For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मखमली चाँदनी रोज आया करो---(ग़ज़ल)--- मिथिलेश वामनकर

212---212---212---212

 

मखमली चाँदनी रोज आया करो

पर सितारों से आमद छुपाया करो

 

तितलियों ने लिए है नए पैरहन

ऐ हवा ढंग से गुदगुदाया करो

 

सेलफोनो से आती हुई ये सदा

हर शज़र को बुला कर सुनाया करो

 

राधिका-सी जमीं रक्स करने लगे 

बादलो बांसुरी तो बजाया करो

 

औज की धडकनें थम न जाएँ कहीं

यक-बयक नौ कँवल मत खिलाया करो

 

इन गुलाबों पे फिर से जवानी चढ़े

इस तरह बाग़ में फाग गाया करो

 

एक दीवान से किस कदर दब गई

रैक को इस तरह मत सताया करो

 

बारिशों में धुली पत्तियां कह रहीं

गुनगुनी धूप को भी बुलाया करो

 

कब चले, कब रुके, ये हमें सिग्नलो

फलसफा जिंदगी का सिखाया करो

 

लॉन के छोर पर बैठ कर रो रही

ओंस को धूप से मत भिड़ाया करो

 

 

------------------------------------------------------------
(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
------------------------------------------------------------

Views: 885

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 25, 2015 at 4:01am

आदरणीय सतविंदर जी, ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार, बहुत बहुत धन्यवाद. 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 18, 2015 at 9:43am
बहुत सुंदर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 4:23pm

आदरणीय रवि जी, ग़ज़ल पर आपका अनुमोदन पाकर आश्वस्त हुआ हूँ. सराहना तथा उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद. 

Comment by Ravi Shukla on November 17, 2015 at 3:46pm

आदरणीय मिथलेश जी, शानदार व खुबसूरत ग़ज़ल कही  है आपने हम देर से इस ग़ज़ल तक आये पर आये एक शेर जो हर किसी की जुबान पर है हमें भी पंसद आया

तितलियों ने लिए है नए पैरहन

ऐ हवा ढंग से गुदगुदाया करो   बहुत खूब वाह

बारिशों में धुली पत्तियां कह रहीं

गुनगुनी धूप को भी बुलाया करो  बारिश में नहाई हुई पत्तिया गुनगनी धूप  क्‍या शानदार चित्र है और इसी भाव  का आखिरी  शेर।

लॉन के छोर पर बैठ कर रो रही

ओंस को धूप से मत भिड़ाया करो    लॉन के छाेर पर  दृष्टि , ओस और धूप का परस्‍पर विरोधी स्‍वभाव बहुत खूब चित्रण किया है

पूरी ग़ज़ल के लिये दिली दाद स्‍वीकार करें । सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 3:14pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर, ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 17, 2015 at 3:04pm

तितलियों ने लिए है नए पैरहन

ऐ हवा ढंग से गुदगुदाया करो

इन गुलाबों पे फिर से जवानी चढ़े

इस तरह बाग़ में फाग गाया करो---------------सुबहानअल्लाह , कमाल के शेर हैं . वाह .

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 16, 2015 at 11:45am

आदरणीया राजेश दीदी, आपका स्नेह मुझे सदैव प्रेरित करता है. ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद. सादर नमन 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 16, 2015 at 11:43am

आदरणीय सौरभ सर, ग़ज़ल पर आपका अनुमोदन पाकर आश्वस्त हुआ हूँ. सराहना, मार्गदर्शन तथा उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद. आपके मार्गदर्शन अनुसार त्रुटी सुधारता हूँ. सादर नमन 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 15, 2015 at 11:37pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही मिथिलेश भैया शेर दर शेर दाद कुबूलिये |

तितलियों ने लिए है नए पैरहन

ऐ हवा ढंग से गुदगुदाया करो ...वाह वाह 

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 15, 2015 at 11:32pm

वाह ! बवाल कर रही है आपकी ये प्रस्तुति ! बहुत खूब ! 

हृदयतल से बधाई स्वीकार करें 

सम्बोधन की संज्ञाओं में अनुस्वार न लगाया करें.  बादलो बाँसुरी सुनाया करो उचित होगा.  इसी तरह सिग्नलों  न हो कर सिग्नलो होगा.  लेकिन एक जगह अनुस्वार छूट भी गया है. जैसे, पत्तियां कह रही ! यहाँ रहीं होगा न ? ये सब तो व्याकरण सम्मत बातें हुईं. बाकी, ग़ज़ल ? सुबहान अल्लाह ! 

:-))

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
55 minutes ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Wednesday
Admin posted discussions
Tuesday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
Tuesday
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
Tuesday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
Monday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
Monday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Jan 10

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service