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ग़ज़ल -- दुनिया से जो बशर गये, लौटे हैं क्या कभी ? ( दिनेश कुमार )

221 -------- 2121 -------- 1221 - - - - 212

मानिंद-ए-शम्अ बज़्म में आ कर ग़ज़ल कहें
आलम है तीरगी का, मिटा कर ग़ज़ल कहें

रस्ते के सब पड़ाव क़वाफ़ी की शक़्ल हों
और लक्ष्य को रदीफ़ बना कर ग़ज़ल कहें

मफ़हूम क्या हो, चर्ख़े-तख़य्युल का चाँद हो
महफ़िल को हुस्ने-ख़्वाब दिखा कर ग़ज़ल कहें

गुलकन्द की मिठास, तग़ज़्ज़ुल, जदीदियत
हर शेर में ये ख़ूबियाँ ला कर ग़ज़ल कहें

होंठों पे सामयीन के आ जाए मरहबा
अल्फ़ाज़ उँगलियों पे नचा कर ग़ज़ल कहें

जिस बज़्म में न पीने-पिलाने का दौर हो
हम जैसे रिन्द क्या वहाँ जा कर ग़ज़ल कहें

दुनिया से जो बशर गये, लौटे हैं क्या कभी ?
याद उनकी अपने दिल में बसा कर ग़ज़ल कहें

तब आएगा यक़ीं कि ग़ज़लगो हैं आप भी
दिल के तमाम ज़ख़्म छुपा कर ग़ज़ल कहें

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' yesterday
बेहतरीन..हर एक शे'र लाजबाब बधाइयाँ

तब आएगा यक़ीं कि ग़ज़लगो हैं आप भी
दिल के तमाम ज़ख़्म छुपा कर ग़ज़ल कहें..जबरजस्त
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on Friday

शुभान  अल्लाह . क्या मुकम्मिल गजल कही है , वाह वाह  और वाह .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 18, 2017 at 9:14pm

वाह्ह्ह वाह्ह्ह शानदार ग़ज़ल कही है आद० दिनेश कुमार जी दिल से मुबारकबाद कुबूलें 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 17, 2017 at 9:31pm

बेहतरीन ग़ज़ल 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 17, 2017 at 9:17pm
आपकी यह ग़ज़ल मुझे सर्वाधिक पसंद आयी ढेर सारी बधाई आदर्नीयभै दिनेश जी आपकी रचना में उर्दू के शब्द बहुतायत से होते हैं उनके अर्थ लिखने का आपसे निवेदन कर रहा हूँ सादर
Comment by Sushil Sarna on June 15, 2017 at 7:18pm

तब आएगा यक़ीं कि ग़ज़लगो हैं आप भी
दिल के तमाम ज़ख़्म छुपा कर ग़ज़ल कहें
वाह क्या बात है आदरणीय दिनेश जी ... दिलकश अशआर दिल के अहसासों से लबरेज़ हैं। इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें सर।

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