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July 2018 Blog Posts

कुछ कही कुछ अनकही है

गजल २१२२ २१२२ 
बात जो मन में तही है
कुछ कही कुछ अनकही है
भार ढोती है जगत का
तब धरा यह पुज रही है…
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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 12, 2018 at 3:57pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये (ग़ज़ल राज)

बेसबब बेसाख़्ता रफ़्तार है कुछ कीजिये 

लड़खड़ाती जिंदगी हर बार है कुछ कीजिये 



उठ रही हैं उँगलियाँ सब आपके घर की तरफ़ 

हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये 



वक्त आते ही डसेगा एक दिन वो आपको 

आस्तीं में पल रहा मक्कार है कुछ कीजिये 



आपके घर की तरफ़ से आ रहे पत्थर सभी 

आपके घर में छुपा गद्दार है कुछ कीजिये 



इस तरह तो मुफ़्लिसी दम तोड़ देगी भूख से 

आसमां को छू रहा बाज़ार है कुछ कीजिये



हैं मुखालिफ़ कुछ हवायें हो रही कमजोर…

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Added by rajesh kumari on July 11, 2018 at 9:57pm — 32 Comments

जनाब निलेश 'नूर' की ज़मीन में ग़ज़ल नम्बर 2 (कुछ नये क़वाफ़ी के साथ)

मैं तो उसकी पे ब पे अंगड़ाइयाँ गिनता रहा

और वो दामन की मेरे धज्जियाँ गिनता रहा

सौ गुनह होते ही पूरे मारना था इसलिये

मैं भी इक शिशुपाल की बदकारियाँ गिनता रहा

मेरे सीने पर सितम की मश्क़ वो करते रहे

और मैं मासूम दिल की किर्चियाँ गिनता रहा

काम जब कुछ भी नहीं था ओबीओ पर दोस्तो

'नूर' साहिब की मैं कूड़ेदानियाँ गिनता रहा

मेरी बर्बादी पे ख़ुश होकर अज़ीज़ों ने "समर"

कितनी…

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Added by Samar kabeer on July 11, 2018 at 10:00am — 31 Comments

अनावरण या आडंबर [लघु कथा]

तड़के सुबह से ही रिश्तेदारों का आगमन हो रहा था.आज निशा की माँ कमला की पुण्यतिथि थी. फैक्ट्री के मुख्यद्वार से लेकर अंदर तक सजावट की गई थी.कुछ समय पश्चात मूर्ति का कमला के पति,महेश के हाथो अनावरण किया गया.

कमला की मूर्ति को सोने के जेवरों से सजाया गया था.एकत्र हुए रिश्तेदार समाज के लोग मूर्ति देख विस्मय से तारीफ़ महेश से किये जा रहे थे. …

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Added by babitagupta on July 10, 2018 at 8:00pm — 7 Comments

तेरी-मेरी कहाँ सियासत ?

जुमले बाजी का नाम सियासत |

मक्कारों का काम सियासत |

जाति,धर्म पर लड़वाने में

सबसे आगे आज सियासत |

रोजगार के ख्वाब  दिखाकर

लूटे सरे आम  सियासत |

घोटालों में लिप्त है नेता

बेमानी का नाम सियासत |

बेटियों की लुटती  आबरू

चुप बैठी है  आज सियासत |

 लाज-शर्म को गिरवी रखकर

करती नंगा नाच सियासत |

भाई-भतीजावाद है हावी

तेरी-मेरी कहाँ सियासत ?

"मौलिक एवं…

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Added by Naval Kishor Soni on July 10, 2018 at 5:00pm — 11 Comments

हाइकू

न कर जिक्र

जब तक है जान

काहे की फिक्र

 

मन अंतस

जजवातों से भरा

पर अकेला

 

धरते धीर

शिखर पहुँचते

बैसाखी पर

  

क्या पा लिया था

ये तब जाना, जब

उसे खो दिया

खुशी ही नहीं

तल्खियाँ भी देती हैं

तनहाईयाँ

 

… मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on July 10, 2018 at 4:00pm — 17 Comments

निकम्मा - लघुकथा –

निकम्मा - लघुकथा –

 धर्मचंद जी शिक्षा विभाग से रिटायर अधीक्षक थे। चार बेटे थे। सभी पढ़े लिखे थे। सबसे बड़ा डाक्टर था जो अमेरिका में बस गया था। दूसरा इंजीनियर आस्ट्रेलिया में था। तीसरा दिल्ली में प्रोफ़ेसर था। चौथा बेटा भी पूर्ण रूप से शिक्षित था। जॉब भी मिल रहे थे मगर दूसरे शहरों में। लेकिन वह माँ बापू को अकेले छोड़ने के पक्ष में नहीं था।अतः वह इसी प्रयास में था कि उसे अपने ही शहर में नौकरी मिले।लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंततः उसने पिता की सलाह पर मकान के बाहरी हिस्से में एक मेडीकल स्टोर खोल…

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Added by TEJ VEER SINGH on July 10, 2018 at 1:21pm — 15 Comments

ग़ज़ल

मुहब्बत में हमीं मुजरिम हैं हम ये मान लेते हैं

चलो अब तुम कहो तुमसे तुम्हारी जान लेते हैं



ज़रा हम भी तो देखें धार उन क़ातिल निगाहों की

सुना है वो इसी ख़ंजर से सबकी जान लेते हैं



जो फिर देखो उन्हें तो वो जुदा लगते हैं पहले से

कहें कैसे कि हम उनको सही पहचान लेते हैं



कभी गुस्सा कभी आँसू कभी फिर रूठना उनका

वो कितने इम्तिहाँ मुझसे मेरे भगवान लेते हैं



तो फिर दुनिया क्या इस दुनिया का रखवाला भी झुकता है

मुहब्बत करने वाले भी अगर ज़िद ठान… Continue

Added by Alok Rawat on July 9, 2018 at 6:54pm — 20 Comments

माँ   ....

माँ   .... 

बताओ न

तुम कहाँ हो

माँ

दीवारों में

स्याह रातों में

अकेली बातों में

आंसूओं के

प्रपातों में

बताओं न

आखिर

तुम कहाँ हो

माँ

मेरे जिस्म पर ज़िंदा

तुम्हारे स्पर्शों में

आँगन में गूंजती

आवाज़ों में

तुम्हारी डाँट में छुपे

प्यार में

बताओं न

आखिर

तुम कहाँ हो

माँ

बुझे चूल्हे के पास

या

रंभाती गाय के पास

पानी के मटके के पास…

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Added by Sushil Sarna on July 9, 2018 at 5:33pm — 11 Comments

'दो सितारों का मिलन' (लघुकथा)

"हैलो! आदाब! ठीक तो हैं न! कहां तक पहुंच गईं आप? ज़रा अपनी घड़ी साहिबा पर भी इक नज़र तो डालियेगा!" शायर 'राज़' साहिब ने साहित्यिक सम्मेलन परिसर के मुख्य द्वार पर अगली सिगरेट का अगला लम्बा कश लेते हुए मोबाइल फ़ोन पर एक बार में ये सवाल दाग़ दिये!



"आदाब राज़ साहिब! मैं वहीं हूं अपनी क़लम संग, जहां मुझे इस वक़्त होना चाहिए!" दूसरी तरफ़ से चिर-परिचित सुरीली आवाज़ में सोशल मीडिया की आभासी सहेली शायरा शबाना ने आश्चर्य-मिश्रित लहज़े में कहा - "माना कि आप घड़ी नहीं पहनते, लेकिन अपने मोबाइल पर मेरे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 8, 2018 at 9:19pm — 6 Comments

सदा बिखरी रहे ये हंसी..

हँसमुखी चेहरे पर ये कोलगेट की मुस्कान,

बिखरी रहे ये हँसी,दमकता रहे हमेशा चेहरा,

दामन तेरा खुशियों से भरा रहे,

सपनों की दुनियां आबाद बनी रहे,

हँसती हुई आँखें कभी नम न पड़े,

कालजयी जमाना कभी आँख मिचौली न खेले,…

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Added by babitagupta on July 8, 2018 at 5:00pm — 9 Comments

जिंदगी की उधेड़बुन (लघुकथा )

सुबह आठ बजे से उसका साईकल इस एवन्यु में घूम रहा था । उसके भोंपू की आवाज़ एवन्यु के हर कोने तक पहुंच चुकी थी।

मगर न कोठी से कोई भी औरत न ही माँ के साथ बच्चा बाहर आया। उसके साईकल पर लगे बड़े, छोटे गुबारे, छोटी बड़ी कार या कोई बजाने वाले खिलौने सभी उस की तरफ झाक रहे थे । दो घंटे हो गए थे इस एवन्यु दाखल हुए। साईकल की रफ्तार भी धीमी हो चली थी। चेहरा उदास और आँखों में नमी बढने लगी अचानक ही उस ने इक कोठी के आगे साईकल आ लगाई, इक बार बेल्ल बजाई कोई जवाब नहीं आया। उसने फिर बेल्ल बजाई। थोड़ी देर बाद…

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Added by Mohan Begowal on July 8, 2018 at 1:00pm — 5 Comments

प्रजातंत्र(लघुकथा)



'एक सेठ के पाँच पुत्र थे, दो खूब पढ़े-लिखे,एक कुछ-कुछ पढ़ा हुआ और शेष दो के लिए काला अक्षर भैंस बराबर था।सेठ के मरते समय की बात के अनुसार घर की मिल्कियत(मालिकाना हक) साल भर के लिए पाँचों भाइयों में से सर्वसम्मति से या बहुमत से चुने हुए एक भाई को सौंप दी जाती।वह घर का कामकाज देखता,अपने हिसाब से विभिन्न मदों में धन खर्च करता।कभी पहला पढ़ा-लिखा भाई मालिक होता,तो कभी दूसरा।बीच-बीच में तीसरा कम पढ़ा लिखा भी मालिक बन जाता,अन्य दो अँगूठाछाप भाइयों की मदद से।पर उसकी कुछ चल नहीं पाती।ढुलमुल रवैये…

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Added by Manan Kumar singh on July 8, 2018 at 8:30am — 6 Comments

आप पर किस की मिह्ऱबानी है

फाइलातुन _मफाइलुन_फेलुन)



आप पर किस की मिह्ऱबानी है ,

हर ग़ज़ल में जो ये रवानी है !!

ये ग़ज़ल उसके नाम करता हूँ

शायरी जिसकी मेहरबानी है

शायरी में नहीं है कुछ मेरा

हर ग़ज़ल यार की निशानी है

आप को छोड़ कर कहाँ जाएँ ,

आप के साथ ज़िन्दगानी है !!

आप मक्ते में साथ होते हो ,

हर ग़ज़ल आप की निशानी है !!

प्यार के ही तो सारे किस्से हैं

प्यार की ही तो हर कहानी है

उसको भी…

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Added by राज लाली बटाला on July 8, 2018 at 8:30am — 7 Comments

ग़ज़ल

(2122-2122-2122-212)

मुश्किलें कितनी हैं अपने दरमियाँ गिनता रहा ।

बैठ कर मैं राह की दुश्वारियाँ गिनता रहा ।

आँखों में अश्कों का दरिया चढ़ के जब उतरा तो फ़िर,

मैं तो बस ख़्वाबों की डूबी कश्तियाँ गिनता रहा ।

और करता भी तो क्या वो नौजवां बेरोज़गार,

दी हैं कितनी नौकरी कीअरज़ियाँ गिनता रहा ।

राजनेता को न था मतलब किसी इंसान से,

वो तो केवल धोतियाँ और टोपियाँ गिनता रहा ।

वो रहे गिनते मुनाफ़ा कारख़ाने का उधर,…

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Added by Gurpreet Singh jammu on July 8, 2018 at 7:50am — 18 Comments

"मानसून की पहली बारिश का मज़ा" (लघुकथा - हास्य व्यंग्य)

मौसम विभाग ने तो मई के अंतिम सप्ताह में ही सम्भावना व्यक्त कर दी थी कि इस साल औसत से कहीं अधिक बारिश होगी । सभी लोग इस खबर को पढ़ कर खुश भी थे ।   कल रात से ही मानसून का सिस्टम सक्रिय हो गया । बहुत तेज़ गरज के साथ बादलों की आवाजाही होने लगी। 

 एक दम काली घटा ने सारे आसमान पर जैसे क़ब्ज़ा जमा लिया हो। रात से ही मूसलाधार बारिश हो रही थी।   सौरभ जैसे ही सुबह दस बजे घर से आफिस के लिए कार में जैसे ही बैठा , श्रुति बारिश में भीगती आईं , कार के…
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Added by MUZAFFAR IQBAL SIDDIQUI on July 7, 2018 at 11:30pm — 9 Comments

'गुड टाइम, बैड टाइम' (लघुकथा)

"अब तो बता दो कि 'गुड टेररिज़्म (आतंकवाद)' और 'बैड टेररिज़्म' में वाक़ई क्या फ़र्क है?" एक धर्मावलंबी ने कहा।



"वही फ़र्क है न, जो इंसां की ज़िन्दगी में 'गुड टाइम' और 'बैड टाइम' में है; जो 'गुड ह्यूमन' और 'बैड ह्यूमन' के बीच में है!" दूसरे ने जवाब दिया।



"जी नहीं, अंतर वही है, जो 'गुड ह्यूमन' के 'बैड टाइम' और 'बैड ह्यूमन' के 'गुड टाइम' के बीच में है!" एक हारे हुए परेशां शिक्षित बेरोज़गार ने अपनी पथराई आंखों से दो बूंदे टपकाते हुए कहा - "नासमझी या दुर्भाग्य से 'गुड टाइम' किसी…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 7, 2018 at 6:30pm — 2 Comments

चन्दन सा महका कर मन को बरसे काले मेह

चन्दन सा महका कर मन को बरसे काले मेह

 

चन्दन सा महका कर मन को

बरसे काले मेह

बूँद-बूँद में व्यथा समेटे

दहके कोई देह

 

हर आहट के धोखे ने

मुझको तहस-नहस कर डाला

सूनी वेदी पर खड़ी रही मैं

लिए हाथ में वर की माला

आएगा कि नहीं? हृदय में

उठते सौ संदेह

 

चन्दन सा महका कर मन को

बरसे काले मेह

बूँद-बूँद में व्यथा समेटे

दहके कोई देह

 

प्यास प्रेम की वो पहचाने

जो…

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Added by SudhenduOjha on July 7, 2018 at 3:08pm — No Comments

ग़ज़ल

   

चाहा ये दिल तेरा पाना हम को।
महका के राहों को जाना हम को।

कहते कोई तो अफ़साना हम भी,
कैसे बुनता ताना बाना हम को।

आये जाये मिलकर बैठे बिछड़ें,
कहना जो भी होता पाना हम को।

कैसा होगा अब ये हम का जीना,
जब राहों इन आना जाना हम को।

औरत बन के तुझको भी आना होगा,
क्यूँ होता इलजाम निभाना हम को।

  1. मौलिक व अप्रकाशित

Added by Mohan Begowal on July 7, 2018 at 3:07pm — 8 Comments

न कोई तिश्नगी होती न कोई हादसा होता

1222 1222 1222 1222



यहां इंसानियत से गर सभी का राबिता होता ।।

यकीनन मुल्क का यह सर नहीं झुकता मिला होता ।।1

मुहब्बत के उसूलों को अगर उसने पढ़ा होता ।

न कोई तिश्नगी होती न कोई हादसा होता ।।2

बहुत बेचैन दरिया की उसे पहचान है शायद ।

वग़रना वह समंदर तो नदी को ढूढ़ता होता ।।3

तुम्हारी शर्त को हम मान लेते बेसबब यारों।

हमें अंजामे रुसवाई अगर इतना पता होता ।।4

सियासत दां…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 7, 2018 at 2:00pm — 13 Comments

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