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ग़ज़ल -- मैं आँखों में सपने बोना चाहता हूँ

22--22--22--22--22--2



बच्चों के मन जैसा होना चाहता हूँ

बे-फ़िक्री की नींदें सोना चाहता हूँ



दुनिया के मेले में खो कर देख लिया

अब मैं ख़ुद के भीतर खोना चाहता हूँ



राग द्वेष ईर्ष्या लालच को त्याग के मैं

रूह की मैली चादर धोना चाहता हूँ



प्यार का सागर है तू मैं प्यासा सहरा

अपनी हस्ती तुझ में डुबोना चाहता हूँ



जीवन व्यर्थ गँवाया, दिल पर बोझ है ये

ख़ुद से नज़र चुरा के रोना चाहता हूँ



गीली मिट्टी है, शायद जड़ पकड़ भी… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 17, 2017 at 1:34pm — 4 Comments

किस्सा (कविता)

किस्सा
............

जिंदगी सपनों का संसार हुई.
आँखें जब से उन से चार हुई.
.
महकी इश्क की खुश्बू बहुत
दास्तानें सारी अखबार हुई.
.
याद करने का अंदाज देखो
हचकियाँ चिट्ठी पत्री तार हुई.
.
आफत में अब दिल आ गया
तेज धड़कनों की रफ्तार हुई.
.
सिलसिला कसमों का चला
रस्में ऊँची जब दीवार हुई.
.
हकीकत जमानें से बस यही
मुहब्बत किस्सों में साकार हुई.
.
(सुरेश बीनागंजवी)

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by suresh jadav 'Binaganjvi' on June 17, 2017 at 2:00am — 4 Comments

जिंदगी (कविता)

जिंदगी

...........



वक्त की रेत हाथों से, कुछ यूं फिसल गई.

जिंदगी समझे जब तक, जिंदगी निकल गई.

.

किया था वादा ता-उम्र, इमदाद का उसने

मुश्किलों मे किस्मत की भी, नीयत बदल गई.

.

बेमन उदास बैठी थी, तन्हाई में जब शाम

आमद जो उसकी हुई तो, तबियत बहल गई.

.

दुनिया की बंदिशों का, हमें इल्म है मगर

उसे पाने की फिर भी, ख्वाहिश मचल गई.

.

तूफां का जुनून 'सुरेश', काबिले तारीफ था

हौंसलों की जद्दोजहद से, कश्ती संभल…

Added by suresh jadav 'Binaganjvi' on June 17, 2017 at 1:57am — 3 Comments

कागज़ की नाव :कहानी

“यार अच्छी-खासी नौकरी है तुम्हारी ये दिन रात इंटरनेट और मोबाइल पर क्या खेल खेलते रहते हो, थोड़ा हम लोगों के पास भी बैठा करो, पिता ने बड़ी ही मित्रतापूर्वक भाव से ‘आनंद’ से पूछा !

आनंद ने अपना लैपटॉप बंद करते हुए बड़े ही सहज भाव से कहा “कुछ नहीं पिताजी आपकी समझ से बाहर है यह सब, जब मैं बड़ा आदमी बन जाऊँगा तब आपको अपने आप पता चल जाएगा !”

पिता अपना सा मुहँ लेकर खामोश हो गए तभी आनंद की माँ आ गईं और उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, बेटा सबकुछ तो ठीक चल रहा है, अच्छी खासी तन्खाव्ह है…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on June 16, 2017 at 3:30pm — 10 Comments

मछली और दाँत

मछली और दाँत

अचानक ! बरसात आती है

सड़क चलती लड़की

भीग जाती है |

एक्वेरियम की छोटी रंगीन

मछली तैर-तैर के

मन रीझ जाती है ||

x x x x x x x x

देखता हूँ टकटकी लगाए

जब तक ना होती ओझल |

“दाना-दाना-दाना-दाना”

उकसाता पुरुष मन चंचल ||

x x x x x x x x x x

बेटी सहसा आ,छेड़ देती बात

हमले से,काँप उठता है गात |

और मैं देखता हूँ छोटी मछली

और बढ़ते हुए बड़े-बड़े दाँत ||

सोमेश कुमार(मौलिक…

Continue

Added by somesh kumar on June 16, 2017 at 2:48pm — 1 Comment

गज़ल

-----ग़ज़ल -----



*2122 1212 22*



हाथ काफी मले गए हर सू ।

कुछ सयाने गए छले हर सू ।।



बात बोली गई दीवारों से ।

खूब चर्चे सुने गए हर सू ।।



आग का कुछ पता न् चल पाया ।

बस धुंआ ही धुंआ उठे हर सू ।।



इक तरन्नुम में पढ़ ग़ज़ल मेरी ।

ये ज़माना तुझे सुने हर सू ।।



जुर्म की हर निशानियाँ कहतीं ।

अश्क़ यूं ही नहीं बहे हर सू ।।



वह मुहब्बत में डूबती होगी ।

ढूढ़ दरिया में बुलबुले हर सू ।।



रात मिलकर गई है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on June 16, 2017 at 2:01pm — 2 Comments

ग़ज़ल -- अच्छे कर्मों का दिनेश अच्छा नतीज़ा होगा ( दिनेश कुमार )

2122____1122____1122____22



सर पे साया जो बुज़ुर्गों की दुआ का होगा

कामयाबी का सफ़र अपना सुहाना होगा



उसकी रोटी से जो आती है पसीने की महक

उसके घर ख़ुशबू-ए-बरकत का ख़ज़ाना होगा



रोज़े-महशर तेरी दौलत नहीं काम आयेगी

साथ बस तेरे सवाबों का पिटारा होगा



झूट को झूट सरे-बज़्म कहा है जिसने

देखना शर्तिया वो ज़हन से बच्चा होगा



मैंने ता-उम्र यही सोच के काटी अपनी

शब गुज़र जायेगी, क़िस्मत में सवेरा होगा



आबला-पाई मेरी और… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 15, 2017 at 11:55pm — 2 Comments

तुम्हारी कसम ...

तुम्हारी कसम ...

सच

तुम्हारी कसम

उस वक़्त

तुम बहुत याद आये थे

जब

सावन की फुहारों ने

मेरे जिस्म को

भिगोया था

जब

सुर्ख़ आरिज़ों से

फिसलती हुई

कोई बूँद

ठोडी पर

किसी के इंतज़ार में

देर तक रुकी रही

जब

तुम्हारे लबों के लम्स

देर तक

मेरे लबों से

बतियाते रहे

जब

घटाओं की

कड़कती बिजली में

मैं काँप जाती

जब

बरसाती तुन्द हवाओं से…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 15, 2017 at 9:35pm — 6 Comments

गाँव जबसे कस्बे - -- -

गाँव जबसे कस्बे - - - -

गाँव जबसे कस्बे

होने लगे |

बीज अर्थों के,रिश्तों में

बोने लगे |

गाँव जबसे कस्बे- - - -

पेपसी,ममोज़ चाऊमीन से

कद बढ़ गया |

सतुआ-घुघुरी-चना-गुड़ से

बौने लगे |

पातियों का संगठन

खतम हो गया

बफ़र का बोझ अकेले ही

ढोने लगे |

गाँव जबसे कस्बे- - - -

पत्तलों कुल्ल्हडो की

 खेतियाँ चुक गईं |

थर्माकोल-प्लास्टिक से

खेत बोने लगे…

Continue

Added by somesh kumar on June 15, 2017 at 9:30am — 3 Comments

ग़ज़ल -- दुनिया से जो बशर गये, लौटे हैं क्या कभी ? ( दिनेश कुमार )

221 -------- 2121 -------- 1221 - - - - 212



मानिंद-ए-शम्अ बज़्म में आ कर ग़ज़ल कहें

आलम है तीरगी का, मिटा कर ग़ज़ल कहें



रस्ते के सब पड़ाव क़वाफ़ी की शक़्ल हों

और लक्ष्य को रदीफ़ बना कर ग़ज़ल कहें



मफ़हूम क्या हो, चर्ख़े-तख़य्युल का चाँद हो

महफ़िल को हुस्ने-ख़्वाब दिखा कर ग़ज़ल कहें



गुलकन्द की मिठास, तग़ज़्ज़ुल, जदीदियत

हर शेर में ये ख़ूबियाँ ला कर ग़ज़ल कहें



होंठों पे सामयीन के आ जाए मरहबा

अल्फ़ाज़ उँगलियों पे नचा कर… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 15, 2017 at 4:28am — 6 Comments

ग़ज़ल --बेवफ़ा मुझको कहो मत मैं अता हो जाऊंगा

2122 2122 2122 212



मैं तेरे अहले चमन का सिलसिला हो जाऊंगा।

बेवफा मुझको कहो मत मैं अता हो जाऊंगा ।।



कुछ तेरी फ़ितरत है ऐसी कुछ मेरी आवारगी ।

वस्ल के आने पे तेरा मयकदा हो जाऊंगा ।।



घुघरूओं की ये सदायें छू रही हैं रूह को ।

मैं तेरी महफ़िल में आकर बाखुदा हो जाऊंगा।।



अब मेरे हालात पर नज़रे इनायत कीजिये ।

आपकी इस जिंदगी का तज्रिबा हो जाऊंगा ।।



बज़्म में लाखों दीवाने आ गए हैं आपके ।

कौन कहता आपका मै रहनुमा हो जाऊंगा… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on June 15, 2017 at 1:00am — No Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
...जब हर ओर विसंगतियाँ हैं (गीत)

कहाँ भला ख़ुशियों को ढूँढें 

जब हर ओर विसंगतियाँ हैं...

क़समों-वादों के पत्तों पर सजे हुए हर ओर जुए हैं 

सतहों तक स्पर्श रुके बस, कोर किसी ने कहाँ छुए हैं 

कोशिश बिन रेशम से नाज़ुक बन्धन अब कैसे सँवरेंगे 

जीवन की आपाधापी में रिश्ते जब बेमोल हुए हैं

उफ़! विकल्प हैं अपनों के भी 

बाँचे कौन! कहाँ कमियाँ हैं ?

कहाँ भला ख़ुशियों को ढूँढें जब हर ओर विसंगतियाँ हैं...

मानवता का घूँघट ओढ़े दानव बैठे घात…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on June 14, 2017 at 9:15pm — No Comments

कालू की बेटी (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

आज फिर यहां लोगों का जमावड़ा था। हर तबके की हर आयु वर्ग की लड़कियों, महिलाओं या पुरुषों​का आना-जाना कुछ दिनों से चल रहा था। कोई आभार व्यक्त करने, तो कोई मदद पाने के इरादे से सम्पर्क साधने की कोशिश में था। दरअसल दो सालों के बाद कालू की बेटी विदेश से आई हुई थी। कोई कालू को घेरे हुए था, तो कोई उसकी बेटी को। कालू को सेवा-मुक्त हुए लम्बा समय हो चुका था। बड़े नेताजी के बगीचे के माली बनने से लेकर उनका खास ड्राइवर बनने और फिर उनके खेतों का रखवाला बनने तक के तजुर्बे और फिर रिटायर होने पर लोगों से घिरे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 14, 2017 at 1:58pm — 5 Comments

1 . नटखट नज़र .../2 . भीगी सौगातें ...

1 . नटखट नज़र ...

हो जाती बरसात तो गज़ब  होता
फिर वो भीगी हया का क्या होता
वो उड़ती चुनर पे नटखट  नज़र
भटक जाती अगर तो क्या  होता

2 . भीगी सौगातें ..

.

सावन की रातें हैं सावन की बातें है 

सावन में भीगी सी चंद मुलाकातें है
इक दूजे में सिमटे वो भीगे से  लम्हे
साँसों की साँसों को भीगी सौगातें हैं

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on June 14, 2017 at 1:30pm — 4 Comments

गज़ल

1222 1222 122

उसे सर पर बिठाया जा रहा है ।

किसी पे जुर्म ढाया जा रहा है ।।



उन्हें मालूम है अपनी तरक्की ।

जहर को आजमाया जा रहा है ।।



चलेगा किस तरह गर्दन पे ख़ंजर ।

तरीका सब सिखाया जा रहा है ।।



जो नफरत में चलाता रोज पत्थर ।

उसे अपना बताया जा रहा है ।।



जो चारा खा चुके हैं जानवर का ।

उन्हें नेता बुलाया जा रहा है ।।



वो गायें काटते हैं वोट खातिर ।

नया मजहब चलाया जा रहा है ।।



जे एन यू में है गद्दारी का… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on June 14, 2017 at 12:30am — 6 Comments

मुहब्बत होती है

मात्रिक छंद आधारित एक गीतिका

 

स्वीट कभी नमकीन, मुहब्बत होती है

जग में बहुत हसीन, मुहब्बत होती है

 

थोड़ा  थोड़ा  त्याग, तपस्या हो  थोड़ी,

फिर न कभी ग़मगीन, मुहब्बत होती है

 

चढ़ती है परवान, नाम दुनिया में होता,

जितनी  भी  प्राचीन, मुहब्बत होती…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2017 at 3:39pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हम पत्थर को अपना बैठे (छोटी बह्र पर ग़ज़ल 'राज')

२ २ २ २  २ २ २ २

हम अपनों को बिसरा बैठे

गम पास हमारे आ बैठे

 

 जलने की तमन्ना थी दिल में

सूरज को हाथ लगा बैठे

 

तुम शाद रहो आबाद रहो

हम तो दिल को फुसला बैठे

 

जब दुनिया में इंसा न मिला

हम पत्थर को अपना बैठे

 

कश्ती ने  हाथ बढ़ाया जब

 हम दूर किनारे  जा बैठे

 

कैसा शिकवा कैसा गुस्सा

किस्मत से हाथ मिला बैठे

 

गिर्दाब बनाया  हमने जो                                  …

Continue

Added by rajesh kumari on June 13, 2017 at 12:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

तेरे अक्स के ख्वाब आते रहेंगे ।

मुहब्बत की रस्मे निभाते रहेंगे ।।



ये जुल्फों के साये में तेरे तबस्सुम ।

मुझे उम्र भर तक सताते रहेंगे ।।



नज़ारों से लूटा गया हूँ बहुत मैं ।

मगर फिक्र दिल से उडाते रहेंगे ।।



न ठुकरा सकोगी हमारी मुहब्बत ।

यकीनन तुझे याद आते रहेंगे ।।



बड़ी आरजू थी मुलाकात होगी ।

खबर क्या थी चिलमन गिराते रहेंगे ।।



तेरी खुशबुओं को बिखेरा करें वो ।

हवाओं से चर्चा चलाते रहेंगे… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on June 13, 2017 at 12:30am — 13 Comments

ख़ामोशी (हाइकू)

1

कैसी ख़ामोशी

हर तरफ़ देखो

रात खामोश



2

यह जो तुम

हो गये हो ख़ामोश

बदली छायी ।



3

बदल गए

सोचा न ऐसा  कभी

ख़ामोशी बोली ।



4

दूर हो गए

कदम ख़ामोशी के

चलते चले ।



5

जब टूटेगी

ख़ामोशी बादलों की

वर्षा ही होगी ।



6

सुनायी देती

ख़ामोशी की ज़ुबान

आँखों में देख ।



7

लम्बी ख़ामोशी

काँटो सी है चुभति

समझे कोई ।



8

रहने लगे…

Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 12, 2017 at 11:00pm — 2 Comments

***असली कीमत***(लघुकथा)राहिला

उस जबरदस्त भूकंप के शांत होने पर शुभा ने खुद को अपनी नन्ही बिटिया के साथ जाने कितने ही नीचे मलवे में दबा पाया।भाग्य से छत का एक बड़ा सा हिस्सा कुछ ऐसे गिरा कि एक गार सी बन गयी।और चंद सांसे उधार मिल गयी ।दोनों सहमी सी ,आपस में सिमटी हुई मदद की उम्मीद में एक दूसरे का सहारा बनी हुई थीं।लेकिन जब काफी समय गुजर गया और किसी का हाथ मदद के लिए आता नहीं दिखाई पड़ा तो घोर निराशा ,डर और सामने बाहें फैलाये मौत को देख कर आंखों से बेबसी बरस पड़ी ।

"मम्मा!भूख लगी है।"नन्ही रिया ने उस का ध्यान… Continue

Added by Rahila on June 12, 2017 at 8:08pm — 7 Comments

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