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जनाब निलेश 'नूर' की ज़मीन में ग़ज़ल नम्बर 2 (कुछ नये क़वाफ़ी के साथ)

मैं तो उसकी पे ब पे अंगड़ाइयाँ गिनता रहा

और वो दामन की मेरे धज्जियाँ गिनता रहा

सौ गुनह होते ही पूरे मारना था इसलिये

मैं भी इक शिशुपाल की बदकारियाँ गिनता रहा

मेरे सीने पर सितम की मश्क़ वो करते रहे

और मैं मासूम दिल की किर्चियाँ गिनता रहा

काम जब कुछ भी नहीं था ओबीओ पर दोस्तो

'नूर' साहिब की मैं कूड़ेदानियाँ गिनता रहा

मेरी बर्बादी पे ख़ुश होकर अज़ीज़ों ने "समर"

कितनी छोड़ीं रात भर महताबियाँ गिनता रहा

-----

पे ब पे---लगातार

मश्क़---अभ्यास

'नूर'---निलेश नूर

म्हताबियाँ---आतिश बाज़ी

'समर कबीर'

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on October 29, 2018 at 5:02pm

जनाब बलराम धाकर जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Balram Dhakar on October 29, 2018 at 3:01pm

आली मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब,

बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दाद के साथ मुबारक़बाद पेश है।

मैं तो उसकी पे ब पे अंगड़ाइयाँ गिनता रहा

और वो दामन की मेरे धज्जियाँ गिनता रहा...क्या बात है, वाह!

सौ गुनह होते ही पूरे मारना था इसलिये

मैं भी इक शिशुपाल की बदकारियाँ गिनता रहा...

बहुत खूब, शानदार !

Comment by Samar kabeer on July 27, 2018 at 2:56pm

जनाब राज़ नवादवी साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by राज़ नवादवी on July 27, 2018 at 12:58pm

आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने. मतला क्या ख़ूब बना है,

मैं तो उसकी पे ब पे अंगड़ाइयाँ गिनता रहा

और वो दामन की मेरे धज्जियाँ गिनता रहा

सादर. 

Comment by Samar kabeer on July 16, 2018 at 11:45pm

मुहतरमा बबीता गुप्ता जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by babitagupta on July 16, 2018 at 9:00pm

बेहतरीन प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय सरजी।

    मेरी बर्बादी पे खुश होकर.........गिनता रहा.

बहुत ही सही लगी 

Comment by Samar kabeer on July 14, 2018 at 10:48am

जनाब अजय तिवारी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Ajay Tiwari on July 14, 2018 at 5:59am

आदरणीय समर साहब, बहुत उम्दा अशआर हुए हैं. शिशुपाल के मिथक का इस्तेमाल बहुत प्रभावशाली है. हार्दिक बधाई. 

Comment by Samar kabeer on July 13, 2018 at 10:35pm

जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब, आपकी दूसरी टिप्पणी इस बात की शाहिद है कि ग़ज़ल आपकी पसंद पर खरी उतरी है, मेरा लिखना सार्थक हुआ,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ । 

Comment by vijay nikore on July 13, 2018 at 9:44pm

//मेरी बर्बादी पे ख़ुश होकर अज़ीज़ों ने "समर"

कितनी छोड़ीं रात भर महताबियाँ गिनता रहा//

वाह, भाई समर जी, इतनी अच्छी गज़ल कम ही मिलती है पढ़ने को। हर शेर के बाद सोचने के लिए रुकना पड़ा, हर शेर के लिए दिल से दाद देता हूँ।

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