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रोहिताश्व मिश्रा
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  • फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश)
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रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post एक कोशिश
"बहुत बहुत शुक्रियः सर Thanku"
Nov 26
Samar kabeer commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post एक कोशिश
"जनाब रोहिताश्व मिश्रा जी आदाब,बहुत अर्से बाद आपको मंच पर सक्रिय देखकर अच्छा लगा,सक्रियता बनाये रखें । ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
Nov 23
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post एक कोशिश
"बहुत बहुत आभार सर"
Nov 22
रोहिताश्व मिश्रा posted blog posts
Nov 22
Mohammed Arif commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post एक कोशिश
"जनाब रोहिताश्व जी आदाब, ग़ज़ल का बेहतरीन प्रयास । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आपने ग़ज़ल के ऊपर अर्कान नहीं लिखें हैं । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।"
Nov 22
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"बहुत आभार विजय जी सुरेन्द्र भाई"
Nov 22
surender insan commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"जनाब रोहिताश्व मिश्रा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ जी।"
Aug 17
vijay nikore commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"अच्छी गज़ल के लिर बधाई।"
Jun 24
वीनस केसरी and रोहिताश्व मिश्रा are now friends
May 31
रोहिताश्व मिश्रा replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-79
"दोहे जैसा जब से आए शहर में ,छूटा प्यारा गाँव ।तबसे पाई ही नहीं,ममता वाली छाँव ।बतरस वो चौपाल की, सीधे सच्चे लोग ।माँ की रोटी दाल थी,जैसे छप्पन भोग । रोहिताश्व मिश्रा मौलिक एवम अप्रकाशित"
May 13
रोहिताश्व मिश्रा's blog post was featured

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।

12122/12122इक अजनबी दिल चुरा रहा था। करीब मुझ को' बुला रहा था।वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स, मगर दिये भी जला रहा था।वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में, न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।सबक़ मुहब्बत का' हम से' पढ़ कर, हमें मुहब्बत सिखा रहा था।बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"। नहीं तो' ये आईना रहा था।रोहिताश्व मिश्रा, फ़र्रुखाबादमौलिक एवम अप्रकाशितSee More
Apr 26
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"बहुत बहुत शुक्रियः सर"
Apr 23

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"आदरणीय रोहिताश्व भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।"
Apr 23
रोहिताश्व मिश्रा commented on Samar kabeer's blog post क़दम उठाने से पहले विचार करना था
"वाह सर बहुत प्यारी ग़ज़ल वाआआह"
Apr 20
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"बहुत बहुत शुक्रियः रवि भाई जी"
Apr 20
Ravi Shukla commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
"आदरणीय रोहिताश्‍व जी अच्छी ग़ज़ल पेश की है आपने ..बधाई"
Apr 20

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UP
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एक कोशिश

फ़इलातु फ़ाइलातुन फ़इलातु फ़ाइलातुन

ये जो राबिता है अपना फ़क़त एक शे'र का है।

कोई इक रदीफ़ है तो कोई उसका क़फ़िया है।

है अजीब ख़ाहिश-ए-दिल कि रहूँ गा साथ ही में,

मैं हबीब हूँ हवा का मेरा आश्ना दिया है।

कभी मुझ से आके पूछो सर-ए-शाम बुझ गया क्यों,

कभी उस तलक भी जाओ कि जो दिन में भी जला है।

कभी कश्तियों को छोड़ो दिले आबजू में उतरो,

मेरे पास आके देखो मेरे दिल में क्या छिपा है।

मेरा क्या है मेरी मंज़िल मुझे ढूँढ…

Continue

Posted on November 22, 2017 at 11:30am — 4 Comments

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।

12122/12122

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
करीब मुझ को' बुला रहा था।

वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स,
मगर दिये भी जला रहा था।

वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में,
न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।

सबक़ मुहब्बत का' हम से' पढ़ कर,
हमें मुहब्बत सिखा रहा था।

बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"।
नहीं तो' ये आईना रहा था।

रोहिताश्व मिश्रा, फ़र्रुखाबाद

मौलिक एवम अप्रकाशित

Posted on April 18, 2017 at 1:30pm — 15 Comments

कब ख़ुद को मुख्तार करोगे

22/22/22/22



तूफाँ से गर प्यार करोगे,

बाहों को पतवार करोगे।



अब कर दो इज्हार-ए-मुहब्बत,

कब तक छुप छुप प्यार करोगे।



छोड़ोगे कब हुक़्म बजाना,

कब ख़ुद को मुख्तार करोगे।



पेश आएंगे सभी अदब में,

जब खुद शिष्ट आचार करोगे।



दरिया पार तभी होगा जब,

ज़र्फ़ अपना पतवार करोगे।



इश्क़ में' हद से' गुज़रने वालों,

तुम ख़ुद को बीमार करोगे।



शाम हुई फैला अँधियारा,

जाने कब इज़्हार* करोगे।

*चराग़ रौशन करना…

Continue

Posted on February 15, 2017 at 4:30pm — 11 Comments

तू दूर हो तो मौत से कोई गिला नहीं।

२२१/२१२१/१२२१/२१२

तू दूर हो तो मौत से कोई गिला नहीं।

हो पास गर तो कुछ भी यहाँ ज़ीस्त सा नहीं।



आएगी रौशनी यहाँ छोटी दरारों से,

है झौपड़ी में कोई दरीचा बड़ा नहीं।



आएगा कैसे घर पे कहो कोई नामाबर,

उनके किसी भी ख़त पे जब अपना पता नहीं।



मैं सोचता हूँ कह लूँ मुकम्मल ग़ज़ल मगर,

मेरे मिज़ाज का कोई भी क़ाफ़िया नहीं।



ढूँढोगे तुम तो चाँद से मिल जायेंगे, मगर,

"रोहित" सा इस जहाँ में कोई दूसरा नहीं।







रोहिताश्व…

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Posted on January 14, 2017 at 5:00pm — 9 Comments

Comment Wall (3 comments)

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At 4:24pm on December 20, 2016, रोहिताश्व मिश्रा said…
शुक्रियः सर
At 1:56pm on May 21, 2016, रोहिताश्व मिश्रा said…
तुम इस को बन्द कर लो लाख़ पहरों मे भले रोहित ।
मगस को लौट कर जलाने शमा के पास जाना है।।
At 1:24am on November 22, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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