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1222 1222 122
उसे सर पर बिठाया जा रहा है ।
किसी पे जुर्म ढाया जा रहा है ।।

उन्हें मालूम है अपनी तरक्की ।
जहर को आजमाया जा रहा है ।।

चलेगा किस तरह गर्दन पे ख़ंजर ।
तरीका सब सिखाया जा रहा है ।।

जो नफरत में चलाता रोज पत्थर ।
उसे अपना बताया जा रहा है ।।

जो चारा खा चुके हैं जानवर का ।
उन्हें नेता बुलाया जा रहा है ।।

वो गायें काटते हैं वोट खातिर ।
नया मजहब चलाया जा रहा है ।।

जे एन यू में है गद्दारी का आलम ।
हमारा घर मिटाया जा रहा है ।।

न जाने क्या बिगाड़ा सैनिकों ने ।
मनोबल फिर गिराया जा रहा है ।।

करोड़ो लूट कर बोली बहन जी ।
हमें झूठा फसाया जा रहा है ।।

सियासत हो रही है जातियों पर ।
नया कानून लाया जा रहा है ।।

सड़क तो बन चुकी कागज में देखो ।
हक़ीक़त को छुपाया जा रहा है ।।

सलाखों तक कहाँ जाते हैं मुजरिम ।
महज पर्दा उठाया जा रहा है ।।

ये मौसेरे से भाई लग रहे हैं ।
बड़ा रिश्ता निभाया जा रहा है ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित
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Comment by Naveen Mani Tripathi on June 14, 2017 at 9:45pm
भाई नरेंद्र सिंह चौहान जी धन्यवाद ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on June 14, 2017 at 9:44pm
आ0 सुशील शरण जी सादर आभार
Comment by Sushil Sarna on June 14, 2017 at 1:53pm

वर्तमान को जीवंत करती इस हकीकत भरी ग़ज़ल के लिए दिल बधाई स्वीकारें आदरणीय। 

Comment by narendrasinh chauhan on June 14, 2017 at 1:02pm

सुन्दर रचना 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 14, 2017 at 10:46am
आ0 बसंत कुमार शर्मा जी सादर आभार ।
Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 14, 2017 at 10:18am

वाह शानदार ग़ज़ल 

करोड़ों लूट कर बोलीं बहन जी ...क्या बात है 

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