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रोहिताश्व मिश्रा
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Samar kabeer commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।
"जनाब रोहित 'रौनक़' साहिब आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । '  मैं   दादी  की   वसीयत  लेकर  आया  हूँ' इस मिसरे में क़ाफ़िया ठीक नहीं "वसीयत"122 है ।"
Dec 1, 2018
राज़ नवादवी commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।
"आदरणीय रोहिताश्व जी आदाब, सुन्दर ग़ज़ल की पेशकश पे दिली मुबारकबाद. सादर. "
Dec 1, 2018
Mohammed Arif commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।
"आदरणीय रोहिताश्व जी आदाब,                    बहुत ही उम्दा ग़ज़ल । हर शे'र माकूल । दिली मुबारकबाद कुबूल करेन । बाक़ी उस्ताद शाइर अपनी राय देंगे , इंतज़ार कीजिए ।"
Nov 30, 2018
रोहिताश्व मिश्रा posted a blog post

इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।

22 22 22 22 22 2इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ। और  लगता  है , शुहरत  लेकर  आया हूँ। बदहाली   में   भी   सालिम   ईमान  रहा, मैं  दोज़ख़  से   जन्नत   लेकर   आया  हूँ। मिट्टी,  पानी,   कूज़ागर   की   फ़नकारी, और  इक  धुंधली  सूरत  लेकर  आया हूँ। कितने रिश्ते, कितने नुस्ख़े, कितना प्यार, मैं   दादी  की   वसीयत  लेकर  आया  हूँ। आज 'गली क़ासिम'  से होकर गुज़रा था, साथ  में   थोड़ी  जन्नत   लेकर  आया  हूँ। अब 'रौनक़' की बात न करना महफ़िल में, उसके   दर   से   हिज्रत   लेकर  आया हूँ।-…See More
Nov 29, 2018
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"थैंक्यू भाई"
Jun 27, 2018
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"शुक्रियः विजय जी"
Jun 27, 2018
सतविन्द्र कुमार राणा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"वाह गजब मुबारकां आ रोहितभाई"
Jun 10, 2018
vijay nikore commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"गज़ल अच्छी लगी। बधाई।"
Jun 10, 2018
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"बहुत बहुत शुक्रियः मुसाफ़िर सर गुमनाम सर ब्रजेश सर"
Jun 9, 2018
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"भई वाह मिश्रा जी क्या शानदार ग़ज़ल कही है...हर एक शेर बेहतरीन.."
Jun 9, 2018
gumnaam pithoragarhi commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"वाह बेहद खूबसूरत ग़ज़ल ....वाह"
Jun 8, 2018
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"आ. भाई रोहित जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Jun 8, 2018
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"बहुत बहुत शुक्रियः सर"
Jun 7, 2018
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"मेरी शिकस्त की ख़बर नफ़स नफ़स में रच गई,था जिसमें ज़िक्र फ़तह का वो इश्तेहार जल गया।...............वाह.....आदरणीय भाई मिश्रा जी ....बहुत ही कामयाब ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई..........."
Jun 7, 2018
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Jun 6, 2018
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इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।

22 22 22 22 22 2

इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।

और  लगता  है , शुहरत  लेकर  आया हूँ।



बदहाली   में   भी   सालिम   ईमान  रहा,

मैं  दोज़ख़  से   जन्नत   लेकर   आया  हूँ।



मिट्टी,  पानी,   कूज़ागर   की   फ़नकारी,

और  इक  धुंधली  सूरत  लेकर  आया हूँ।



कितने रिश्ते, कितने नुस्ख़े, कितना प्यार,

मैं   दादी  की   वसीयत  लेकर  आया  हूँ।



आज 'गली क़ासिम'  से होकर गुज़रा था,

साथ  में   थोड़ी  जन्नत   लेकर  आया  हूँ।…



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Posted on November 29, 2018 at 4:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

बहुत दिनों था मुन्तज़िर फिर इन्तिज़ार जल गया।

मेरे तवील हिज्र में विसाल-ए-यार जल गया।

मेरी शिकस्त की ख़बर नफ़स नफ़स में रच गई,

था जिसमें ज़िक्र फ़तह का वो इश्तेहार जल गया।

मैं इंतिख़ाब-ए-शमअ में ज़रा सा मुख़्तलिफ़ सा हूँ,

मेरे ज़रा से नुक़्स से मेरा दयार जल गया।

मुझे ये पैकर-ए-शरर दिया था कैसे चाक ने,

मुझे तो सोज़ ही मिला मेरा कुम्हार जल गया।

पनाह दी थी जिसने कितने रहरवों को…

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Posted on June 5, 2018 at 1:00pm — 10 Comments

एक कोशिश

फ़इलातु फ़ाइलातुन फ़इलातु फ़ाइलातुन

ये जो राबिता है अपना फ़क़त एक शे'र का है।

कोई इक रदीफ़ है तो कोई उसका क़फ़िया है।

है अजीब ख़ाहिश-ए-दिल कि रहूँ गा साथ ही में,

मैं हबीब हूँ हवा का मेरा आश्ना दिया है।

कभी मुझ से आके पूछो सर-ए-शाम बुझ गया क्यों,

कभी उस तलक भी जाओ कि जो दिन में भी जला है।

कभी कश्तियों को छोड़ो दिले आबजू में उतरो,

मेरे पास आके देखो मेरे दिल में क्या छिपा है।

मेरा क्या है मेरी मंज़िल मुझे ढूँढ…

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Posted on November 22, 2017 at 11:30am — 4 Comments

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।

12122/12122

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
करीब मुझ को' बुला रहा था।

वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स,
मगर दिये भी जला रहा था।

वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में,
न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।

सबक़ मुहब्बत का' हम से' पढ़ कर,
हमें मुहब्बत सिखा रहा था।

बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"।
नहीं तो' ये आईना रहा था।

रोहिताश्व मिश्रा, फ़र्रुखाबाद

मौलिक एवम अप्रकाशित

Posted on April 18, 2017 at 1:30pm — 15 Comments

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At 4:24pm on December 20, 2016, रोहिताश्व मिश्रा said…
शुक्रियः सर
At 1:56pm on May 21, 2016, रोहिताश्व मिश्रा said…
तुम इस को बन्द कर लो लाख़ पहरों मे भले रोहित ।
मगस को लौट कर जलाने शमा के पास जाना है।।
At 1:24am on November 22, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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