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काहें खद्दर में? पंकज

खोज रहे हो सूत्र एकता, के तुम काहें खद्दर में।
नैतिकता का बलात्कार, होता है पार्टी दफ्तर में।।

अपनी टाँगें मोड़-माड़कर, खूब बचाकर पड़े रहो।
सोच रहे हो घर बस जाये, तम्बू वाले चद्दर में।।

संसाधन पर हक़ तब भी और, अब भी उन लोगों का है।
जो भी रहता है सत्ता के, इर्द-गिर्द के संस्तर में।।

नींद भला आती ही कैसे, उसकी बेबस आँखों में।
यादों के बादल बरसे वो, जगता रह गया बिस्तर में।।

दिल की धड़कन चलती रहती, ऐसे टूट नहीं जाती।
सच कहता हूँ धार बहुत थी, शब्दों वाले नश्तर में।।

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 16, 2015 at 3:45pm
आदरणीय गिरीराज सर सादर प्रणाम्

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 16, 2015 at 3:22pm
आदरणीय पंकज भाई , अच्छी गज़ल कही है , दिली बधाइयाँ आपको गज़ल के लिये ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 16, 2015 at 3:22pm
आदरणीय पंकज भाई , अच्छी गज़ल कही है , दिली बधाइयाँ आपको गज़ल के लिये ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 13, 2015 at 3:53pm
आदरणीय मिंटू जी सादर आभार।
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 13, 2015 at 1:44pm

आदरणीय पंकज कुमार जी ........बहुत खूब. बधाई |

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 13, 2015 at 8:22am
आदरणीय राहिला जी सादर अभिवादन
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 13, 2015 at 8:22am
आदरणीय सौरभ सर सादर प्रणाम्
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 13, 2015 at 8:21am
आदरणीय मिथिलेश सादर आभार।
Comment by Rahila on November 13, 2015 at 1:09am
बहुत खूब लिखा आदरणीय पंकज कुमार जी । बहुत बधाई आपको ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 12, 2015 at 11:42pm

ग़ज़लप्रस्तुति केलिए हार्दिक बधाई आदरणीय पंकजजी. 

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