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लघुकथा : विकलांग (गणेश जी बागी)

                         ये सरकारी आदेश की प्रति बाबूराम के कार्यालय में पहुँच गयी थी. इस आदेश के अनुसार किसी भी विकलांग को लूला-लंगड़ा, भैंगा-काणा या गूंगा-बहरा आदि कहना दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया था. सरकार ने यह व्यवस्था दी है कि यदि आवश्यक हुआ तो विकलांग के लिए दिव्यांग शब्द का प्रयोग किया जाए. बड़े साहब ने मीटिंग बुला कर उस सरकारी आदेश को न केवल पढ़कर सुनाया था बल्कि सभी को सख्ती से इसे पालन करने की हिदायत भी दी थी. आज कार्यालय जाते समय बाबूराम यह सोचकर…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 13, 2016 at 3:00pm — 14 Comments

बादल बने एहसास

उमड़ते घुमड़ते

रहे एहसास

उन लहरों की तरह

आकाश से सागर तक

फ़ासले तय करते गये

हर हवा के झोंके

ने पत्तों की उड़ाया कभी

टकराये पेड़ से

चट्टानों से

बहे झरने की तरह कभी

तिनके की तरह तैरते रहे

पानी में अपने अस्तित्व

के लिए लड़ते रहे

उन लहरों से ।



कभी हवा से उड़ने लगे

एक पतंग बन

खुले नभ में

अपने ख्वाबों को

उंचाईयों पर पहुँचाने के लिए

हंसते हुए लहराते हुए ।



बरस पड़े आँसू बन कभी

अपनी यादों के… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 12, 2016 at 10:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल...हादसा गुजर गया

बहरे हज़ज़ मुसम्मन मक्बुज.....

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन  मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन 

1212      1212       1212      1212

सरे निगाह शाम से ये क्या नया ठहर गया 

​​कदम बढ़ा सके न थे कि हादसा गुजर गया

ये कौन सीं हैं मंजिलें ये क्या गज़ब है आरजू 

जिसे सँभाल कर रखा वही समा बिखर गया

अभी है वक़्त बेवफा अभी हवा भी तेज है 

अभी यहीं जो साथ था वो हमनवा किधर गया

ये वादियाँ ये बस्तियाँ ये महफ़िलें ये रहगुजर 

हज़ार गम गले पड़े…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2016 at 9:53pm — 8 Comments

जकड़न--

रग्घू के यहाँ तेरहवीं का भोज खाने के बाद गांव के कुछ बुजुर्ग वहीँ दरवाजे पर बने कउड़ा पर हाथ सेंकने बैठ गए| जाड़े का दिन था और ठंढ भी कुछ ज्यादा थी| कुछ लोग खाने के बारे में बात करने लगे, किसी को अच्छा लगा था तो किसी को साधारण| जोखू चच्चा को हमेशा से ये ब्रम्ह भोज खराब लगता था और उन्होंने कई बार इसके विरोध में बोला भी था लेकिन किसी ने उसपर ध्यान नहीँ दिया| रग्घू की माली हालात अच्छी नहीँ थी, उसपर पिता की बिमारी ने उसे और कंगाल कर दिया था| अब ये भोज का खर्च, आज जोखू चच्चा ने सोच लिया कि बात…

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Added by विनय कुमार on October 12, 2016 at 8:30pm — 6 Comments

ए वतन /सुरेश कुमार ' कल्याण '

हम भारत के शूरवीर

जाने न देंगे कश्मीर

यह सिर का ताज हमारा है

हमें प्राणों से भी प्यारा है।

ठण्डी-ठण्डी इसकी हवाएँ

झर-झर बहते इसके झरने

हृदय सी गहरी वादियां इसकी

बड़े सुन्दर हैं इसके दर्रे

अखण्ड यह भारत सारा है

यह सिर का ताज हमारा है

हमें प्राणों से भी प्यारा है।

हम हिन्दू सिक्ख या मुसलमान हैं

हम सबका वतन हिन्दुस्तान है

हिन्दू मुस्लिम का ये किस्सा

नहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा

ऊँच-नीच और जाति-पाति

फूटी आँख हमें न… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 12, 2016 at 7:42pm — 3 Comments

हार ...

हार ...

ये इश्क-ओ-मुहब्बत के
बड़े अज़ब नज़ारे हैं
उनके दिए दर्दों से
हमने
तन्हा लम्हे सँवारे हैं
लोग
डरते होंगे ज़ख्मों से
मगर
सच कहते हैं
ये ज़ख्म
हमें बहुत प्यारे हैं
रिस्ते ज़ख्मों की
हर टीस पे
हमने सनम पुकारे हैं
अंगार बन के उठती हैं
यादें उनकी
तन्हाई में
कैसे बताएं ज़माने को
हम क्या जीते
क्या हारे हैं

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 12, 2016 at 1:13pm — 6 Comments

पथ पे शूल

पथ पे शूल बहुत बिखरे है
पग को रखना सम्हल - सम्हल
जीवन में गम बहुत पड़े है
खिल के हंसना मचल -मचल

अब रात बहुत ही काली है
संघर्षो की इक थाली है
कठिन नहीं कुछ भी जग में,
नभ तक जाना सरल - सरल

हे युवा आज मत घबराओ
कुछ देश में एसा कर जाओ
तेरे अतुलित बल से थल पे,
खिल जायेगा कमल - कमल
……………………………
मौलिक तथा अप्रकासित
कवि हिमांशु पाण्डेय

Added by Himanshu pandey on October 12, 2016 at 12:30pm — 1 Comment

दशहरा मिलन (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पिछली रात लेखन कर्म में बिताने की वज़ह से आज बस में लम्बा सफ़र करते समय शेख़ साहब को बार-बार नींद आ रही थी। बस स्टॉप पर पहुंचने पर बस से उतरकर टैक्सी में बैठे ही थे कि ज़ेबों में मोबाइलों व पर्स को टटोला। मंहगा वाला मोबाइल ग़ायब था। बस जा चुकी थी। बस का नंबर तक याद नहीं था। कुछ लोगों ने तुरंत पुलिस को ख़बर करने को कहा। कुछ ने मोबाइल की सिमों को तुरंत बंद (लॉक) कराने की सलाह दी। किन्तु इन्सानियत पर भरोसा करने वाले कुछ लोगों की राय थी कि सब्र करो, फोन करते रहो, शायद मोबाइल उठाने वाला बंदा बुरी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 11, 2016 at 9:26pm — 5 Comments

शाख़ पर चिड़िया

रोज़ देखतीं हूँ

शाख पर बैठी हुई

चिड़ियाओं को



जो बैठती हैं

एक शाख़ पर

कलरव करती हैं ।



भूख लगने पर

पंखों को फ़ैलाए

उड़ जाती हैं ।

अपने लिए

दाना ढूंढने ।



समय आने पर

बीनती हैं तिनके

अपने लिए

एक घरौंदा बनाती हैं ।





करती हैं परवरिश

विहग-सुवन की ।



करतीं हैं इन्तज़ार

समय का

पंख आ जाने पर

जो कल एक

बच्चा था

उड़ जाता है

ऊँचे गगन में

उड़ जाता है

अपनी… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 11, 2016 at 8:30pm — 11 Comments

कविता :"विजयादशमी " - अर्पणा शर्मा, भोपाल

हम सब कठपुतलें हैं,

करते परंपरागत दहन,

रावण के पुतलों का,

मनाते पर्व विजय का,

पर छुपे हुए रावण,

हर जगह फैलें हैं,

ऊपर से उल्लासित हम,

भीतर से त्रस्त और खोखले हैं,

आतंक,दुराचार,विभीषिकाओं के,

भीषण दौर इस विश्व में,

सभी धर्मों, सभ्यताओं,

और समाजों ने झेले हैं,

छुपी हुई दुराचारी,

अहंकारी मनोवृत्ति के,

आतंक और भ्रष्टाचार के,

युद्ध और विनाश के,

अशिक्षा और दरिद्रता के,

इन रावणों का दहन करने,

हे राम…

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Added by Arpana Sharma on October 11, 2016 at 10:30am — 15 Comments

फोर ईडियट्स (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

असफल प्रेम-विवाह ने और आधुनिक जीवन जीने की ज़िद ने मधु को आज जिस मुकाम पर छोड़ा था, वहां रईस पति और दो सुंदर सन्तानों के बावजूद केवल नीरसता थी, अकेलापन था। उम्र के पाँचवें दशक में उसे महसूस हुआ कि अपने माँ-बाप के अरमानों का गला घोंटना और माँ-बाप बनने पर अपनी सन्तानों के ज़रिये अपने अरमान पूरे करने की कोशिश के दूरगामी परिणाम क्या होते हैं। पति धन-दौलत के पीछे भागता रहा। बेटा बाप के अरमान पूरे करने के लिए अपनी रुचियों के विरुद्ध व्यर्थ की शैक्षणिक डिग्रियां हासिल करके बस जिम जाकर शरीर-सौष्ठव… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 11, 2016 at 4:48am — 7 Comments

गजल- लिखा रहे अपनी कहानी और है

वह अलग थी अब कहानी और है 

आज कल की निगहबानी और है 

है जगह तो ठीक वैसी ही मगर 

बह रही जो पवन पानी और है 

वीरता की चरम सीमा है यहाँ

ईश की भी महरबानी और है 

चढ़ रहे मंजिल…

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Added by PRAMOD SRIVASTAVA on October 11, 2016 at 12:00am — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४८

मेरा खूने-क़ल्ब कबतक यूँ ही बार-बार होगा

कभी वो घड़ी भी आए जो तुझे भी प्यार होगा

 

दिलेसरनिगूं में कब तक पशेमानियाँ रहेंगी

तेरी हाँ का मुझको कब तक यूँ ही इंतेज़ार होगा

 

मेरी आशिक़ी पे कब तक यूँ ही तुहमतें लगेंगी

तेरे हाथ इश्क़ कब तक यूँ ही दाग़दार होगा

 

करूँ भी तो मैं करूँ क्या कोई दाफ़िया नहीं है

तेरा ज़िक्र जब भी होगा दिल बेक़रार होगा

 

पसेशाम अपने घर को जो मैं जाऊं फिरसे वापिस

वही इन्दिहाम होगा वही…

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Added by राज़ नवादवी on October 10, 2016 at 10:08pm — 4 Comments

विष - एक क्षणिका

विष  - एक क्षणिका :

मानव
तुम तो
सभ्य हो
फिर
विषधर का विष
कहां से
पाया तुमने
क्या
सभ्य वेश में
विषधर भी
रहने लगे

सुशील सरना

मौलिक एवम अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on October 10, 2016 at 8:59pm — 8 Comments

एक एहसास (कविता )

एक एहसास
मीठा सा
इंतज़ार दे गया ।

प्यार का
विश्वाश का
तड़प का
अधिकार का ।


एक एहसास
प्यारा सा
प्यार जता गया

आँखों से आँखों का मिलना
आत्मा की पुकार
एक ख़्वाब जगा गया ।

प्यारा सा चेहरा
अपनी और खींचता है
ग्रीष्म में सावन
का एहसास
तुम्हारा प्यार दे गया ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 10, 2016 at 7:51pm — 10 Comments

गजल(लूट का धंधा.....)

2122 2122 2122 212

लूट का धंधा करें जो वे सभी रहबर हुए

जिंस कुछ जिनकी नहीं है आज सौदागर हुए।1



आशियाने जल रहे सब हो रहे बेघर यहाँ,

अब परिंदे क्या उड़ेंगे लग रहा बेपर हुए।2



मिल रही बहकी हवा कातिल बवंडर से अभी,

खरखराते पात सब हर डाल पर अजगर हुए।3



घुल रहा कैसा जहर गमगीन लगती है फिजा,

शब्द वैसे ही धरे हैं अर्थमय आखर हुए।4



है वही अपना गगन भरता गया काला धुआँ,

पूछते पंछी विकल हालात क्यूँ बदतर हुए।5



पत्थरों को फाड़ कर… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 10, 2016 at 7:30pm — 9 Comments

देवी दर्शन--

सब लोग तैयार हो रहे थे, पूरे घर में गहमागहमी मची हुई थी| बच्चों में भी बहुत उत्साह था, आज छुट्टी तो थी ही, साथ में दुर्गा पंडाल देखना और मेले का आनंद भी लेना था| रजनी ने भी अपनी चुनरी वाली साड़ी पहनी और शीशे के सामने खड़ी होकर अपने को निहारने लगी|

"माँ जल्दी चलो, पूजा को देर हो जाएगी", बेटे ने आवाज़ लगायी जो बाहर कार निकाल रहा था|

"आ रही हूँ, अरे अपने पापा को बोलो जल्दी निकलने के लिए", साड़ी सँभालते हुए रजनी कमरे से बाहर निकली|

"अच्छा किनारे वाला कमरा भी भिड़का देना, आने में तो देर…

Continue

Added by विनय कुमार on October 10, 2016 at 3:23pm — 8 Comments

गजल - अनमोल पल थे हाथ से सारे फिसल गये

221 2121 1221 212*



अनमोल पल थे हाथ से सारे फिसल गये

अपनों ने मुंह को फेर लिया दिन बदल गये।।



कुछ ख्वाब छूटे कुछ हुए पूरे, हुआ सफर

यादो के साथ साल महीने निकल गये।।



शरमा के मुस्कुरा के जो उनकी नजर झुकी

मदहोश हुस्न ने किया बस दिल मचल गये।।



बचपन के मस्त दिन भी हुआ करते थे कभी

बस्तो के बोझ आज वो बचपन कुचल गये।।



ओढे लिबास सादगी का भ्रष्ट तंत्र में

नेता गरीब के भी निवाले निगल गये।।



करते है बेजुबान को वो क़त्ल…

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Added by नाथ सोनांचली on October 10, 2016 at 5:30am — 22 Comments

एक फीलब्दीह/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र:122 122 122 122
-----
नहीं ये किसी को बताया हुआ है
कि इस दिल में तुमको बसाया हुआ है।

रहा जो हमेशा से दुश्मन हमारा
उसे भी गले से लगाया हुआ है।

जमाने को लगने न देंगे खबर भी
खजाना वफ़ा का छुपाया हुआ है।

करम से रहा जो हमेशा ही जालिम
वही अब तो रब का सताया हुआ है।


मुहब्बत वतन से ही ए ‘राणा’ कमायी
तहे दिल से इसको कमाया हुआ है।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 9, 2016 at 10:00pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जय-जय हिन्दुस्तान (दोहा गीत 'राज ')

दोहा गीत

आज़ादी की राह में ,शत शत वो बलिदान|

याद कहो कितना रहा ,बोलो हिन्दुस्तान||

 

सावरकर की यातना,देखी थी प्रत्यक्ष|

अंडमान की जेल में,काँपे पीपल वृक्ष||

संग्रामी आक्रोश में ,कितने बुझे चिराग|

कितनी टूटी चूड़ियाँ,कितने मिटे सुहाग||

 

कितनी दी कुर्बानियाँ,तब पाया सम्मान|

याद कहो कितना रहा ,बोलो हिन्दुस्तान||

 

रहे सदा जाँ बाज वो,हर सुख से महरूम|

झूल गये जो जान पर,उन फंदों को चूम||

नेहरू गाँधी…

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Added by rajesh kumari on October 9, 2016 at 8:44pm — 11 Comments

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