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प्रधान संपादक
कसक (लघुकथा)

"ये मिठाई कहाँ से आई जी ?" अपने खेत के किनारे चारपाई पर चुपचाप लेटे शून्य को निहारते हुए पति से पूछाI

"अरी, वो गुलाबो का लड़का दे गया था दोपहर को।" उसने चारपाई से उठते हुए उत्तर दियाI

"कौन? वही जो शहर में सब्ज़ी का ठेला लगाता है?"

"हाँ वही! बता रहा था कि अब उसने दुकान खोल ली है, उसकी ख़ुशी में मिठाई बाँट रहा थाI" पति ने मिठाई का डिब्बा उसकी तरफ सरकाते हुए कहाI

"चलो अच्छा हुआI" पत्नी ने चेहरे पर कृत्रिम सी मुस्कुराहट आईI

"वो बता रहा था कि उसने बेटे को भी टैम्पो डलवा…

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Added by योगराज प्रभाकर on March 7, 2016 at 4:30pm — 12 Comments

कुण्डलिया छंद

कर्पूरी आभा लिए, हे! करुणा अवतार।
नाच रहे शशि-शिखर-धर, गले सर्प का हार।।
गले सर्प का हार, हरो जग-त्रास जगतपति।
नीलकण्ठ भगवान, करो कल्याण उमापति।।
विनय करूँ कर जोर, करो श्रद्धा सब पूरी।
बसो हृदय में ईश, लिए आभा कर्पूरी।।

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on March 7, 2016 at 3:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल (मुहब्बत से किनारा कर रहा है )

ग़ज़ल (मुहब्बत से किनारा कर रहा है )

------------------------------------------------

1222 --------1222 --------122

मुहब्बत से किनारा कर रहा है |

हमें वह बे सहारा  कर रहा है |

तुम्हारा देखना रह रह के मुझको

वफ़ा को आश्कारा  कर रहा है |

न कोई देख ले यह डर मुझे है

वो खिड़की से इशारा  कर रहा है |

युं ही क़ायम रहे यह दोस्ताना

कहाँ आलम गवारा  कर रहा है |

वो लाके ग़ैर को महफ़िल में…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 7, 2016 at 1:08pm — 19 Comments

मौकापरस्त – ( लघुकथा ) –

समूचा क्षेत्र सूखे और अकाल की चपेट में था! चारों ओर त्राहि त्राहि मची हुई थी!लोग एक एक बूंद पानी को तरस रहे थे!ऐसे में  गॉव के प्रधान वीर पाल ने आस पास के सभी गॉवों में मुनादी पिटवा दी कि बारिस करवाने के लिये महायज्ञ और भागवत कथा का आयोजन कराया जा रहा है!यह कार्य क्रम पंद्रह दिन चलेगा!मथुरा वृंदावन से साधु संत और भागवत कथा वाचक बुलाये जायेंगे!अनुमानित खर्चा इक्यावन हज़ार के लगभग  होगा!सभी लोग अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा से इस दान पुन्य के महोत्सव मे बढ चढ कर भाग लें!

नियत तिथि पर प्रधान…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 7, 2016 at 11:00am — 12 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122

आग से ही आग का संधान फिर फिर

हाथ जलता छल रहा इंसान फिर फिर।1



आग अपनी तो भली सबको लगी है

ढल रहा कितना सुलग दिनमान फिर फिर।2



आग सागर की उफनती किस कदर यह

और उठने को गला हिमवान फिर फिर।3



जब पवन ठिठका लता फिर है लजाई

आँसुओं में बह रहा तूफान फिर फिर।4



आग का मंजर गजल का वाकया है

बह्न सजती है जुड़े अरकान फिर फिर।5





जब मिली मंजिल मुसाफिर है थमा बस

फिर चला है हो रहा हलकान फिर फिर।6



गाँठ… Continue

Added by Manan Kumar singh on March 7, 2016 at 11:00am — 2 Comments

बम बम भोलेनाथ

बम बम भोलेनाथ

 

बम बम भोलेनाथ शिव, आशुतोष भगवान।

नीलकंठ विरुपाक्ष अज, शंकर कृपानिधान।।

शंकर कृपानिधान, शिवाप्रिय भव त्रिपुरारी।

महादेव सर्वज्ञ, यज्ञमय हवि कामारी।।…

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Added by Satyanarayan Singh on March 7, 2016 at 2:00am — 2 Comments

सहारा (लघुकथा )

बेटा ख़ानदान का चराग़ और बुढ़ापे का सहारा होता है , बेटियां पराया धन हैं दूसरे के घर चली जाती हैं | शान्ती की यही सोच ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हो चुकी थी | ..... इकलौते बेटे को प्राइवेट कॉलिज में और बेटियों को सरकारी कालिज में पढ़ाया ,यही नहीं ज़ेवर बेचकर बेटे को एम बी ए कराया और बेटी इस से महरूम रह गयी | घर का खर्चा पति की पेंसन और सिलाई करने से चल रहा  था मगर हाय क़िस्मत बेटा भी बहू के बहकावे में आकर माँ और बहनों को बेसहारा छोड़ गया। ...... पति ज़िंदा होते तो यह दिन देखने न पड़ते | शान्ती दुखों…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 6, 2016 at 10:00pm — No Comments

भय (लघुकथा)

"कल आपका बेटा परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा गया है, यह आखिरी चेतावनी है, अब भी नहीं सुधरा तो स्कूल से निकाल देंगे|" सवेरे-सवेरे विद्यालय में बुलाकर प्राचार्य द्वारा कहे गए शब्द उसके मस्तिष्क में हथौड़े की तरह बज रहे थे| वो क्रोध से लाल हो रहा था, और उसके हाथ स्वतः ही मोटरसाइकिल की गति बढा रहे थे|

"मेरी मेहनत का यह सिला दिया उसने, कितना कहता हूँ कि पढ़ ले, लेकिन वो है कि.... आज तो पराकाष्ठा हो गयी है, रोज़ तो उसे केवल थप्पड़ ही पड़ते हैं, लेकिन आज जूते ही....|" यही सोचते हुए वो घर पहुँच…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 6, 2016 at 10:00pm — 5 Comments

शिवरात्रि विशेष

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर समस्त शिव भक्तों को सादर भेंट

.

जटाओं से निकल रही है, धार गंग नाथ शिव।

मुस्कुरा रहे गले में, धर भुजंग नाथ शिव।।

डमड्ड डमड्ड निनाद पर, हैं नृत्य कर रहे सभी।

मन लुभाये रूप आपका, मलंग नाथ शिव।।1।।



पाँव में कड़ा है और, त्रिशूल हाथ में धरे।

बाँध कर कमर में छाल, व्याह को चले हरे।।

चन्द्र ये ललाट पर, है विश्व दंग नाथ शिव।

मन लुभाये रूप आपका, मलंग नाथ शिव।।2।।



भंग की खुमार में हैं मस्त आज तो सभी।

सिर विहीन…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 6, 2016 at 9:30pm — 2 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : आस्तीन का साँप (गणेश जी बागी)

“मिस्टर सिंह, आप और आपकी टीम विगत छः माह से उस खूंखार आतंकवादी को पकड़ने में लगी हुई है, किन्तु अभी तक आपकी प्रगति शून्य है.”

“सर हम लोग पूरी निष्ठा और ईमानदारी से इस अभियान में लगें हैं, मुझे उम्मीद है कि हम शीघ्र सफल होंगे.”

“आई. बी. वालों ने भी सूचना दी थी कि वो पड़ोसी मित्र देश में छुपा हुआ है, फिर प्रॉब्लम क्या है ?”

“सर, यदि वो पड़ोसी देश में छुपा होता तो हम लोग उसे जिन्दा या मुर्दा दो दिन में ही पकड़ लेते,

लेकिन प्रॉब्लम तो यह है कि ....”

“क्या प्रॉब्लम…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 6, 2016 at 5:30pm — 13 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

221 1221 1221 22





करने को तो कर देते हैं हालात का चर्चा

लिखने में समाता नहीं जज़्बात का चर्चा



अब होश कहाँ मुझको तुझे देखने के बाद

लिखना भी अगर चाहूँ मुलाकात का चर्चा



वो रूठ गए हैं मेरे अंदाज़ से यारो

हर बात में करता था गई बात का चर्चा



देखा है फलक पे जो सितारों का ये जमघट

लगता है कि चलता है मेरी मात का चर्चा



हर बार बहा है मेरी मिट्टी का लहू ही

हरयाणा का कश्मीर का गुजरात का चर्चा



ए पर्दा नशी तेरे इशारो… Continue

Added by मनोज अहसास on March 6, 2016 at 10:36am — 5 Comments

नमक में हींग में हल्दी में आ गई हो तुम (ग़ज़ल)

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

 

नमक में हींग में हल्दी में आ गई हो तुम

उदर की राह से धमनी में आ गई हो तुम

 

मेरे दिमाग से दिल में उतर तो आई हो

महल को छोड़ के झुग्गी में आ गई हो तुम

 

ज़रा सी पी के ही तन मन नशे में झूम उठा

कसम से आज तो पानी में आ गई हो तुम

 

हरे पहाड़, ढलानें, ये घाटियाँ गहरी

लगा शिफॉन की साड़ी में आ गई हो तुम

 

बदन पिघल के मेरा बह रहा सनम ऐसे

ज्यूँ अब के बार की गर्मी में आ गई हो…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 5, 2016 at 11:30pm — 10 Comments

प्रेम की वर्षा सूखी...

कुण्डलिया

धुंआ हवा को छेड़ती, पानी करे पुकार.

धरती निशदिन लुट रही, अम्बर है लाचार.

अम्बर है लाचार, प्रेम की वर्षा सूखी.

सरिता नदिया ताल, रेत में उलझी रूखी.

सूरज रखता खार, करें क्या सत्यम-फगुवा.

मानव अति बेशर्म, उड़ाता खुद…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 5, 2016 at 9:55pm — No Comments

साथ मेरे कभी रहो भी मियाँ

2122 1212 22/112



साथ मेरे कभी रहो भी मियाँ

कुछ सुनाओ तो कुछ सुनो भी मियाँ.



चाँद बन जाओ या सितारे तुम

पर कभी तो फ़लक बनो भी मियाँ.



क्या है तुझमें,नहीं है क्या तुझमें

ये कभी ख़ुद से पूछ लो भी मियाँ.



तुम बहुत बोलते हो बढ़ चढ़कर

ये कमी दूर तुम करो भी मियाँ.



अब ये दारोमदार है तुम पर

तुम जहाँ हो वहाँ टिको भी मियाँ.



राय क़ाइम न दूर से करते

पहले सबसे मिलो जुलो भी मियाँ.



ज़िंदगी में कहाँ सुकून… Continue

Added by shree suneel on March 5, 2016 at 5:51pm — 5 Comments

आघात – ( लघुकथा ) –

आघात – ( लघुकथा ) –

वर्मा जी ने जीवन भर की क़माई  अपने इकलौते बेटे पवन के भविष्य को बनाने में लगा दी!पहले तो मंहंगी से मंहंगी कोचिंग का खर्चा फ़िर आई आई टी की मंहंगी पढाई!तत्पश्चात बेटे की एम बी ए करने की फ़रमाइश ! बची खुची पूंजी बेटे की शादी में खर्च कर दी !सोचा कि और किसके लिये कमाया है! 

बेटा पवन नौकरी करने विदेश चला गया!मॉ बाप अकेले!हारी बीमारी कोई पूछने वाला नहीं!तीन साल से न बेटा आया न बहू!शुरू में तो होली दिवाली फ़ोन आजाता था!अब तो वह भी नहीं आता!वर्मा जी जब भी फ़ोन मिलाते…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 5, 2016 at 3:36pm — 10 Comments

गीत- ये है पुलिस की नौकरी,

२२१२ २२१२ २२१२ २२१२



ये है पुलिस की नौकरी, ये है पुलिस की नौकरी ।

कानून की ये टोकरी, ये है पुलिस की नौकरी ।



मुजरिम को पकडे तो कहे कुछ लोग अत्याचार है।

गर चुप रहे तो कहते है करती पुलिस व्यापार है।

जब मस्तियों में गाँव हो या नींद में होता शहर।

ऐ दोस्तो वे हम ही है जो जागते आठों पहर।

सोने का या फिर खाने का यां वक्त कुछ निश्चित नहीं।

हो जुर्म कितना भी मगर हम है तो तुम चिंतित नहीं

फिर भी हमें है लाख तानें और हजारों बात है।

हर फर्ज पूरा कर… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on March 5, 2016 at 2:38pm — 2 Comments

खट्टी डकारें(लघुकथा )राहिला

13-14 साल के कबाड़ी को कबाड़ तुलवा रहे सेठजी!लम्बी-लम्बी डकारों से परेशान हो रहे थे । जब कुछ ना सूझा तो पास ही खड़ी सेठानी पर झुंझला पड़े । "लगता है आजकल तरकारी में खुले हाथ से तेल मसाला उड़ेल रही हो!मार डाला इन खट्टी डकारों ने "

"अरे कैसी बात करते हैं सेठजी! तेल मसाले खाने से थोड़े ना खट्टी डकारें आती हैं!हम तो रोज ढ़ाबे पर ग्राहकों की बची तेल मसाले वाली तरकारी खाते हैं जुगाड़ से ।

चेहरे से चंचल बातूना लड़का!चहक के बोला ।

"अच्छा..!तो तू बहुत बड़ा जानकार है।तुझे बहुत पता है।"वह… Continue

Added by Rahila on March 5, 2016 at 12:41pm — 10 Comments

चले हैं छोड़ घर अपना - ग़ज़ल

1222    1222    1222    1222     1222



हुनर की बात है सबको गमों में यूँ हँसाना तो नहीं आता

सभी के हाथ यारो ये मुहब्बत का खजाना तो नहीं आता



है हसरत तो  हमारी भी  लगाएँ दिल  हसीनों से जमाने में

हमें पर नाज कमसिन का जरा भी यों उठाना तो नहीं आता



हमेशा  लौट आता कारवाँ गर्दिश  का जैसे दोस्तों फिर फिर

कि वैसे लौटकर फिर  से  बुलंदी का जमाना तो नहीं आता



लगेगी जिंदगी कैसे  सजा से हट   किसी ईनाम के जैसी

सभी को यार होठों पर तबस्सुम को सजाना तो नहीं…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 5, 2016 at 10:57am — 15 Comments

सत्य का सम्मान - डॉo विजय शंकर

सत्य का
सम्मान करते हैं ,
दूर से
प्रणाम करते हैं।
उसके पास आने से
डरते हैं।
जानते हैं ,
काट नहीं लेगा
पर झूठ
जो फैला रखा है
अपने चारों ओर
उसे दूर करने से
डरते हैं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on March 5, 2016 at 9:43am — 7 Comments

ग़ज़ल-पंकज मिश्र

2212 121 1222 212



इतना कमाल हुस्न, दिखाया ही किसलिये।

होनी नही थी बात, बुलाया ही किसलिये।।



मौका नहीं था देना, इबादत का ग़र हमें।

बुत से भला नक़ाब, हटाया ही किस लिये।।



सुननी नहीं थी तुमको, अगर मेरी आरज़ू।

फिर नाम का भजन ये, सिखाया ही किसलिये।।



हम भूल ही गये थे, कि लेनी है साँस भी।

जब मारना ही था तो, जिलाया ही किसलिये।।



अरमान सब थे दफ़्न, सुकूँ में बहुत थे हम।

बर्बाद गुल था करना, खिलाया ही किसलिये।।



मौलिक…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 5, 2016 at 12:00am — 9 Comments

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