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babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"बचपन की बेहतरीन यादों की बेहतरीन प्रस्तुति ,हार्दिक  स्वीकार कीजियेगा आदरणीय मंजीत सरजी।"
Saturday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
" बचपन की सभी यादों को तरोताजा करती बेहतरीन रचना ,हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीया अनिता दी "
Saturday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"आदरणीय अखिलेश सरजी,लक्ष्मण सरजी,समर सरजी,छोटेलाल  सरजी  आप सभी  का आभार ,दी हुई सलाह पर अमल करने की कोशिस करूँगी। "
Saturday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"बचपन की आदतों और आसपास के माहौल में गुजरे समय को याद दिलाती बेहतरीन रचना हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय लक्ष्मण सरजी "
Saturday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"क्या थे वो दिन ..... बचपन के वो दिनअसल जिंदगी जिया करते थे  कल की चिंता छोड़ आज में जिया करते थे  ईर्ष्या,द्वेष से परे,पाक दिल तितली की मानिंद उड़ते   ना हाथ खर्च की चिंता,ना भविष्य के सपने बुनते   हंसी…"
Saturday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"क्या थे वो दिन ..... बचपन के वो दिनअसल जिंदगी जिया करते थे  कल की चिंता छोड़ आज में जिया करते थे  ईर्ष्या,द्वेष से परे,पाक दिल तितली की मानिंद उड़ते   ना हाथ खर्च की चिंता,ना भविष्य के सपने बुनते   हंसी…"
Saturday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"बचपन की भूलीबिसरी यादों का परत दर परत पन्ना खोलती बेहतरीन रचना।हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय अखिलेश सरजी।"
Saturday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"बचपन में की गई मौजमस्ती की याद दिलाती बेहतरीन रचना, हार्दिक बधाई आदरणीय छोटेलाल सरजी।"
Friday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"बचपन का पूरा लेखा जोखा करती बेहतरीन रचना, हार्दिक बधाई आदरणीय छोटे लाल सरजी।"
Friday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"काफी समय पहले का परिवेश याद दिलाती बेहतरीन रचना, वैसे अभी भी कही कही यह सब आज भी है।हार्दिक बधाई आदरणीय गंगा धर सरजी।"
Friday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"बचपन की यादों को तरोताजा करती बेहतरीन रचना, हार्दिक बधाई आदरणीय रवि सरजी।"
Friday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"कुछ बीते दिन कभी जेहन से विस्मृत नहीं होते, बस, समय की बलिहारी की कुंजी हमारे पास नहीं होती।बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय प्रतिभा दी।"
Friday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय अहमद सरजी।"
Friday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"जीवन में कुछ पाने की आशा में वो दिन को यादगार बनाती बेहतरीन रचना, हार्दिक बधाई आदरणीय सुकुल सरजी।"
Friday
babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-95
"बचपन के दिनों की छोटी बडी यादों को ताजा करती बेहतरीन रचना, हार्दिक बधाई आदरणीय मोहम्मद सर जी।"
Friday
babitagupta commented on Sushil Sarna's blog post भ्रम ... (दो क्षणिकाएं )
"पुरुषत्व की गरिमा पर प्रहार करती रचना,हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सुशील सरजी।"
Sep 8

Profile Information

Gender
Female
City State
chhattisgarh
Native Place
Bilaspur
Profession
Retired teacher
About me
Simplicity

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दोस्ती [तुकांत - अतुकांत कविता]

बचपन की यादों का अटूट बंधन 

बिना लेनदेन के चलने वाला 

खूबसूरत रिश्तों का अद्वितीय बंधन 

एक ढर्रे पर चलने वाली जिंदगी में 

नई-नई सोच से रूबरू करवाया 

अर्थहीन जीवन को अर्थ पूर्ण बनाया 

जीने का एक…

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Posted on August 27, 2018 at 8:00pm — 4 Comments

रिश्तों की डोर [लघुकथा]

दरवाजे की घंटी सुन,  दरवाजा मेड शीला ने  खोला तो अपरिचित समझ मुझे आवाज लगाने पर मैं देखने गई तो सामने सलिल भैया और शालिनी भाभी को  देख हतप्रद रह गई.मुझे इस तरह देख,भैया कहने लगे- 'भूल गई क्या ?मैं तुम्हारा भाई .......

मैं अपने को संभालते हुए ,उन्हें  इशारे से अंदर आने को कह,कहने लगी- 'अरे नहीं भैया,आपको अचानक इतने सालो बाद देखा ....बस और कुछ नहीं।'

भाभी मेरी मनोस्थिति  समझ भैया को डाटने वाले लहजे में कहा - 'अब ,उसे झिलाना छोडो'।और मुझे रसोई में ले जाकर खाना बनाने में हाथ बटाँने…

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Posted on August 26, 2018 at 9:42pm — 8 Comments

उम्मीदों की मशाल [लघु कथा ]

रामू की माँ तो अपने पति के शव पर पछाड़ खाकर गिरी जा रही थी.रामू कभी अपने छोटे भाई बहिन को संभाल रहा था ,तो कभी अपनी माँ को.अचानक पिता के चले जाने से उसके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ आ पड़ा था.

पढ़ाई छोड़,घर में चूल्हा जलाने के वास्ते रामू काम की तलाश में सड़को की छान मारता।अंततःउसने घर-घर जाकर रद्दी बेचने का काम पकड़ लिया।रद्दी में मिलती किताबों को देख उसके अंदर का किताबी कीड़ा जाग उठा.किताबे बचाकर,बाकी रद्दी बेच देता।और रात में लालटेन में अपने पढ़ने की भूख को  तृप्त करता।

समय बीतता…

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Posted on August 1, 2018 at 7:00pm — 4 Comments

मैं और मेरे गुरु [कविता]

क्षण-प्रतिक्षण,जिंदगी सीखने का नाम  

सबक जरूरी नहीं,गुरु ही सिखाए

जिससे शिक्षा मिले वही गुरु कहलाये 

जीवंत पर्यन्त गुरुओं से रहता सरोकार 

हमेशा करना चाहिए जिनका आदर-सत्कार 

प्रथम पाठशाला की गुरु माँ बनी …

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Posted on July 27, 2018 at 1:00pm — 2 Comments

 
 
 

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"मन को आनन्दित करती बहुत ही सुन्दर रचना..."
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"आ. अमिता जी,अच्छी रचना हुयी है,हार्दिक बधाई स वीकारें ।"
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"आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन । आपकी उपस्थिति से मन आस्वस्थ हुआ। स्नेह के लिए आभार ।"
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Ajay Tiwari commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post क्या मन है बीमार पड़ौसी - गजल - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हर्दिकं बधाई . लड़ना भिड़ना पागलपन हैइसमें सब की हार…"
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