२१२२/२१२२/२१२
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तीर्थ जाना हो गया है सैर जब
भक्ति का यूँ भाव जाता तैर जब।१।
*
देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला
आदमी का आदमी से बैर जब।२।
*
दुश्मनो की क्या जरूरत है भला
रक्त के रिश्ते हुए हैं गैर जब।३।
*
तन विवश है मन विवश है आज यूँ
क्या करें हम मनचले हों पैर जब।४।
*
सोच लो कैसा समय तब सामने
मौत मागे जिन्दगी की खैर जब।५।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
Comment
आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय
//*फिर को क्यों करने से "क्यों " का दोहराव होरहा है। इसकी जगह यह कैसा रहेगा सुझाइए -//
मेरा आशय फिर और क्यों के बीच अदला-बदली से था - देवता फिर दोस्त होंगे क्यों भला
शुभ-शुभ
आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।
मिसरों में सुधार का प्रयास किया है मार्गदर्शन कीजिए।
//तीर्थ जाना हो गया है सैर जब
भक्ति का यूँ भाव जाता तैर जब।१। .......... सानी पर तनिक और समय दिया जाना था//
इसे इस प्रकार किया है-
*भाव जाता भक्ति का बस तैर जब*
//देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला ............. फिर को ’क्यों’ किया जाना और उचित होता ...///
*फिर को क्यों करने से "क्यों " का दोहराव होरहा है। इसकी जगह यह कैसा रहेगा सुझाइए -
-देवता भी दोस्त होंगे क्यों भला
//तन विवश है मन विवश है आज यूँ ....... .. उला का ’यूँ’ से समाप्त होना सानी में किसी बानगी की अपेक्षा करता है.//
इसे इस प्रकार किया है-
*तन विवश है मन विवश है आज भी*
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,
तीर्थ जाना हो गया है सैर जब
भक्ति का यूँ भाव जाता तैर जब।१। .......... सानी पर तनिक और समय दिया जाना था
*
देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला ............. फिर को ’क्यों’ किया जाना और उचित होता ...
आदमी का आदमी से बैर जब।२।
*
दुश्मनो की क्या जरूरत है भला ...... ........ भला को ’कहो’ किया जाय तो सम्प्रेषणीयता अवश्य ही और अधिक बढ़ जाएगी
रक्त के रिश्ते हुए हैं गैर जब।३।
*
तन विवश है मन विवश है आज यूँ ....... .. उला का ’यूँ’ से समाप्त होना सानी में किसी बानगी की अपेक्षा करता है.
क्या करें हम मनचले हों पैर जब।४।
*
सोच लो कैसा समय तब सामने
मौत मागे जिन्दगी की खैर जब।५। ....... एक अच्छे शे’र के लिए बधाई ..
शुभ-शुभ
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