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फ़इलातु फ़ाइलातुन फ़इलातु फ़ाइलातुन

ये जो राबिता है अपना फ़क़त एक शे'र का है।

कोई इक रदीफ़ है तो कोई उसका क़फ़िया है।

है अजीब ख़ाहिश-ए-दिल कि रहूँ गा साथ ही में,
मैं हबीब हूँ हवा का मेरा आश्ना दिया है।

कभी मुझ से आके पूछो सर-ए-शाम बुझ गया क्यों,
कभी उस तलक भी जाओ कि जो दिन में भी जला है।

कभी कश्तियों को छोड़ो दिले आबजू में उतरो,
मेरे पास आके देखो मेरे दिल में क्या छिपा है।

मेरा क्या है मेरी मंज़िल मुझे ढूँढ लेगी ख़ुद ही,
मेरे रहनुमा को ढूंढो वो कहाँ पे खो गया है।

ये जो हिचकियाँ हैं 'रोहित' तेरे दिल की हैं सदाएं,
कोई याद कर रहा है तुझे क्यों मुग़ालता है।

रोहताश्व मिश्रा

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by रोहिताश्व मिश्रा on November 26, 2017 at 3:01pm

बहुत बहुत शुक्रियः सर

Thanku

Comment by Samar kabeer on November 23, 2017 at 12:28pm
जनाब रोहिताश्व मिश्रा जी आदाब,बहुत अर्से बाद आपको मंच पर सक्रिय देखकर अच्छा लगा,सक्रियता बनाये रखें ।
ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by रोहिताश्व मिश्रा on November 22, 2017 at 6:31pm

बहुत बहुत आभार सर

Comment by Mohammed Arif on November 22, 2017 at 4:42pm
जनाब रोहिताश्व जी आदाब,
ग़ज़ल का बेहतरीन प्रयास । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आपने ग़ज़ल के ऊपर अर्कान नहीं लिखें हैं । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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