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आइये महानुभाव!
बेख़ौफ़ आईये
मत घबराईये।।

ये गरीबखाना है
यहाँ सबका आना जाना है।

ये जो झीलंगहिया खटिया है न?
दर्द से चुर्र चुर्र ज़रूर कराहती है
पर यह सबके भार उठाती है।।

खैर!
आप मचिया पर बैठिये
किन्तु थोड़ा ठहरिये
इसे साफ़ कर देता हूँ
आपके लायक कर देता हूँ।

आपके श्वेतावरण का ध्यान है मुझे;
दाग अंदर हों, कोई बात नहीं
लेकिन
कपड़ों पर अच्छे नहीं लगते
ज्ञात है मुझे।।

बोलिये श्रीमान्
शर्म संकोच त्याग कर बोलिये।

ये गरीब की कुटिया है
यहाँ सबकी दाल गलती है,
क्योंकि;
यहाँ चूल्हे की जगह
"आग पेट में जलती है"
================
मौलिक एवम् अप्रकाशित
================

Views: 705

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 12, 2015 at 3:35pm
आदरणीय विजय सर सादर प्रणाम्
Comment by vijay nikore on November 12, 2015 at 3:30pm

अच्छा व्यंग्य है, रचना अच्छी है। बधाई।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 11, 2015 at 10:55pm
आदरणीय मिथिलेश सर रचना की तारीफ के लिए सादर अभिवादन

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 10, 2015 at 1:30pm

आदरणीय पंकज भाई जी बहुत बढ़िया प्रस्तुति हुई है. हार्दिक बधाई 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 9, 2015 at 6:56pm
आदरणीय इंद्र विद्या जी सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 9, 2015 at 6:55pm
सादर आभार आदरणीय राहिला जी।
Comment by indravidyavachaspatitiwari on November 9, 2015 at 4:14pm

   पेट में आग जलती है इसी कारण तो कुटिया में रहते हैं! ऐसा क्यों है़?
इसलिए आपको सहस्रशः बधाई।

Comment by Rahila on November 9, 2015 at 4:02pm
बहुत खूबसूरत रचना आदरणीय पंकज जी! बहुत बधाई आपको इस बेहतरीन व्यंग्य के लिये । सादर ।

कृपया ध्यान दे...

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