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तेरे होंठों से जुदा जाम रहा हूँ लेकिन -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

2122 - 1122 - 1122 - 22 या 112

 

तेरे होंठों से जुदा जाम रहा हूँ लेकिन

रोजे-अव्वल से ही बदनाम रहा हूँ लेकिन

 

हक़ जताने से कभी हक़ नहीं होता साबित

फ़र्ज़ के साथ में इकराम रहा हूँ लेकिन

 

जिंदगी की तो कभी सुबह नहीं बन पाया

तेरी तनहाई भरी शाम रहा हूँ लेकिन

 

यूँ लताफत की हिमायत में खड़ा रहता हूँ

सत्य के वास्ते दुरदाम रहा हूँ लेकिन

 

मैं अहिल्या के लिए राम नहीं बन पाया

राधिका के लिए घनश्याम रहा हूँ लेकिन

 

तेरी यादों की सुखन में मैं रहा या न रहा

तेरी हर नज्म का पैगाम रहा हूँ लेकिन

 

आज के दौर की रफ़्तार से तो जुड़ न सका

हाँफते शह्र का आराम रहा हूँ लेकिन

 

 लताफत- नम्रता या विनय, दुरदाम- अविनेय हठी

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 25, 2015 at 4:01am

आदरणीय सौरभ सर, इस प्रयास पर आपका अनुमोदन आश्वस्त करता हुआ सा है. अभिभूत हूँ. आपका स्नेह पाकर सदैव प्रेरित होता हूँ. ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार, बहुत बहुत धन्यवाद. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 19, 2015 at 10:11pm

आदरणीय मिथिलेशभाई, ग़ज़ल के अश’आर आपकी गहन सोच के प्रतिफल हैं. दिली दाद कुबूल कीजिये. 

आज के दौर की रफ़्तार से तो जुड़ न सका

हाँफते शह्र का आराम रहा हूँ लेकिन

कमाल ! कमाल !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 5:26pm

आदरणीया राहिला जी, ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार बहुत बहुत धन्यवाद सादर  

Comment by Rahila on November 17, 2015 at 4:55pm
बहुत शानदार ग़ज़ल हुई आदरणीय मिथलेश जी! जितनी तारीफ़ की जाय कम है ।बहुत बधाई आपको । सादर नमन ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 4:36pm

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर , आपकी दाद मेरे लिए सदैव प्रेरणादायक होती है. ग़ज़ल की सराहना तथा उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 4:33pm

आदरणीय बड़े भाई धर्मेन्द्र जी, आपकी दाद पाकर दिल खुश हो गया. ग़ज़ल की सराहना तथा उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 4:33pm

आदरणीय बैजनाथ जी, ग़ज़ल पर  सराहना तथा उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 4:32pm

आदरणीय सुशील सरना सर, ग़ज़ल की  सराहना तथा उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 4:31pm

आदरणीय गिरिराज सर, ग़ज़ल पर आपका अनुमोदन पाकर आश्वस्त हुआ हूँ. सराहना तथा उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 4:31pm

आदरणीय रवि जी, आपकी दाद मेरे लिए बहुत मायने रखती है. सराहना तथा उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद. 

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