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चाँद निकला छत पे किसकी कर रहा दीदार कौन(ग़ज़ल 'राज')

बहर-ए-रमल मुसम्मिन मक्सूर व मह्जूफ़

2122 2122 2122 2121

किसके चेह्रे पर लिखा है कौन दुश्मन यार कौन 

क्या पता है आड में गुल की  छुपा है ख़ार कौन

हक़ है किसका सिर पे पहने है मगर दस्तार कौन 

चाँद निकला छत पे किसकी कर रहा दीदार कौन

मतलबी हैं आज रिश्ते खो गया है एतबार 

इस जहां में दिल से सच्चा आज करता प्यार कौन

मर गया  है मुफ़्लिसी में भूख से देखो अनाथ 

सब ही  खाते थे  तरस लेकिन उठाता भार कौन

पेट भरने के लिए…

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Added by rajesh kumari on October 7, 2017 at 9:30pm — 15 Comments

गीत - तुझे देखूँ यहाँ वहाँ

संदेसा तेरे दिल का , धड़कने है लातीं,

सवार तेरे धुन मे, खुद को कहाँ रोक पाते,

बस मुस्कुरकर तू देख लेती ज़रा,

दिल क्या, जान भी तेरे हो जाते,

तुझे देखूँ यहाँ वहाँ, ढूँढूँ मैं सारा जहाँ, 

बाहों से लगा लूँ तुझे, दिल मे बसा लूँ तुझे....(2)…

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Added by M Vijish kumar on October 7, 2017 at 7:30pm — 7 Comments

देख रिश्तों की ......संतोष

अरकान:-फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन

देख रिश्तों की ऐसी बनावट न कर
दोस्त है दुश्मनी की मिलावट न कर

झूट कहने में हर शख़्स माहिर हुआ
सच यहाँ बोलने की दिखावट न कर

ज़ख़्म दिल के हैं दिल में उन्हें दफ़्न रख
अपने चहरे पे उनकी सजावट न कर

टूट जायेंगे रिश्ते ज़रा देर में
कच्चे धागों से इनकी बुनावट न कर

भूक से थे ये बेताब सोए अभी
देख ये जाग जायेंगे आहट न कर
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on October 7, 2017 at 6:17pm — 8 Comments

हस्तरेखा (लघुकथा)

"इतना मान-सम्मान पाने वाली, फिर भी इनकी हथेली खुरदरी और मैली सी क्यों है?"-- हृदय रेखा ने धीरे-धीरे बुदबुदाते हुए दूसरी से पूछा तो हथेली के कान खड़े हो गए।

"बडे साहसी, इनका जीवन उत्साह से भरपूर है,फिर भी देखो ना..." मस्तिष्क रेखा ने फुसफुसा कर ज़बाब दिया।

" देखो ना! मैं भी कितनी ऊर्जा लिए यहाँ हूँ, किंतु हथेली की इस कठोरता और गदंगी से.....!" जीवन रेखा भी कसामसाई।

"अरे! क्यों नाहक क्लेष करती हो तुम तीनों? भाग्य रेखा…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on October 7, 2017 at 4:00pm — 11 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५६

ग़ज़ल- २२१ २१२१ १२२१ २१२ 

(फैज़ अहमद फैज़ की ज़मीन पे लिखी ग़ज़ल) 



हारा नहीं हूँ, हौसला बस ख़ाम ही तो है

गिरना भी घुड़सवार का इक़दाम ही तो है

बोली लगाएँ, जो लुटा फिर से खरीद लें 

हिम्मत अभी बिकी नहीं नीलाम ही तो है



साबित अभी हुए नहीं मुज़रिम किसी भी तौर

सर पर हमारे इश्क़ का इल्ज़ाम ही तो है



ये दिल किसी का है नहीं तो फिर हसीनों को

छुप छुप के यारो देखना भी काम ही तो है



उम्मीद क्या…

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Added by राज़ नवादवी on October 6, 2017 at 8:00pm — 19 Comments

हसरतें, फ़ितरतें और तिजारतें (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"मेरे देशवासियों, देश बदल रहा है! कुछ ही सालों में हम सब कुछ बदल डालेंगे!"

छोटे-मोटे नेताओं के बाद अब बड़े नेताजी मंच पर सीना तान कर भाषण दे रहे थे। मंचासीन सेवकों के सीने भी तन चुके थे। थकी हुई जनता उन्हें सुन रही थी।

कुछ जुमले छोड़ने के साथ ही नेताजी अपनी हथेली जनता की ओर करते हुए बोले - "भाइयों और बहनों, मेरे मित्रों! आपके द्वारा चुना गया आपका सच्चा सबसे बड़ा सेवक यानी मैं! मैं पुरानी लकीरें नहीं पीटता, नई लकीरें खींचता हूं। ये हथेली, आपकी हथेली, हथेली नहीं, भारत है भारत!! इसमें… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2017 at 4:40pm — 7 Comments

ग़ज़ल "जिन्दगी इक अज़ब पहेली है"

2122 1212 22

ख़ुद उलझती है ख़ुद सुलझती है।

जिन्दगी इक अज़ब पहेली है।।



साथ तेरा मुझे मिला जबसे।

जिन्दगी मेरी मुस्कुराती है।।



सब्र करना व भूख से लड़ना।

मुफ़लिसी क्या नहीं सिखाती है।।



मैं बहुत चाहने लगा तुझको।

हर ग़ज़ल मेरी ये बताती है।।



बात कोई चुभे अगर दिल को।

तब ग़ज़ल ख़ुद मुझे बुलाती है।।



दुख घुटन दर्द आह मजबूरी।

ज़िन्दगी की यही कहानी है।।



मुस्कुराती हुई तेरी तस्वीर।

पास मेरे तेरी… Continue

Added by surender insan on October 6, 2017 at 2:32pm — 20 Comments

ग़ज़ल ( कोई देखे हमें महब्बत से )

फाइलातुन -मफ़ाइलुन -फेलुन 



दिल की हसरत यही है मुद्दत से |

कोई देखे हमें महब्बत से |

नामे उल्फ़त से जो नहीं वाक़िफ़

देखता हूँ मैं उसको हसरत से |

सब्र का फल तो खा के देख ज़रा

क्यूँ है मायूस उसकी रहमत से |

जिस ने देखा उन्हें यही बोला

उनको रब ने बनाया फ़ुर्सत से |

उसके हाथों में आइना दे दो

बाज़ आए नहीं जो गीबत से |

देखिए तो करम अज़ीज़ों का

वो हैं बे ज़ार मेरी सूरत से…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 6, 2017 at 12:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल : उसके लब पे रहती है  मुस्कान सदा - सलीम रज़ा रीवा

22 22 22 22 22 2

.....

जो बनकर के जीता है  इंसान सदा,

उसके लब पे रहती है  मुस्कान सदा

..

क्या अफसोस कि शाख़ से पत्ते टूटे हैं,

गुलशन में तो आते हैं तूफ़ान सदा

..

हक़ पे चलने वाले हक़ पे चलते हैं,

माना  की बहकाता है शैतान सदा 

..

धीरे - धीरे शेर मेरे भी चमके गें,

पढ़ता हूँ मै ग़ालिब का दीवान सदा

..

रिज़्क मे उसके बरकत हरदम होती है,

जिसके घर में आते हैं मेहमान सदा

..

भेद भाव से दूर "रज़ा" जो रहता है,

महफ़िल… Continue

Added by SALIM RAZA REWA on October 6, 2017 at 12:00pm — 30 Comments

ग़ज़ल--बोझ उल्फ़त हो गई तो

ग़ज़ल--2122--2122

बोझ उल्फ़त हो गई तो...?

तेरी आदत हो गई तो...?



प्यार का इज़हार कर दूँ

तुझको नफ़रत हो गई तो...?



डर लगे है आशिक़ी से

यार आफ़त हो गई तो...?



मुझको कंकर तूने समझा

मेरी क़ीमत हो गई तो...?



दर्द अब भाने लगा है

दिल को राहत हो गई तो...?



बिन तेरे रुक जाए साँसे

ऐसी हालत हो गई तो...?



कितना ख़ुद को रोकता हूँ

मेरी ज़ुर्रत हो गई तो...?



बेवफ़ा ये तेरी यादें

दिल की दौलत हो गई… Continue

Added by khursheed khairadi on October 5, 2017 at 11:15pm — 12 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- 55

ग़ज़ल- १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

लिखा है गर जो किस्मत में तो फिर बदनाम ही होलें

न बाइज़्ज़त तो बेइज़्ज़त तुम्हारे नाम ही होलें

 

न कुछ करने से अच्छा है तू वादा तोड़ ही डाले 

न हों कामिल वफ़ा में तो दिले नाकाम ही होलें

 

न हो महफ़िल तुम्हारी तो किसी महफ़िल में रोलें हम

चलो हम आज कूचा ए दिले बदनाम ही होलें

 

मुझे रिज़वान रख लें वो बहिश्ते ख़ूब रूई का

घड़ी भर को कभी मेरे वो हमआराम ही होलें

 

जो हों जन्नतनशीं…

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Added by राज़ नवादवी on October 5, 2017 at 6:30pm — 14 Comments

अमर ...

अमर ...

प्रश्न 

कभी मृत नहीं होते
उत्तर
सदा अमृत नहीं होते
कामनाएं
दास बना देती हैं
उत्कण्ठाएं
प्यास बढ़ा देती हैं
शशांक
विभावरी का दास है
शलभ
अमर लौ अनुराग है
दृष्टि
दृश्य की प्यासी है
तृषा
मादक मकरंद की दासी है
भाव
निष्पंद श्वास है
अंत
अनंत का विशवास है
स्मृति
कालजयी कल है
अमर
प्रीत का हर पल है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 5, 2017 at 6:07pm — 14 Comments

कविता ---- एक दूजे का साथ ------

इतने साल बीत गये 

ना वो बदली जरा ना मैं !

आज भी उसे नहीं पसंद

मेरा किसी और से बात करना !

मुझे भी आजतक नहीं भाया

उसका किसी को देख मुस्काना !

उसे अच्छा नहीं लगता जब

मेरा ध्यान उससे हट जाना !

मुझे पसंद नहीं आता उसका

मुझे छोड़ टी.वी. तक देखना !

वो कहती है सुनो प्रिय 

मैं सामने हुं तो मुझे ही देखो !

मुझे भाता है उसे चिडाना

दूसरों को देख देख मुस्काना !

उसे पसंद तक नहीं मेरा चश्मा

मेरी आंखों पर हमेशा रहता…

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Added by जयति जैन "नूतन" on October 5, 2017 at 4:00pm — 5 Comments

तू प्यार है मेरा

तू प्यार है मेरा यार है मेरा, ये बात मैं सबसे क्यों बोलूँ,
जो राज दबाया है सीने में वो शहरा भर में क्यूँ खोलूँ
.
सब कहते हैं "मल्हार" तेरे गीतों में ये कशिश कहाँ से आती है
मैं दिल में रो कर,चेहेरे से हँस कर ये बात टालते जाता हूँ
.
अहसासों के कागज़ पर अब मैं ख़ुद को लिखता रहता हूँ
उम्र भर के यादों में, मैं बस तुझको ही ढूंढता रहता हूँ
.
अजीब दास्ताँ मेरे इश्क़ की, तुझे खोने से डरता…
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Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on October 5, 2017 at 1:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल नूर की-तन्हाइयों के गहरे जंगल में रात काटी

२२१२, १२२; २२१२, १२२ (अरकान का क्रम भिन्न भी हो सकता है)

.

तन्हाइयों के गहरे जंगल में रात काटी

तृष्णाओं से भरे इक मरुथल में रात काटी.

.

जब रौशनी बढ़ा कर चन्दा ने उस को छेड़ा

शरमा के चाँदनी ने बादल में रात काटी. 

. `    

चुगली न कर दे बैरन थी जान कश्मकश में

बाहों में थे पिया और पायल में रात काटी.

.

साजन का नाम जपते अधरों का थरथराना,     

बिरहन के मुख पे फैले काजल में रात काटी.

.

हर कूक ने उठाई है हूक मेरे दिल में …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 5, 2017 at 1:27pm — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अजनबी इस भीड़ में ढूँढे किसे मेरी नजर (ग़ज़ल 'राज')

2122  2122  2122  212

 

जिंदगी की जुस्तज़ू में आ गई जाने किधर 

अजनबी इस भीड़ में ढूँढे किसे मेरी नजर 



बे-नियाज़ी की यहाँ दीवार कैसे आ गई 

'हम नफ़स अह्ल-ए-महब्बत कुछ इधर हैं कुछ उधर 



साथ साया भी रहेगा जब तलक है रोशनी 

कौन किसका साथ देता बेवजह यूँ उम्रभर 



लौट कर आती नहीं ये खूब जीले जिंदगी 

इक सितारा कह गया यूँ आसमां से टूटकर 



खींच लाई झोंपड़ी को जब महल की रोटियाँ 

एक दिन आकर अना ने ये कहा जा डूब मर 



कोई…

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Added by rajesh kumari on October 5, 2017 at 10:46am — 14 Comments

वफ़ा के साथ यकीनन है वास्ता मेरा

1212 1122 1212 22

अलग है बात रखा नाम बेवफा मेरा ।।

वफ़ा के साथ यकीनन है वास्ता मेरा ।।



मेरे गुनाह का चर्चा है शह्र में काफी ।

तमाम लोग सुनाते हैं वाक्या मेरा ।।



नज़र नज़र से मिली और होश खो बैठा ।

उसे भी याद है उल्फत का हादसा मेरा ।।



वो आसुओं से भिगोते ही जा रहे दामन ।

पढा जो खत है अभी ,था वही लिखा मेरा ।



फ़िजा के पास रकीबों का हो गया पहरा ।

बढ़ा रही हैं हवाएं भी फ़ासला मेरा ।।



गरीब हूँ मैं शिकायत भी क्या करूँ उनकी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 5, 2017 at 9:23am — 4 Comments

ग़ज़ल -रिश्तों’ का रंग बदलता ही’ गया तेरे बाद

२१२२  ११२२  ११२२  २२(१)/ ११२(१)  ११२२

 

रिश्तों’ का रंग बदलता ही’ गया तेरे बाद

रौशनी हीन अलग चाँद दिखा तेरे बाद |

जीस्त  में कुछ नया’ बदलाव हुआ तेरे बाद

मैं नहीं जानता’ क्यों दुनिया’ खफा तेरे बाद |

हरिक त्यौहार में’ आनन्द मिला तेरे साथ

जिंदगी से हुए’ सब मोह जुदा तेरे बाद |

रात छोटी हो’ गयी और बहुत लम्बा दिन

अब तो’ जीना हो’ गई एक सज़ा तेरे बाद |

साथ आई थीं’ वो’ आपत्तियाँ’, तुझको ले’…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on October 5, 2017 at 8:30am — 4 Comments

ग़ज़ल - मिलते कहाँ हैं लोग भी होशो हवास में

221 2121 1221 212



ठहरी मिली है ज़िंदगी उनके गिलास में ।

मिलते कहाँ हैं लोग भी होशो हवास में ।।



देकर तमाम टैक्स नदारद है नौकरी ।

अमला लगा रखा है उन्होंने विकास में ।।



सरकार सियासत में निकम्मी कही गई ।

रहते गरीब लोग बहुत भूँख प्यास में ।।



बेकारियों के दौर गुजरा हूँ इस कदर ।

घोड़ा ही ढूढता रहा ताउम्र घास में ।।



यूँ ही तमाम कर लगे हैं जिंदगी पे आज ।

रहना हुआ मुहाल है अपने निवास में ।।



कितने नकाब डाल के मिलने… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 4, 2017 at 5:06pm — 13 Comments

लघुकथा - पर्यावरण-प्रेमी

"बधाई हो मिश्रा जी , हार्दिक बधाई आपको । कल के सारे अखबारों में आपकी न्यूज़ थी । सभी अखबारों ने बड़ी प्रमुखता से आपके "एण्टी-पॉलिथीन कैम्पेन " के बारे में छापा है । बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप पर्यावरण के लिए । वाकई पॉलिथीन बहुत खतरनाक है । इससे कई गायें भी काल के गाल में समा रही है ।"

" जी, गुप्ता जी ! मेरा मिशन है पॉलिथीन मुक्त पर्यावरण । चाहता हूँ सरकार इस पर पूरी तरह से बैन लगा दें । बस ! इसी में लगा हूँ । "

" देश को आप जैसे पर्यावरण बचाव योद्धाओं की ज़रूरत है ।"

" गुप्ता जी… Continue

Added by Mohammed Arif on October 4, 2017 at 4:08pm — 16 Comments

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