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babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-76
"कलम का कहरमोहल्ले के महिला प्रशिक्षण केन्द्र पर आने वाली महिलाओं को स्वावलंबी बनने के साथ उन्हें  अपनी जिन्दगी में अधिकारों की ताजी हवा में जीने की उम्मीद की रोशनी भी दिखाई जाती हैं। महिलाओं का बेड़ियां तोड़कर अपना स्वतंत्र अस्तित्व को रेखांकित…"
Friday
babitagupta posted a blog post

रूंद गया बचपन...

गुमनाम अंधेरे में देखो भारत का भविष्य पल रहा दो जून रोटी की खातिर कोमल बचपन सुबक रहा कलम चलाने वाले नन्हे हाथ झूठन साफ कर रहे बस्ते उठाने वाले कंधे परिवार का बोझ उठा रहे माँ के आंचल का फूल दरबदर की गाली खा रहा भूखे पेट अपमान का घूंट पीकर जीवन गुजार रहा हंसने-खेलने-पढ़ने की उम्र में मजदूर बन गये बचपन की किलकारी खो गई मांझते-धोते निरीह तरस्ती ऑखें उठ रही कुछ आस में... इंसानियत के ठेकेदारों नियमों को मान लो मंझवाने से अच्छा कल का भविष्य मांझ दो.... बर्तन चमकाने से अच्छा उसका कल चमका दो.... निजी…See More
Jun 10
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"यह बहुत बड़ा कटु सत्य हैं बच्चों के स्कूल ना आने का। बेहतरीन रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई, दी।"
May 31
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"घोटाले षर सटीक रचना।बहुत-बहुत बधाई, सरजी। "
May 31
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"प्रदत विषयान्तर्गत बेहतरीन रचना।बहुत-बहुत बधाई, आदरणीय सरजी।"
May 31
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"बहुत-बहुत धन्यवाद, आदरणीया दी। "
May 31
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"बहुत-बहुत धन्यवाद, आदरणीय सरजी।"
May 31
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"गठरी कुछ दिनों के लिए मायके आई कोकिला की बेटी सुहाना ने बराबर ध्यान दिया कि दादी का बात-बात पर सलाह देना,काम मन माफिक ना होने पर झिड़क देना।अपनी माँ के प्रति इस तरह का दुर्व्यवहार देख आखिर एकदिन माँ से दादी के प्रति नाराजगी जताते हुये पूछ लिया,…"
May 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"संदेशात्मक रचना।बहुत-बहुत बधाई ओमप्रकाश सरजी।"
Apr 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"बहुत सुन्दर रचना। काम बनाने वाला चोर ।बहुत-बहुत बधाई, आदरणीया सुचि जी।"
Apr 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"सटीक जवाब। बहुत-बहुत बधाई, आदरणीय शेख सरजी।"
Apr 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"बहुत सुन्दर रचना संदेशात्मक। बहुत-बहुत बधाई,आदरणीय मनन सरजी।"
Apr 30
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आदर्श जीवन की ढलती सांझ में प्रभावती को उसके पति रणदीप ने संकोच के साथ झेंपभरी दृष्टि से सधे शब्दों में अपने घर ले जाने की बात रखी तो प्रभावती के पिता कश्यपजी ने तनिक रूष्टता से कहा, 'जमाईराजा, आपकी अमानत हैं, आप कभी भी ले जा सकते हैं। पर ,आप…"
Apr 29
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-72 (विषय: बेड़ियाँ)
"बहुत-बहुत धन्यवाद, आदरणीय शेख सरजी। टूटती बेड़ियां सही हैं। "
Mar 31
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-72 (विषय: बेड़ियाँ)
"पिघलती बेड़ियां... मंडप में पंडित के कन्यादान रस्म के मंत्रोचारण के साथ काव्या ने अपनी भतीजी मुस्कान के हाथो में हल्दी लगाते हुये उसकी ऑखें डबडबा आई।मुस्कान ने काव्या को लगाते हुये मद्धिम स्वर में फुसफुसाकर कहा, 'क्या चाची आप भी ना...मेरे फोटो…"
Mar 31
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-72 (विषय: बेड़ियाँ)
"विषयपरक रचना।बहुत-बहुत बधाई, आदरणीय चेतन सरजी। "
Mar 30

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Female
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chhattisgarh
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Bilaspur
Profession
Retired teacher
About me
Simplicity

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At 11:36pm on April 13, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीया बबिता गुप्ता जी बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ने का

Babitagupta's Blog

रूंद गया बचपन...

गुमनाम अंधेरे में देखो भारत का भविष्य पल रहा

दो जून रोटी की खातिर कोमल बचपन सुबक रहा

कलम चलाने वाले नन्हे हाथ झूठन साफ कर रहे

बस्ते उठाने वाले कंधे परिवार का बोझ उठा रहे

माँ के आंचल का फूल दरबदर की गाली खा रहा

भूखे पेट अपमान का घूंट पीकर जीवन गुजार रहा

हंसने-खेलने-पढ़ने की उम्र में मजदूर बन गये

बचपन की किलकारी खो गई मांझते-धोते

निरीह तरस्ती ऑखें उठ रही कुछ आस में...

इंसानियत के ठेकेदारों नियमों को मान लो

मंझवाने से अच्छा कल का भविष्य मांझ…

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Posted on June 10, 2021 at 3:30pm

मुखरता से हो रहा बदलाव (आलेख)

मुखरता से हो रहा बदलाव..... और बदल रही तस्वीर...!



विश्व की अन्य महिलाओं की तरह भारत की महिलाओं को आजादी से जीने और अधिकारों का उपयोग कर सर्वांगीण विकास करने के लिए संघर्ष नही करना पड़ा।समय के साथ सकारात्मक बदलाव भी हुये।पुरूषवर्चस्व क्षेत्रों में अपना उपस्थिति दर्ज कराके अपनी आजादी की नई ईबारत लिखती हौसले बुलंद महिलाओं ने देश-विदेश में अपनी सफलता, उपलब्धियों का परचम फहराया। अपने संघर्ष, मेहनत,जज्बा,जुनून से हर सीमाओं को लांघकर कामयाबी हासिल कर नई ऊंचाईयां छूकर प्रेरणा…

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Posted on March 8, 2021 at 12:30pm — 3 Comments

मेरे पिता (लेख)

मेरे पिता

पिता शब्द स्वयं अपने आप में बजनदार होता हैं। हाथ की दसों उंगलियों की तरह हर पिता का व्यक्तित्व अलग होता हैं। पिता को परिभाषित किया जा सकता हैं, उपमानों से अलंकारित किया जा सकता हैं पर रेखांकित नही किया जा सकता।बस,उम्मीद की जा सकती हैं कि हमारे पिता बहुत अच्छे हैं, बस थोड़े-से ऐसे और होते। सभी बच्चों के पिता उनके हीरो होते हैं। ऐसे ही मेरे पिता मेरे किसी सुपरमेन से कम नहीं हैं, हरफनमौला हैं। बचपन से मैंने उनका सख्त चेहरा,कठोर अनुशासनबद्ध,जुझारूपन देखा हैं। मितभाषी हम सब के…

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Posted on June 21, 2020 at 3:03pm — 1 Comment

फूल

फूल-सी सुकोमल,सुकुमारी

कौन-सा फूल तेरी बगिया की

न्यारी-प्यारी माँ-बाबा की दुलारी

मुस्कराती ,बाबा फूले ना समाते

फूल-से झङते माँ होले-से कहती

पर दादी झिङकती-फूल कोई-सा होवे

पर सिर पर ना ,चरणों में चढाये जावे

उस समय कोमल मन को समझ ना आई

जब किसी के घर गुलदान की शोभा बनी

तब बात समझ आई

नकारा,छटपटाई,महकना चाहती थी

टूटकर अस्तित्वहीन नहीं होना था

पर असफल रही,दल-दल छितर-बितर गया

सोचती,मैं फूल तो हूँ

चंपा,चमेली,चांदनी,पारिजात नहीं

गुलाब…

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Posted on April 21, 2020 at 4:32pm

 
 
 

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