीय श्याम नारायण सर, आप सभी को रचना पर उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हार्दिक आभार।

कृपया ध्यान दे...

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