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फेरे लघुकथा

फेरे '



घर के काम से फ़ुरसत हो थोड़ा आराम करने जा ही रही थी , वक़्त बेवक्त घंटी के बजते ही मन में आया इस समय कौन होगा, अभी सूरज के आने का समय तो हुआ नहीं है, दरवाज़े पर पति को देख मैं चकित रह गई।

"अरे आप !!!!" पति को अचानक सामने ,पसीने से तरबतर देख ,अपने आप को बोलने से रोक ना पाई।

पानी लेने जा रही थी, सूरज ने हाथ पकड़ कर रोक लिया।

"तुमसे कुछ कहना है मुझे सुमन, मैं फिसल गया, रोशनी से संबंध बना बैठा , मुझे माफ़ करोगी ना मुझे हर सज़ा मंज़ूर है।

तुम्हारे,बच्चों के बिना… Continue

Added by Nita Kasar on December 26, 2015 at 6:20pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
टूटे हुए मकान का सामान बन गये (तरही ग़ज़ल 'राज ')

221  2121   1221   212

अपने लहू से आज वो अन्जान बन गये

टूटे हुए मकान का सामान बन गये

 

ज़ज्बात से किसी को यहाँ वास्ता नहीं

ड्राइंग रूम में रखा दीवान बन गये 

 

बेगानों की तरह रहे अपने ही देश में

बस चार पाँच दिन के ही मेह्मान बन गये

 

अपने ही घर में किश्तियाँ महफूज़ हैं कहाँ

साहिल के आस पास ही तूफ़ान बन गये

 

छोड़ी कसर न देखिये कुदरत को लूटकर

आफ़ात आ पड़ी तो अब इंसान बन गये

 

करतूत वो करें…

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Added by rajesh kumari on December 26, 2015 at 12:28pm — 20 Comments

निन्यानबे के फेर में

निन्यानबे के फेर में

हूँ मैं  

लोग देखते है मुझे

ईर्ष्या से या हिकारत से

क्योंकि वे जानते हैं

केवल और केवल एक मुहावरा 

मानव की कमजोर वृत्ति का

धन संचय की उत्कट प्रवृत्ति का

उन्हें यह  पता ही नहीं कि

मुहावरे के पीछे होता है

कोई चिरंतन सत्य या एक इतिहास  

और बहुत सारे मायने

वे सोचते भी नहीं

कि निन्यानबे वे वैशिष्ट्य भी हैं  

जिनके आधार पर  उस ऊपर वाले के है

निन्यानबे…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 26, 2015 at 12:00pm — 8 Comments

पेट की जुगाड़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (47)

चौंक गयी थी कुन्ती पहली बार इतनी बड़ी मशीनों को देखकर। तो अम्मा और कम्मो इसी लिए बुरी तरह थक जाती थीं । वह चीख कर कम्मो को रोकना चाह रही थी कि कारखाने के श्रमिक उसके पिता ने अपनी कठोर हथेलियां उसके मुँह पर रख दीं। फ़िर धीरे से उसके कान में उसने कहा - " पगली यहाँ पीछे से चिल्लायेगी , तो उसका हाथ मशीन में फंस न जायेगा !"



"बापू तुम इतनी कम उमर में कम्मो दीदी से ये काम करवाते हो !"



"पेट की जुगाड़ के लिए अगले बरस से तुझे भी आना पड़ेगा, तेरी अम्मा से अब नहीं होता । साहब कह रहे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 26, 2015 at 10:11am — 9 Comments

अंतरात्मा - लघुकथा

अंतरात्मा - लघुकथा

देवरानी को जलाने के अमानवीय कृत्य की एकमात्र साक्षी वही थी और ससुराल पक्ष के साथ पति भी उस पर सच न बोलने के लिए हर तरह से दबाब दे रहा था।

"देख उर्मि, तेरी एक गवाही आज ससुराल की मान मर्यादा को समाज की नज़रो में गिरा देगी और यदि ऐसा हुआ तो फिर मुझसे बुरा ....।" पति के कहे शब्द उसकी चुप्पी बन रहे थे तो अंतरात्मा उसे बेचैन कर रही थी। "नहीं उर्मि नहीं इस बार तूझे चुप नहीं......।"

"देखिये! आप जो कुछ कहे, सोच समझकर निडर हो कर कहे।" गवाही के लिए खड़ी उर्मिला को कुछ सहमे… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on December 26, 2015 at 8:32am — 5 Comments

फिर से कहा जैती पुर क कथा

फिर से कहा (जैतीपुर क कथा )

“नारायण बाबा “ “हे नरायण बाबा” पल्टू ने दुआरे से आवाज़ लगाते हुए पुकारा

“कौन है रे !सुबह –सुबह इतनी ज़ोर से बाग दे रहा है |”

“हम है बाबा |”पतलून और बुशर्ट पहिने और काला चश्मा लगाए साँवला मरियल सा लड़का बोला

“माफ करना बच्चा,पर तुम - - -“नारायण मिश्र ने पेशानी पर ज़ोर डालते हुए कहा

“हम है बाबा ,जोखू यादव का लौंडा पल्टू |याद तो होगा आपको |”

“अच्छा तो तू वही लौंडा है जिसका नेटा हमेशा बहता रहता था और जो दू के आगे कभी गिनबे नहीं किया |”

“जी… Continue

Added by somesh kumar on December 25, 2015 at 7:54pm — 7 Comments

अहसास

अहसास क्रिसमस की छुट्टियों में आये पोता पोती ,दादी जी के लाड प्यार में पूरे घर में धमा चौकडी मचाये रखते हैं ।इस बार दादी को फेसबुक और इंटरनेट का पाठ याद करा दिया । आज न जाने क्या सूझी दादी को दोनों को लेकर रसोई में पहुंच गई ।सभी दालें दिखाई पर सिर्फ चना और राजमा पहचान पाये ,दादी ने सभी अनाजों की पहचान कराई ,नया पाठ था बच्चों को , जल्दी सीख गए । "बेटा सचिन कुकर उठाओ ,इसका ढक्कन लगाओ ।" "दादी यह तो लग ही नहीं रहा ।" "देखो बेटा यह गास्केट है ,यह सेफ्टी वाल्व है ,तुम्हें यह तो मालूम है कि कुकर…

Continue

Added by Pawan Jain on December 25, 2015 at 5:30pm — 4 Comments

तराशते पत्थर (कविता) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

चित्र या चलचित्र

से

चर्चित विचित्र

पथभ्रष्ट कट्टर

बस

तराशते पत्थर ।

किस निमित्त

बनती, टूटती

ईंट-पत्थर की इमारत

आस्थाओं की इबारत

किसकी, कैसी

प्रार्थना या इबादत

कुछ

हटकर

साम्प्रदायिकता से

सटकर डटकर

अमन-चैन को देकर

कठोर टक्कर

भावुक जन-गण से

चंदा जुटाकर

नमूने दिखाकर

अपने ही मुल्क के

क़ानून को

बस

ठेंगा दिखाकर

कौन, कैसे

कलाकारों के हाथों

उकेरते पत्थर

चर्चित… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 24, 2015 at 2:57pm — 1 Comment

चुटकियाँ- ….. …



चुटकियाँ- ….. …



नेता   क्या   और भाषण क्या

भाषण   पे   अनुशासन  क्या

मूक    बधिर   इस जनता को

व्यर्थ   में     आश्वासन    क्या !!1!!



देश   क्या     विकास      क्या

बिन    कुर्सी  मधुमास    क्या

छल करते जो नित् निर्बल  से

उस आवरण का विश्वास   क्या !!2!!



नीति   क्या    अनीति      क्या

भ्रष्ट की  सोच   से  प्रीति   क्या

जनता के जो खून  से   जिन्दा

उस   नेता   की  परिणति क्या !!3!!



फ़र्ज़    क्या  …

Continue

Added by Sushil Sarna on December 24, 2015 at 1:27pm — 6 Comments

गजल

2122 2112

आ रहा है साल नया

जा रहा है काल बचा।

तिक्त-मीठी बात रही

है सपन का जाल रचा।

अनसुनापन बोल रहा

लेख दुर्गम भाल खचा।

कर जतन मन डोल रहा

देख अब ढाढस न बचा।

थे चले उम्मीद लिये

दे गया गत साल गचा।

नाच आये थिर न हुए

मन कहा अब न नचा।

कह रहा है साल नवल

देख मेरी शान बचा।

लाज लुटती चूक गये

मैं सकूँ इसको न पचा।

चीर जोड़ो,गर न सको

बलि चढ़ो नर न लजा।

शांत रहने दे न मुझे

रक्त से दामन न सजा।

मच रही है… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 24, 2015 at 11:30am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - ग़म किसी का किसी की राहत है - गिरिराज भंडारी

2122  1212   22  /112

क्या नहीं ये अजीब हसरत है ?

ग़म किसी का किसी की राहत है

 

ख़ाक में हम मिलाना चाहें जिसे

उनको ही सारी बादशाहत है

 

रोटी कपड़ा मकान में फँसकर

बुजदिली, हो चुकी शराफत है

 

हर्फ करते हैं प्यार की बातें

आँखें कहतीं हैं, तुमसे नफरत है

 

मुज़रिमों को मिले कई इनआम

आज मजलूम की ये क़िस्मत है

 

बेरहम क़ातिलों को मौत मिली

सेक्युलर कह रहे , शहादत है

 

हाँ,…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on December 24, 2015 at 10:30am — 30 Comments

बेरोज़गारी - लघुकथा (जानकी बिष्ट वाही )

ठक-ठक की तेज़ आवाज़ के साथ वह सामने आ खड़ा हुआ।

" ओ बाबू अँधेरे में क्यों बैठे हो ? घर जाओ । अरे ! ऐसे क्या देख रहे हो?
क्या नाम है तुम्हारा ?"

" बेरोज़गारी ।"
पीछे से आवाज़ सुनाई दी -
" लगता है पगला गया है बेचारा ।"


मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by Janki wahie on December 23, 2015 at 11:11pm — 2 Comments

राह हमें उत्कर्ष की, नित दिखला नववर्ष......

दोहा छंद आधारित गीत

================

मन सहिष्णु भटके नहीं,

लेकर भाव अमर्ष

राह हमें उत्कर्ष की, नित दिखला नववर्ष.....

 

झाँक रही दीवार से,

खूंटी ओढ़े  गर्द

साल मुबारक हो नया,

कहता मौसम सर्द

जंत्री नूतन साल की, करती ध्यानाकर्ष

 

लौटें लेकर सुदिन सब,

उत्सव औ त्यौहार

मिलना जुलना हो सहज,

सरल भाव व्यवहार

जाति धर्म के नाम पर, हो न कभी संघर्ष

 

गीत छंद कविता गजल,

ललित कलेवर…

Continue

Added by Satyanarayan Singh on December 23, 2015 at 9:00pm — 12 Comments

लबों पर रख हँसी हरदम अगर को भुलाना है- बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’

 

अरकान – 1222    1222     1222     1222

 

लबों पर रख हँसी हरदम अगर को भुलाना है|

दिखा मत दर्दे-दिल अपना बहुत ज़ालिम ज़माना है|

 

तेरा गम तेरा अपना है न जग समझा न समझेगा,

तू अपने पास रख इसको कि ये तेरा ख़जाना है|

 

नजूमी हाथ की रेखाएं पढ़कर मुझसे यूँ बोला,

पुजारी है तू किस्मत का कि दिल तेरा दिवाना है|

 

कभी मायूस मत होना भले कुटिया में रहना हो,

बचाती धूप से तुझको वो तेरा आशियाना…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 23, 2015 at 6:29pm — 4 Comments

बेरोज़गारी - लघु कथा ( जानकी बिष्ट वाही )

" अरविन्द ! लो तुम्हारी पसन्द की खीर ।"

" माँ ! आज़ खीर ? कोई खास बात है क्या ?"

" हाँ बेटा ! मेरे लिए तो खास ही है। आज़ तुम्हारा जन्मदिन है।तुम कैसे भूल गए ? याद है बचपन में महीने भर पहले से जन्मदिन मनाने और पसन्द की चीजों का आग्रह शुरू हो जाता था।"



" हाँ माँ ! वे दिन ही अच्छे थे ,मस्त। न कोई फ़िक्र न कोई उलझन।

जाने कहाँ उड़ गए पँख लगा कर।"



" ऐसे उदास नहीं होते बेटा ! "माँ का गला रुंध आया ।

" माँ ! हर सुबह मुझे डराती है। आईना मुझे नहीं भाता ।हर जन्मदिन… Continue

Added by Janki wahie on December 23, 2015 at 5:05pm — 1 Comment

हर बार उन्हें आप ने सुल्तान बनाया (ग़ज़ल)

बह्र : २२११ २२११ २२११ २२

 

ये झूठ है अल्लाह ने इंसान बनाया

सच ये है कि आदम ने ही भगवान बनाया

 

करनी है परश्तिश तो करो उनकी जिन्होंने

जीना यहाँ धरती पे है  आसान बनाया

 

जैसे वो चुनावों में हैं जनता को बनाते

पंडे ने तुम्हें वैसे ही जजमान बनाया

 

मज़लूम कहीं घोंट न दें रब की ही गर्दन

मुल्ला ने यही सोच के शैतान बनाया

 

सब आपके हाथों में है ये भ्रम नहीं टूटे

यह सोच के हुक्काम ने मतदान…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 23, 2015 at 10:00am — 32 Comments

वादे इरादे (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी (46)

दस साल बाद एक समारोह में उन दोनों की अप्रत्याशित मुलाक़ात हो गई। न चाहते हुए भी बात चल पड़ी।



"मैंने तुमसे वादा किया था कि मैं आई.ए.एस. अधिकारी बनकर दिखाऊंगा, मैंने पाँच साल ख़ूब मेहनत की, साक्षात्कार तक पहुंच जाता था लेकिन नसीब में तो प्रोफेसर बनना ही लिखा था !"



"मेरे परिवार के स्टेटस का सवाल था। हमारे यहाँ कोई भी रिश्ता प्रशासनिक सेवा से नीचे के लोगों में नहीं हुआ ! आई.ए.एस. बनने के बाद मैं अपने माँ-बाप को और ज़्यादा इंतज़ार नहीं करा सकती थी ! .... लेेेेकिन तुमने तो पागलपन… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 22, 2015 at 11:37pm — 12 Comments

किसी की झील सी आँखों में फिर से खो के देखूँ

मुहब्बत की डगर में फिर किसी का हो के देखूँ

किसी की झील सी आँखों में फिर से खो के देखूँ

 

अब इन आँखों से उसके प्यार का चश्मा उतारूँ

जहां में हैं बहुत से रंग आँखें धो के देखूँ

 

जिसे मैं प्यार करता था वो मेरा हो न पाया

जो मुझसे प्यार करता है मैं उसका हो के देखूँ

 

बहुत दिन हो गए आँखों को कोई ख़्वाब देखे

चलो शानो पे सर रख कर किसी के सो के देखूँ

 

कोई तो बढ़ के 'सूरज' आँसुओ को पोछ लेगा

मुहब्बत में चलो इक…

Continue

Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on December 22, 2015 at 11:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२ २१२ २१२ २१२

इक सवाल आँखों में ही बसा रह गया

यूँ लगे जैसे इक ख़त खुला रह गया

रेल से वो चली शहर ये छोड़कर

और टेशन पे  मैं बस खड़ा रह गया

दाग गिनवा रहा था जमाने के मैं

सामने मेरे बस आइना रह गया

वक़्त सा वैध भी कर ना पाया इलाज

देखिये ज़ख्म तो ये हरा रह गया

शख्स हर जानता जिंदगी है सफ़र

मंजिलें हर कोई ढूंढता रहा गया

दम निकलते समय भूला मैं रब को भी

इन लबों पर तेरा नाम सा…

Continue

Added by gumnaam pithoragarhi on December 22, 2015 at 8:27pm — 10 Comments

गिरगिट (लघुकथा )राहिला

"ओह, श्रीमती रोहन आप वाकई बहुत भाग्यशाली हैं । कि आप को रोहन जैसा हंसमुख ,जिंदादिल,स्वतंत्र विचारधारा का धनी पति मिला ।ऑफिस की तो जान है,मजाल जो किसी के चेहरे पर उसके रहते उदासी छा जाये।" रात के खाने पर आमंत्रित उनकी महिला मित्र काफ़ी देर से उनकी शान में कसीदे पढ़े जा रही थी ।

"वैसे बुरा ना मानियेगा, अगर रोहन की शादी ना हुई होती तो उसे किसीभी कीमत पर हाथ से नहीं जाने देती । आखिर ऐसे इंसान की पत्नी होना अपने आप में गर्व की बात है ।सच कह रही हूं ना! " वो अब मेरी राय जानने के लिये…

Continue

Added by Rahila on December 22, 2015 at 1:00pm — 18 Comments

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