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रोहिताश्व मिश्रा
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  • फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश)
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रोहिताश्व मिश्रा's blog post was featured

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।

12122/12122इक अजनबी दिल चुरा रहा था। करीब मुझ को' बुला रहा था।वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स, मगर दिये भी जला रहा था।वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में, न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।सबक़ मुहब्बत का' हम से' पढ़ कर, हमें मुहब्बत सिखा रहा था।बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"। नहीं तो' ये आईना रहा था।रोहिताश्व मिश्रा, फ़र्रुखाबादमौलिक एवम अप्रकाशितSee More
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रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
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रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
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Ravi Shukla commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"आदरणीय रोहिताश्‍व जी अच्छी ग़ज़ल पेश की है आपने ..बधाई"
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रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"थैंक्यू ब्रजेश भाई जी बहुत बहुत थैंक्यू"
Apr 20
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"थैंक्यू ब्रजेश भाई जी बहुत बहुत थैंक्यू"
Apr 20
रोहिताश्व मिश्रा posted a blog post

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।

12122/12122इक अजनबी दिल चुरा रहा था। करीब मुझ को' बुला रहा था।वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स, मगर दिये भी जला रहा था।वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में, न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।सबक़ मुहब्बत का' हम से' पढ़ कर, हमें मुहब्बत सिखा रहा था।बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"। नहीं तो' ये आईना रहा था।रोहिताश्व मिश्रा, फ़र्रुखाबादमौलिक एवम अप्रकाशितSee More
Apr 20
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
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रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
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Samar kabeer commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"जनाब रोहिताश्व मिश्रा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । 'वो सबक़-ए-उल्फ़त हमीं से पढ़ कर' "सबक़"शब्द अरबी भाषा का है, इसलिये इसमें इज़ाफ़त नहीं लगेगी,ये मिसरा यूँ कर सकते हैं :- 'सबक़ मुहब्बत का…"
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Nilesh Shevgaonkar commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"अच्छी ग़ज़ल पेश की है आपने ..बधाई "
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इक अजनबी दिल चुरा रहा था।

12122/12122

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
करीब मुझ को' बुला रहा था।

वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स,
मगर दिये भी जला रहा था।

वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में,
न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।

सबक़ मुहब्बत का' हम से' पढ़ कर,
हमें मुहब्बत सिखा रहा था।

बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"।
नहीं तो' ये आईना रहा था।

रोहिताश्व मिश्रा, फ़र्रुखाबाद

मौलिक एवम अप्रकाशित

Posted on April 18, 2017 at 1:30pm — 13 Comments

कब ख़ुद को मुख्तार करोगे

22/22/22/22



तूफाँ से गर प्यार करोगे,

बाहों को पतवार करोगे।



अब कर दो इज्हार-ए-मुहब्बत,

कब तक छुप छुप प्यार करोगे।



छोड़ोगे कब हुक़्म बजाना,

कब ख़ुद को मुख्तार करोगे।



पेश आएंगे सभी अदब में,

जब खुद शिष्ट आचार करोगे।



दरिया पार तभी होगा जब,

ज़र्फ़ अपना पतवार करोगे।



इश्क़ में' हद से' गुज़रने वालों,

तुम ख़ुद को बीमार करोगे।



शाम हुई फैला अँधियारा,

जाने कब इज़्हार* करोगे।

*चराग़ रौशन करना…

Continue

Posted on February 15, 2017 at 4:30pm — 11 Comments

तू दूर हो तो मौत से कोई गिला नहीं।

२२१/२१२१/१२२१/२१२

तू दूर हो तो मौत से कोई गिला नहीं।

हो पास गर तो कुछ भी यहाँ ज़ीस्त सा नहीं।



आएगी रौशनी यहाँ छोटी दरारों से,

है झौपड़ी में कोई दरीचा बड़ा नहीं।



आएगा कैसे घर पे कहो कोई नामाबर,

उनके किसी भी ख़त पे जब अपना पता नहीं।



मैं सोचता हूँ कह लूँ मुकम्मल ग़ज़ल मगर,

मेरे मिज़ाज का कोई भी क़ाफ़िया नहीं।



ढूँढोगे तुम तो चाँद से मिल जायेंगे, मगर,

"रोहित" सा इस जहाँ में कोई दूसरा नहीं।







रोहिताश्व…

Continue

Posted on January 14, 2017 at 5:00pm — 9 Comments

कोई सूरज भी ढल रहा होगा।

2122/1212/22

चाँद जब भी निकल रहा होगा।
कोई सूरज भी ढल रहा होगा।

ज़िन्दगी भर न वो रहेगा यूँ,
उस का दिल भी पिघल रहा होगा।

मर्ज़-ए-दिल हम को ही नहीं केवल,
उसका भी दम निकल रहा होगा।

चोट खाने के बाद हम सा ही,
आज वो भी सँभल रहा होगा।

हम को इतना यक़ीं तो है 'रोहित',
हिज़्र में वो भी जल रहा होगा।

रोहिताश्व मिश्रा
फ़र्रुखाबाद
(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

Posted on December 21, 2016 at 11:21am — 14 Comments

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At 4:24pm on December 20, 2016, रोहिताश्व मिश्रा said…
शुक्रियः सर
At 1:56pm on May 21, 2016, रोहिताश्व मिश्रा said…
तुम इस को बन्द कर लो लाख़ पहरों मे भले रोहित ।
मगस को लौट कर जलाने शमा के पास जाना है।।
At 1:24am on November 22, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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