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जिंदगी की उधेड़बुन (लघुकथा )

सुबह आठ बजे से उसका साईकल इस एवन्यु में घूम रहा था । उसके भोंपू की आवाज़ एवन्यु के हर कोने तक पहुंच चुकी थी।
मगर न कोठी से कोई भी औरत न ही माँ के साथ बच्चा बाहर आया। उसके साईकल पर लगे बड़े, छोटे गुबारे, छोटी बड़ी कार या कोई बजाने वाले खिलौने सभी उस की तरफ झाक रहे थे । दो घंटे हो गए थे इस एवन्यु दाखल हुए। साईकल की रफ्तार भी धीमी हो चली थी। चेहरा उदास और आँखों में नमी बढने लगी अचानक ही उस ने इक कोठी के आगे साईकल आ लगाई, इक बार बेल्ल बजाई कोई जवाब नहीं आया। उसने फिर बेल्ल बजाई। थोड़ी देर बाद इक बाऊ जी बाहर आये।
“सर जी, आप कोई खिलौना खरीद लें, कोई ग्राहक अभी नहीं मिला, दो घंटे हो गए हैं।", खिलौने बेचने वाले बच्चे ने कहा ।
“मगर हमारे तो कोई बच्चा ही नहीं किस लिए हम”, लेंगे, बाऊ जी ये कह गेट बंद करने लगे।
“सर जी, खरीद लीजिए न, मेरी माँ बीमार है, बच्चे ने फिर कहा ।“
बाऊ जी ने धीरे से गेट बंद किये बिना अंदर दाखिल हुए और थोड़ी देर बाद बाऊ जी ने उस के हाथ में कुछ पकड़ा दिया।
“ये क्या, बाऊ जी ने खुद से सवाल किया, क्या ऐसे हल हो जायेगा उसकी समस्या का।“
बच्चा साईकल चला आगे बढ़ गया और बाऊ जी इसी उधेड़बुन गुम हुआ उसके साईकल चलाते पैरों की तरफ देखता रहा।

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 13, 2018 at 5:39pm

बहुत ही संवेदनशील लघु कथा हुई आदरणीय..लेकिन आखरी दो पंक्तियों में कसावट की कमी लगी..

Comment by Samar kabeer on July 11, 2018 at 11:25am

जनाब मोहन जी आदाब,लघुकथा का प्रयास अच्छा हुआ है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by मोहन बेगोवाल on July 9, 2018 at 6:35pm

  

सुबह आठ बजे से उसका साईकल इस एवन्यु में घूम रहा था । उसके भोंपू की आवाज़ एवन्यु के हर कोने तक पहुंच चुकी थी।
मगर न कोठी से कोई भी औरत न ही माँ के साथ बच्चा बाहर आया। उसके साईकल पर लगे बड़े, छोटे गुबारे, छोटी बड़ी कार या कोई बजाने वाले खिलौने सभी उस की तरफ झाँक रहे थे । दो घंटे हो गए थे इस एवन्यु दाखल हुए। साईकल की रफ्तार भी धीमी हो चली थी। चेहरा उदास और आँखों में नमी बढने लगी अचानक ही उस ने इक कोठी के आगे साईकल आ लगाई, इक बार बेल्ल बजाई कोई जवाब नहीं आया। उसने फिर बेल्ल बजाई। थोड़ी देर बाद इक बाऊ जी बाहर आये।
“सर जी, आप कोई खिलौना खरीद लें, कोई ग्राहक अभी नहीं मिला, दो घंटे हो गए हैं।", खिलौने बेचने वाले बच्चे ने कहा ।
“मगर हमारे तो कोई बच्चा ही नहीं किस लिए हम लेंगे, तब बाऊ जी ये कह गेट बंद करने लगे।
“सर जी, खरीद लीजिए न, मेरी माँ बीमार है, बच्चे ने फिर कहा ।“
बाऊ जी का ध्यान घर में काम करने वाली के बच्चे की तरफ गया और धीरे से गेट बंद किये बिना वह अंदर दाखिल हुए और थोड़ी देर बाद बाऊ जी ने उस के हाथ में कुछ पकड़ा दिया।
“ये क्या, बाऊ जी ने खुद से सवाल किया, क्या ऐसे हल हो जायेगा उसकी समस्या का।“
बच्चा साईकल चला आगे बढ़ गया और बाऊ जी इसी उधेड़बुन गुम हुआ उसके साईकल चलाते पैरों की तरफ देखता रहा।

Comment by babitagupta on July 9, 2018 at 3:17pm

बच्चे के स्वाभिमान की रक्षा के लिए  और उसकी सहायता करने के लिए खिलौना खरीदना फिजूल था तो घर का कुछ काम कराकर ,उसकी सहायता की जा  सकती थी.,वैसे कहानी बहुत कुछ आज की व्यवस्था के नजदीक  दिखाई देती हैं.उम्दा रचना के लिए आर्थिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 9, 2018 at 1:03pm

 हाथ  में  कुछ पकड़ा देने से तो बच्चे के  स्वाभिमान की रक्षा नहीं हुई ।  हाँ, कुछ सहायता अवश्य हो जाएगी, उसकी माँ के  इलाज में।  लेकिन मेरे विचार से  अच्छा  होता अगर  बच्चे से कोई खिलौना खरीद  कर "कुछ" दिया गया होता ।  अच्छी लघुकथा की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।  

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