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November 2015 Blog Posts

मोहब्बत क्यूँ न कर लेती

1222 1222
~~~~~~~~~~~~~~
निगाहों में संवर लेती।
मुहब्बत क्यूँ न कर लेती?

बहुत सुंदर शहर है ये।
मेरे दिल की खबर लेती।।

उदासी का मैं दुश्मन हूँ।
तू दामन क्यूँ न भर लेती।।

नदी कब तक यूँ भटकेगी?
समन्दर में उतर लेती।।

तेरे ख्वाबों की मन्ज़िल हूँ।
कदम अपने इधर लेती।।

तू ख़ुश्बू और मैं "पंकज"।
आ मुझपे ही बिखर लेती।।

~~~~~~~~~~~~~~
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 15, 2015 at 8:11pm — 2 Comments

इंसानियत का जनाज़ा देखा । "अज्ञात "

हाँ, कल एक समाचार ताजा देखा,        

इंसानियत का जनाज़ा देखा,            

आतंक की भाषा क्या,                          

परिभाषा क्या,                                       

चीख, चीत्कार,                                 

रक्त रंजित मानव शरीर ,                      

बिखरी मानवता,                              

ध्वस्त होते स्वप्न,                                 

बिलखते नौनिहाल, कराहती  ममता,       

असहाय सुरक्षा एजेंसियां…

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Added by Ajay Kumar Sharma on November 15, 2015 at 2:00pm — 1 Comment

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

इश्क़ में पहले भी उलझा था मगर इतना न था

 

क्या पता था लौटकर वापस नहीं आएगा वो

इससे पहले भी तो रूठा था मगर इतना न था

 

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था

 

अब तो मुश्किल हो गया दीदार भी करना तिरा

पहले भी मिलने पे पहरा था मगर इतना न था

 

उसकी यादों के सहारे कट रही है ज़िंदगी

भीड़ में पहले भी तन्हा था मगर इतना न…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on November 15, 2015 at 2:00pm — 19 Comments

प्रायश्चित - (लघुकथा ) –

 प्रायश्चित - (लघुकथा ) –

"जतिन, रेखा गर्भवती है"!

"वाह, बधाई ,यह तो खुशी की बात है"!

"जतिन,क्वारी लडकी का गर्भवती होना किस समाज में खुशी की बात होती है"!

"तुम किस की बात कर रही हो"!

"तुम अच्छी तरह जानते हो मैं किस की बात कर रही हूं!मैं मेरी छोटी बहिन रेखा की बात कर रही हूं"!

"ओह ,मैंने समझा कि तुम अपनी किसी सहेली की बात कर रही हो"!

"तुम जानते हो उसके गर्भ का जिम्मेवार कौन है"!

"नहीं,मैं कैसे जानूंगा"!

"अरे वाह,खुद की काली करतूत…

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Added by TEJ VEER SINGH on November 15, 2015 at 1:41pm — 25 Comments

लहरों के सँग बह जाने के अपने ख़तरे हैं (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

लहरों के सँग बह जाने के अपने ख़तरे हैं

तट से चिपके रह जाने के अपने ख़तरे हैं

 

जो आवाज़ उठाएँगे वो कुचले जाएँगे

लेकिन सबकुछ सह जाने के अपने ख़तरे हैं

 

सबसे आगे हो जो सबसे पहले खेत रहे

सबसे पीछे रह जाने के अपने ख़तरे हैं

 

रोने पर कमज़ोर समझ लेती है ये दुनिया

आँसू पीकर रह जाने के अपने ख़तरे हैं

 

धीरे धीरे सबका झूठ खुलेगा, पर ‘सज्जन’

सबकुछ सच-सच कह जाने के अपने ख़तरे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 15, 2015 at 9:31am — 14 Comments

बाज़ार और साम्प्रदायिकता के बीच

बाज़ार रहें आबाद

बढ़ता रहे निवेश

इसलिए वे नहीं हो सकते दुश्मन

भले से वे रहे हों

आतताई, साम्राज्यवादी, विशुद्ध विदेशी...

अपने मुल्क की रौनक बढाने के लिए

भले से किया हो शोषण, उत्पीड़न

वे तब भी नहीं थे वैसे दुश्मन

जैसे कि ये सारे हैं

कोढ़ में खाज से

दल रहे छाती पे मूंग

और जाने कब तक सहना है इन्हें

जाते भी नहीं छोड़कर

जबकि आधे से ज्यादा जा चुके

अपने बनाये स्वप्न-देश में

और अब तक बने…

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Added by anwar suhail on November 14, 2015 at 9:00pm — 3 Comments

तुम निष्ठुर हो …

तुम निष्ठुर हो …

तुम निष्ठुर हो तुम निर्मम हो

तुम बे-देह हो तुम बे-मन हो

तुम पुष्प नहीं तुम शूल नहीं

तुम मधुबन हो या निर्जन हो

तुम निष्ठुर हो …

तुम विरह पंथ का क्रंदन हो

तुम सृष्टि भाल का चंदन हो

तुम आदि-अंत के साक्षी हो

तुम वक्र दृष्टि की कंपन्न हो

तुम निष्ठुर हो …

तुम  नीर  नहीं समीर नहीं

तुम हर्ष नहीं तुम पीर नहीं

तुम हर दृष्टि  से ओझल हो

तुम रखते कोई शरीर नहीं

तुम निष्ठुर हो …

तुम चलो तो सांसें चलती…

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Added by Sushil Sarna on November 14, 2015 at 8:13pm — 13 Comments

दीपोत्सव

हम खुशियों के दीप जलाकर मना रहे हैं दीपोत्सव

सच्चे विकास का संकल्प लेकर आगे बढ़ते प्रतिदिन

रूढ़िवादिता को त्यागकर हम करते नवयुग का वंदन

प्रेम का पावन पौध उगाकर करते एकता का संवर्धन

अज्ञानता की घनी रात का ज्ञानदीप से करते स्वागत

मतभेदों को आज हटाकर हम करते सबका अभिनंदन

भूल सारी बैर भावना करते देश हित में आत्म समर्पण   

दुख से ग्रसित सभी जनों की पीड़ा का करते हम मर्दन

फूल और कांटे ज्यों सब मिलकर शोभित करते उपवन

भँवरे मिलकर…

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Added by Ram Ashery on November 14, 2015 at 9:58am — 1 Comment

मैं कविता क्यों नहीं लिखता

ऐसा नहीं कि मुझे कविता, लिखनी नहीं आती

सच तो ये है कविता मुझसे लिखी नहीं जाती .

कविता लिखने की ललक में, ऐसे उठाता हूं मैं पैन

गर्भवती कोई जैसे छुपके, कच्चा आम लपकती है.

पर बेचारा कोरा कागज़, यूं सहमने लगता है

जैसे गुण्डों से घिरी, कोई अबला मिन्नत करती है.

शील-हरण तो रोज़ ही होते, बड़े शहर के चौराहों पर

लेकिन मुहल्ले की गलियों में, मैली आंख भी नहीं सुहाती.

इसीलिए तो कविता मुझसे लिखी नहीं जाती.

चाहूं तो किसी की झील सी आंखों…

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Added by प्रदीप नील वसिष्ठ on November 13, 2015 at 6:30pm — 14 Comments

बाकी सब कुछ अच्छा है|---बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान -   2 2   2 2    2 2   2 2     2 2   2 2   2 2   2    

तेरे बिन घर वन लगता है बाकी सब कुछ अच्छा है|

तुझ बिन बेटे जी डरता है बाकी सब कुछ अच्छा है|

 

माँ तेरी बीमार पड़ी है गुमसुम बहना भी रहती,

भैया का भी हाल बुरा है  बाकी सब कुछ अच्छा है|            

 

दादी तेरी बुढिया हैं  पर चूल्हा-चौका हैं  करती,                                      

कोई न उनका दुख हरता है बाकी सब कुछ अच्छा है|

 

दादा जी पूछा करते…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 13, 2015 at 6:00pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मखमली चाँदनी रोज आया करो---(ग़ज़ल)--- मिथिलेश वामनकर

212---212---212---212

 

मखमली चाँदनी रोज आया करो

पर सितारों से आमद छुपाया करो

 

तितलियों ने लिए है नए पैरहन

ऐ…

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Added by मिथिलेश वामनकर on November 13, 2015 at 9:00am — 16 Comments

" श्रद्धा और अक़ीदत " - [ लघुकथा ] 32 __शेख़ शहज़ाद उस्मानी

जब नदीम उसके साथ चिंताहरण मंदिर में चल रही योगासन कक्षा में शामिल हो सकता है, तो वह उसके साथ मस्जिद में नमाज़ क्यों नहीं अदा कर सकता ? उसकी फ़रमाइश को नदीम हमेशा टाल देता है। मस्जिद न सही आज ईद के दिन सड़क पर तो नमाज़ में शामिल हो सकता है वह ! कौन समझ पायेगा ? वह भी तो महसूस करना चाहता है कि कैसा लगता है नमाज़ अदा करने में ! ये सब सोचकर नीली पोषाक पहने हुए विनोद अपने धार्मिक झाँकी वाले जुलूस में से निकल कर सड़क पर लगी जमात में नदीम को बग़ैेर बताये ठीक उसी के पीछे बैठ गया। ईद की नमाज़ का वक़्त हो… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 13, 2015 at 8:00am — 11 Comments

एक मज़दूर की आत्मा....

ये जो सफेद स्वीमिंग पूल है

पूल समझने की तुम्हारी भूल है

इसे मैंने मेरे ख़ून से रंगा है

तब कहीं ये इतना झकाझक है

तुम्हारी ज़िंदगी दौड़ रही है

लेकिन मुझे मौत खचोड़ रही है

ये दूधिया बल्ब

ये चमचमाती ट्यूबलाइटें

ये मेहराब सा कोई बुलंद दरवाजा

बड़ा से गेट

अंदर क़ैद नीला गहरा तलछटी तक

पारदर्शी पानी

वो मुसटंड डंडधारी गार्ड

मेरी आत्मा को बाहर से ही भगा देते हैं

भटकता हूं मैं जब रात को

कहते हुए इंसाफ़ की बात को

कभी ऑडी को तो… Continue

Added by बरुण सखाजी on November 13, 2015 at 1:00am — 7 Comments

महा पर्व छठ



बिहार प्रान्त एवं उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र से चल कर पूरे भारत में प्रसिद्ध होने वाले इस पर्व को महापर्व का क्यों  जाता है, इसका पता आपको इस व्रत की पूजा पद्वति से पता चल जायेगा। छठ पर्व छठ, षष्टी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसीय  व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया।

लोक-परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी…

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Added by Akhand Gahmari on November 12, 2015 at 5:00pm — 3 Comments

चिता कब बनोगी ?

 पौरुष ने उठाया हाथ

सहनशीलता  ने

कर तो लिया बर्दाश्त

पर चेहरा विकृत हुआ

अधर काँपे

आँखे पनिआयी 

झट वह चौके में चली गयी

बेटी दौड़ी-दौड़ी आयी

क्या हुआ माँ ?

कैसी आवाज आयी ?

और यह क्या तू रोती है ?

नहीं बेटी, ये लकड़ियाँ ज़रा गीली है

धुंआ बहुत देती है

आँख में गडता है, पानी निकलता है

बेटी ने कहा – ‘ माँ !

गीली लकड़ी का

तुमसे क्या सम्बन्ध है ?

माँ ने कहा ‘ हम दोनों

जलती…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 12, 2015 at 4:30pm — 11 Comments

कोरी शिक्षा (लघु कथा )राहिला

"हां,तो बताओ इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है? "

दादाजी!इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी किसी की चीज देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये।बल्कि हमारे पास जो कुछ भी है उसी में संतोष करना चाहिए । "

"शाबाश बेटा! क्योंकि संतोष ही सुख और सुकून की चाबी है । "

तभी -

"अरे आओ -आओ वर्मा जी!कहिये क्या सेवा कर सकता हूं आपकी? "

"बस दो बिस्कुट के पैकेट और एक चाय पत्ती का डिब्बा दे दीजिये । और ये बाहर गुप्ता जी !की दुकान के आगे नई कार खड़ी है ।उन्होनें !ले ली… Continue

Added by Rahila on November 12, 2015 at 4:24pm — 11 Comments

अनहोनी - (लघुकथा)

अनहोनी - (लघुकथा) –

दीपावली  पूजन की तैयारी हो रही थी!दरवाज़े की घंटी बजी!जाकर देखा,दरवाज़े पर अनवर खान साहब सपरिवार मिठाई का पैकेट लिये  खडे थे!हमारे ही मोहल्ले में रहते थे!मोहल्ले के इकलौते मुसलमान थे!किसी के जाना आना नहीं था!पूरा मोहल्ला एक तरफ़ और खान साहब एक तरफ़!कोई तनाव या टकराव नहीं था! सब शांति से चल रहा था मगर फ़ासले थे!

अचानक ऐसी स्थिति का सामना कैसे करें, जिसके बारे में कभी सपने में भी नहीं सोचा!हमारे कुछ कहने सुनने से पहले खान साहब ने मिठाई हाथ में देते हुए दिवाली की…

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Added by TEJ VEER SINGH on November 12, 2015 at 11:02am — 24 Comments

पूँजी के बंदर (नवगीत)

खिसिया जाते, बात बात पर

दिखलाते ख़ंजर

पूँजी के बंदर

 

अभिनेता ही नायक है अब

और वही खलनायक

जनता के सारे सेवक हैं

पूँजी के अभिभावक

 

चमकीले पर्दे पर लगता

नाला भी सागर

 

सबसे ज़्यादा पैसा जिसमें

वही खेल है मज़हब

बिक जाये जो, कालजयी है

उसका लेखक है रब

 

बिछड़ गये सूखी रोटी से

प्याज और अरहर

 

जीना है तो ताला मारो

कलम और जिह्वा पर

गली मुहल्ले साँड़…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 12, 2015 at 10:51am — 4 Comments

काहें खद्दर में? पंकज

खोज रहे हो सूत्र एकता, के तुम काहें खद्दर में।

नैतिकता का बलात्कार, होता है पार्टी दफ्तर में।।



अपनी टाँगें मोड़-माड़कर, खूब बचाकर पड़े रहो।

सोच रहे हो घर बस जाये, तम्बू वाले चद्दर में।।



संसाधन पर हक़ तब भी और, अब भी उन लोगों का है।

जो भी रहता है सत्ता के, इर्द-गिर्द के संस्तर में।।



नींद भला आती ही कैसे, उसकी बेबस आँखों में।

यादों के बादल बरसे वो, जगता रह गया बिस्तर में।।



दिल की धड़कन चलती रहती, ऐसे टूट नहीं जाती।

सच कहता हूँ धार… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 11, 2015 at 11:49pm — 13 Comments

चैनल दर चैनल ( लघु कथा ) जानकी बिष्ट वाही

"कितने मिष्ठ भाषी,सौम्य और मिलनसार थे तेरे पापा ।आज़कल न जाने उन्हें क्या हो गया।" माँ ने राघव से कहा।

" माँ ! मुझे भी ऐसा ही लग रहा है।मैं आज़ ही अपने मनोचिकित्सक दोस्त विवेक से इस बारे में बात करता हूँ।कि इस बदले व्यवहार का क्या कारण है।"

छः महीने पुरानी बात थी ज़ब पापा रिटायर हुये थे खूब खुश थे।

" बहुत काम कर लिया ।अब तो जिंदगी जीनी है।"

बस तभी से घर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। चैनल दर चैनल ये सिलसिला बढ़ता ही गया।

सुबह होते ही हिदायतें शुरू हो जाती।" आरव को…

Continue

Added by Janki wahie on November 11, 2015 at 5:30pm — 15 Comments

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