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गीत (लावणी व कुकुभ मिश्रित)

आधार छन्द : 16+14 लावणी व कुकुभ मिश्रित,,



कोयल कुहुकी मैना बोली,भौंरे गूँजे भोर हुई ।।

आँख चुराये चन्दा भागा,रैन बिचारी चोर हुई ।।

कोयल कुहुकी,,,,



पूरब में ज्यों लाली निकली,सजा आरती धरा खड़ी,

उत्तुंग हिमालय पर लगता,कंचन की हो रही झड़ी,

बर्फ लजाकर लगी पिघलने,हिमनद रस की पोर हुई ।।(1)

कोयल कुहकी मैना बोली,भौंरे,,,,



सात अश्व के रथ पर चढ़कर,आ गए दिवाकर द्वारे,

स्वागत में मुस्काई कलियाँ,भँवरों नें मन्त्र उचारे,

सूर्यमुखी को देख…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2017 at 12:00am — 4 Comments

कविता-एक कविता लिखना चाहता हूँ

धूल , मिट्टी और गारे से सनी

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

मिट्टी की सौंधी महक वाली

गोबर से लीपे आँगन वाली

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

टूटे खाट पर बैठी

जाड़े में धूप सेंकती

सौ बरस की बुढ़िया पर

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

कुएँ , चौपाल , चरवाहें

खूँटे से बंधे चौपायों पर

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

आम , इमली , नीम ,…

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Added by Mohammed Arif on January 17, 2017 at 10:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल (नया नग्मा कोई गाओ)

1 2 2 2     1 2 2 2

नया नग्मा कोई गाओ

पुराने ग़म चले आओ

तुम्हें उड़ना सिखा दूँगा

मिरे पिंजड़े में आ जाओ

अकेलापन अगर अखड़े

उदासी को बुला लाओ

अरे भँवरे, अरी चिड़िया

ग़ज़ल कोई सुना जाओ

शजर बोला परिंदे से

मुहाजिर लौट भी आओ

हमारा दिल तुम्हारा घर

कभी आओ, कभी जाओ

 

मौलिक और अप्रकाशित

...दीपक कुमार

Added by दीपक कुमार on January 17, 2017 at 1:37pm — 9 Comments

वो सवाल...

क्या जवाब दूँ तुम्हे मैं...ये जो सवाल है तुम्हारा...

हर रोज्र हारता हूँ...यहीं तो हाल है हमारा...

 

ये ख्वाब हीं बुरे हैं...

या फिर बुरा सा मैं हूँ...

सौ बार सोचता हुँ...

कुछ तो भला सा कह दूँ..

 

हर वक़्त एक सपना...

हाफीज्र सदा है मेरे...

कुछ पास है हमारे...

कुछ पास में है तेरे...

 

मै वक़्त का मुसाफिर...

अब वक़्त ढुँढता…

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Added by Aditya lok on January 16, 2017 at 10:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल- रोज करता खेल शह औ मात का

2122       2122       212

रोज करता खेल शह औ मात का।

रहनुमा पक्का नहीं अब बात का।।

कब पलट कर छेद डाले थालियाँ।

कुछ भरोसा है नहीं इस जात का।।

पत्थरों के शह्र में हम आ गए।

मोल कुछ भी है नहीं जज़्बात का।।

ख्वाहिशें जब रौंदनी ही थी तुम्हे।

क्यूँ दिखाया ख़्वाब महकी रात का।।

इंकलाबी हौसलें क्यों छोड़ दें।

अंत होगा ही कभी ज़ुल्मात का।।

मेंढकों थोड़ा अदब तो सीख लो।

क्या भरोसा…

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Added by डॉ पवन मिश्र on January 16, 2017 at 9:34pm — 17 Comments

गीत-गुलसितां दिल का खिलाते रह गए//(अलका ललित )

2122 2122 212

.

गुलसितां दिल का खिलाते रह गए

फासले दिल के मिटाते रह गए

गुलसितां दिल का........

.

चाहतें अपनी बड़ी नादान थी

इश्क की राहें कहा आसान थी

फिर भी हम कसमें निभाते रह गए

फासले दिल के मिटाते ......

.

हाथ में तेरे मेरा जब हाथ हो

जिंदगी कट जाएगी गर साथ हो

हम भरोसा ही जताते रह गए

फासले दिल के मिटाते ...

.

चाह थी तो छोड़ कर ही क्यूँ गया

वास्ता देकर वफ़ा का क्यूँ भला

बेवजह दामन हि थामे रह…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on January 16, 2017 at 9:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल -- मिसाले-ख़ाक-बदन वक़्त के ग़ुबार में थे ( दिनेश कुमार )

1212--1122--1212--22

~~~~~~~

~~~~~~~

मिसाले-ख़ाक सभी वक़्त के ग़ुबार में थे

न जाने कौन थे हम और किस दयार में थे

~~

न शख़्सियत के सभी रंग इश्तिहार में थे

जो रहनुमा थे.. सियासत के कारो-बार में थे

~~

अँधेरा शह्र में बे-ख़ौफ़ रक़्स करता रहा

चराग़ सारे... हवाओं के इख़्तियार में थे

~~

बताओ मज़िले-मक़सूद किस तरह मिलती

तरह तरह के मनाज़िर जो रहगुज़ार में थे

~~

निशान-ए-आब नहीं था वहाँ पे दूर तलक

हयातो-मर्ग के हम ऐसे रेग-ज़ार… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 16, 2017 at 6:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल (दिल ने धड़कन उधार ले ली है)

2 1 2 2  1 2 1 2   2 2/1 1 2 /2 2 1/1 1 2 1

दिल ने धड़कन उधार ले ली है

कितनी मोटी पगार ले ली है

ख़ूबसूरत लगी तो हमने भी

इक उदासी उधार ले ली है

फिर हवाओं से एक ताइर ने

दुश्मनी बार-बार ले ली है

हमने सुनसान राह में यादों की

इक रिदा ख़ुशगवार ले ली है

हँस-हँसा कर ज़रा संवर जाओ

आँसुओं से निखार ले ली है

 

मौलिक और अप्रकाशित

...दीपक कुमार

Added by दीपक कुमार on January 16, 2017 at 3:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल

बह्र 2122 2122 2122



रंजो ग़म में दिल मेरा उलझा हुआ है।

अश्क़ से तकिया तभी भीगा हुआ है।।



तू समझ पाये भी कैसे ये रवानी।

इश्क़ का दरिया तेरा सूखा हुआ है।।



साथ रहकर साथ वो क्योंकर नही था।

हर ज़ुबां पे ये सवाल आया हुआ है।।



ग़म मुझे दो और तुम हद से ज़ियादा।

क्योंकि ये चेहरा मेरा हँसता हुआ है।।



रास्ते भटकूँगा आख़िर क्यों भला मैं।

वक़्त का पहलू मेरा देखा हुआ है।।



पी के सब कड़वाहटें इस ज़िन्दगी की।

दोस्तों लहजा मेरा…

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Added by gaurav kumar pandey on January 16, 2017 at 12:30pm — 10 Comments

तुम...

हर रोज कहानी तेरी...

हर रोज तेरा अफसाना...

हम गूंथ रहे ख्वाबों में...

इस दिल का ताना बाना...

बस एक वो तेरी …

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Added by Aditya lok on January 16, 2017 at 12:30pm — 3 Comments

सब क़ुबूल अब तो बेवफा के सिवा (तरही गजल)

बह्र 2122 1212 22



ज़िन्दगी क्या है इक खता के सिवा

कुछ करो यार कल्पना के सिवा ||



सोचता हूँ ग़ज़ल कहूँ कैसे

जानकारी न काफ़िया के सिवा||



जो भी चाहो कहो मुझे यारो

सब क़ुबूल अब तो बेवफा के सिवा ||



अब समझना मुझे नही आसाँ

कोई समझे न दिलरुबा के सिवा ||



तुम कभी रूठ जाते हो मुझसे

बात बनती न इल्तिज़ा के सिवा||



आज भी मुल्क में गरीबी है

क्या मिला हमको योजना के सिवा||



दर सभी आजमा लिए हमने

*कोई… Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 16, 2017 at 8:38am — 10 Comments

ओ री चंदनिया//रवि प्रकाश

ओ री चंदनिया!

ओ री चंदनिया तुझको सब तारे क्या कहते हैं

मैं तो धड़कन कहता हूँ ये सारे क्या कहते हैं।

क्या कहते हैं अम्बर के जागे जागे उजियारे

मीलों मीलों धरती के अँधियारे क्या कहते हैं।



कैसा लगता है तुझको बादल जब गाते हैं

कुछ तन को छू लेते हैं कुछ मन तक आते हैं।

सिहरन सी होती है क्या बिजली की अँगड़ाई से

हुलसा करता है हियरा मिलकर क्या पुरवाई से।

बूंदें जब छू लेती हैं तुझको सावन भादों में

अक्सर क्या खो जाती है तू भी मेरी यादों में।

परबत… Continue

Added by Ravi Prakash on January 16, 2017 at 8:33am — 7 Comments

कविता..मेरे मुस्कुराने का कारण हो तुम

मेरे मुस्कुराने का कार हो तुम

तन्हाई में गुनगुनाने का कार हो

तपती दोपहर में बरसते सावन में

भीड़ में और दूर तलक

वीरान उदास राहों में

कभी फूलों भरी और

कभी छितराए हुए काँटों में

बेपरवाह चलते जाने का कार हो

जब कभी तन्हाई मुझे सताती है

दिल को झकझोरती है और

आत्मा को जलाती है

लेकिन वो भूल जाती है

उसके साथ-साथ तुम्हारी याद

हर लम्हा मुझे सहलाती है

और अहसास ये होता

तुम मेरे साथ हो…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 15, 2017 at 5:30pm — 6 Comments

माटी का दिया ...

माटी का दिया ......

जलता रहा
इक दिया
अंधेरों में
रोशनी के लिए

तम
अधम
करता रहा प्रहार
निर्बल लौ पर
लगातार

आख़िर
हार गया वो
धीरे धीरे
कर लिया एकाकार
अंधकार से


रह गया शेष
बेजान
माटी का दिया
फिर जलने को
अन्धकार में
गैरों के लिए

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on January 15, 2017 at 4:24pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दूधिया चादर में लिपटी वादियाँ (वादियों की एक दिलकश सुबह ग़ज़ल "राज")

2122   2122  212

सुन हवाओं की जवाँ सरगोशियाँ

दूधिया चादर में लिपटी वादियाँ

 

देख  भँवरे   की नजर  में शोखियाँ  

चुपके  चुपके हँस रही थीं  तितलियाँ

 

 नींद में सोये  कँवल भी जग उठे     

गुफ्तगू जब कर रही थी किश्तियाँ

 

 छटपटाती कैद में थी  चाँदनी

हुस्न को ढाँपे हुए थी बदलियाँ

 

मुट्ठियों में भींच के सिन्दूर को

मुन्तज़िर खुर्शीद की थी रश्मियाँ  

 

फिक्र-ए-शाइर पे भी छाया नूर…

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Added by rajesh kumari on January 15, 2017 at 1:30pm — 18 Comments

ज़ेवर ( लघुकथा)

"अरे! लड़कियों जल्दी से भीतर आओ बड़ी मालकिन बुला रही हैं।" हवेली की बुजुर्ग नौकरानी ने आंगन में गा-बजा रही लड़कियों को पुकारा तो सब उत्साहित हो झट से चल पड़ी।

मालकिन की तो ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। आखिर इकलौते पोते की पसन्द को स्वीकारने के लिए उन्होंने अपने बहू-बेटे को मना जो लिया था। पर इसके लिए उन्होंने यह शर्त भी रखी थी कि विवाह उनके पारिवारिक रीति-रिवाज से होगा। भावी वधू के साथ-साथ घर की स्त्रियां भी चाव से गहने देखने लगी।

"अरे ! ये मांग टीका अब कौन पहनता है?" होने वाली बहू की छोटी…

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Added by Seema Singh on January 14, 2017 at 11:00pm — 21 Comments

हुआ है धमाका/// गजल

122 122 122 122

 

सियासत के जरिये हुआ है धमाका

जुबां बंद करिये हुआ है धमाका

 

किसे फ़िक्र है अब लहू फिर बहेगा  

कि वहशत बजरिये हुआ है धमाका

 

कहाँ शांति रहती है सरहद पे यारों

ज़रा आँख भरिये हुआ है धमाका

 

है जाना जरूरी चले जाइयेगा

तनिक तो ठहरिये हुआ है धमाका

 

बड़ी देर से आप चश्मेकफस में 

कि आहिस्ता ढरिये हुआ है धमाका

 

नहीं खून का खेल गर खेल सकते

तो…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 14, 2017 at 8:58pm — 13 Comments

प्रश्न सूरज पे ये होना था, वो छिपा क्यूँ है?- ग़ज़ल--पंकज मिश्र

2122 2122 22 1222



सब किताबों से अलग तेरा फ़लसफ़ा क्यूँ है?

उस ने पूछा तू बता दुनिया से जुदा क्यूँ है?



सर्द रातों की वजह पछुवा ये पवन है क्या?

प्रश्न सूरज पे ये होना था, वो छिपा क्यूँ है?



पेट खाली औ न हो घर तो फिर यही तय था

पूछ मत यारा धुआँ घाटों पे उठा क्यूँ है?



छोड़ चिंता ये गरीबों की चल रज़ाई में

नींद में अपनी ख़लल खुद ही डालता क्यूँ है?



कर्म का फल तो सभी को ही है यहाँ मिलना

प्रीत तू भय से जगाने की सोचता क्यूँ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 14, 2017 at 8:26pm — 9 Comments

तू दूर हो तो मौत से कोई गिला नहीं।

२२१/२१२१/१२२१/२१२

तू दूर हो तो मौत से कोई गिला नहीं।

हो पास गर तो कुछ भी यहाँ ज़ीस्त सा नहीं।



आएगी रौशनी यहाँ छोटी दरारों से,

है झौपड़ी में कोई दरीचा बड़ा नहीं।



आएगा कैसे घर पे कहो कोई नामाबर,

उनके किसी भी ख़त पे जब अपना पता नहीं।



मैं सोचता हूँ कह लूँ मुकम्मल ग़ज़ल मगर,

मेरे मिज़ाज का कोई भी क़ाफ़िया नहीं।



ढूँढोगे तुम तो चाँद से मिल जायेंगे, मगर,

"रोहित" सा इस जहाँ में कोई दूसरा नहीं।







रोहिताश्व…

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Added by रोहिताश्व मिश्रा on January 14, 2017 at 5:00pm — 9 Comments

यथार्थ या सत्यार्थ (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

" अच्छा लगता है कि तुम मेरी ज़िन्दगी के इस मुकाम पर भी हमेशा की तरह अपनों की तरह समझाईश देती हो! " उसने सिगरेट का धुआँ मुंह से छोड़ते हुए अपनी इकलौती ख़ास सहेली से कहा।



"समझाईश! कभी असर हुआ मेरी समझाईश का तुम पर? अरे, माँ-बाप के अरमानों का नहीं,तो अपने असली वजूद का अब तो कुछ ख़्याल करो!"



सहेली की बात पर मुस्कराते हुए उसने कहा- "तूने कौन से तीर मार लिए? मैंने तो ऐसी कई सच्चाइयों को नज़दीक़ से जान लिया है, जो तुम्हारी जैसी कई बयान तक नहीं कर पातीं! खुश हूँ मैं अपनी इस… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 14, 2017 at 4:31pm — 8 Comments

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