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तरही ग़ज़ल_मनोज अहसास

1222 1222 1222 1222





मेरी आँखों से ऎसे दर्द का रिश्ता निकल आया

जिसे रक्खा निग़ाहों में वही कतरा निकल आया



वो जिसको सारी दुनिया की खुदा ने बख्श दी दौलत

उसी के घर मेरा खोया हुआ कांसा निकल आया



न मेरे हिस्से में तेरी झलक थी इक नज़र को भी

बहुत परदे हटाये फिर भी एक पर्दा निकल आया



मैं दसरथ मांझी का किस्सा भी इस मिसरे में कहता हूँ

किसी की जिद के आगे नूर का रस्ता निकल आया



जो उसने कह दिया गर वाह बिना समझे ग़ज़ल मेरी

मेरे सिर… Continue

Added by मनोज अहसास on October 11, 2015 at 2:30pm — 6 Comments

अंतः स्मरण / लघुकथा

कैंसर का आखिरी चरण , अर्ध बेहोशी की हालत में , जिन्दगी की आखिरी साँस गिन रही थी वो । आॅक्सीजन मास्क भी अब निष्क्रिय सा प्रतीत हो रहा था ।

डूबते हुए लम्हों में कभी आँखें खोलती तो पल भर में बंद कर लेती । आई. सी. यू. वार्ड के बाहर बेटा -बहू , दामाद ,नाती -पोते सब आखिरी विदाई के वक्त साथ रहने की लालसा लिये उपस्थित थे ।



पति नम आँखों से माथे को सहलाते हुए उसे मरणासन्ना देख साथ - साथ बिताये धुप -छाँह जैसे समस्त पल , जिम्मेदारियों का सलीके से निर्वाह करने का भी स्मरण कर रहे थे… Continue

Added by kanta roy on October 11, 2015 at 9:16am — 2 Comments

शोधन मन का बहुत जरूरी!

शोधन मन का बहुत जरूरी,
क्यों खलता है खालीपन ?
**
बैठो कभी सरित के तट पर
गाते हैं मधुवन
बजते स्वर सुधियों के मद्धिम 
मधुरिम सा गुंजन
 …
Continue

Added by kalpna mishra bajpai on October 11, 2015 at 9:00am — 11 Comments

तालाब की मछलियाँ (लघुकथा)

इस बार गर्मियाँ तालाब का ढेर सारा पानी पी गईं। मछुआरे से बचते-बचाते धीरे-धीरे मछलियाँ बहुत चालाक हो गईं थीं। वो अब मछुआरे के झाँसे में नहीं आती थीं। उनके दाँत भी काफ़ी तेज़ हो गए थे। अगर कोई मछली कभी फँस भी गई तो जाल के तार काटकर निकल जाती थी। मछुआरे को पता चल गया था कि इस बार उसका पाला अलग तरह की मछलियों से पड़ा है। वो पानी कम होने का ही इंतज़ार कर रहा था।

उसने तालाब के एक कोने में बंसियाँ लगा दीं, दूसरी तरफ जाल लगा दिया और तीसरी तरफ से ख़ुद पानी में उतर कर शोर मचाने लगा। अब…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 10, 2015 at 6:47pm — 2 Comments

काल!

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कल, ए काल!

मैं, तेरे साथ ही आया था।

वादा भी था, साथ साथ चलने का , चलते रहने का।

आज,

तू मुझसे कितना आगे निकल गया.....!

नहीं नहीं... .. मैं रह गया हॅूं तुझसे बहुत पीछे.... ..!

इसलिये कि,

मैंने रुक कर, देखना चाहा इस प्रकृति के प्रवाह को,

पल पल बदलते रंगों के निखार को,

उलझती सुलझती वहुव्यापी चाह को।

तू... चलता रहा, चलता रहा कछुए की तरह,,,

और मैं ने अपनाया खरगोश की राह को।

एक बार नहीं , कई बार हुई हैं ये…

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Added by Dr T R Sukul on October 10, 2015 at 3:45pm — 2 Comments

नयन झील के हंस अकेले...

गीत  (नयन झील के हंस अकेले)

सत्य कामना प्रेम साधना, प्राण हवा प्रभु को भाते हैं.

नयन झील के हंस अकेले, मोती सारे चुंग जाते हैं..

 

प्रिय तुम्हारे आकर्षण से,

मन-दर्पण सब शरमाते हैं

सूरज- चंदा, गगन-सितारे,

सागर-घन सब घबराते हैं.

अहं बावरे रसिक दिवाने,

मूक-पंगु बन पछताते हैं.

नयन झील के हंस अकेले, मोती सारे चुंग जाते हैं..1

 

देह चांदनी छुवन मर्मरी,

सहज भाव यश वंदन करती.

पथ के घुंघुरू बांध…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 9, 2015 at 9:40pm — 7 Comments

"अनपढ़-गंवार" - [लघु कथा -14]

अपनी सास और जेठ-जिठानी से पिंड छुड़ाने के बाद, खुद को नये ज़माने की कहने वाली मात्र बारहवीं पास छोटी बहू काजल अब काफी संतुष्ट थी। बेटे को दूध पिलाने के लिए पति को राजी कर एक बकरी भी अब उसने पाल ली थी। गांव की एक लड़की से हर रोज़ की तरह घर की साफ-सफाई और लीपा-पोती करवाने के बाद आज काजल भोजन पकाने की तैयारी कर ही रही थी कि पति की ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी। आज फिर पड़ोसी से झगड़ा हो गया था। बेटे को वहीं रसोई में छोड़ फुर्ती से वह बाहर की ओर भागी। जैसे-तैसे झगड़ा शांत कराकर जब वापस…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 9, 2015 at 9:00am — 6 Comments

पथ का चुनाव / लघुकथा

आज फिर किसी विधुर का प्रस्ताव आया है । मन सिहर उठा जवान बच्चों की माँ बनने के ख्याल से ही ।



इस रिश्ते को भी ना कह कर अपने धनहीन दुर्बल पिता को संताप दूँ , या बन जाऊँ हमउम्र बच्चों की माँ । सुना है तहसीलदार है । शायद पिता की वे मदद भी करें उनकी दुसरी बेटियों के निर्वाह में ।



आज काॅलेज में भी मन नहीं लगा था । घर की तरफ जाते हुए पैरों में कम्पन महसूस की थी उसने ।



घंटे की टनकार, मंदिर से उठता हवन का धुँआ , कदम वहीं को मुड़ गये ।



ऊपर २५० सीढ़ियाँ , ऐसे चढ़… Continue

Added by kanta roy on October 9, 2015 at 8:50am — 6 Comments

कुछ दोहे !

झुमका झांझर चूड़ियाँ, करधन नथ गलहार |

बिंदी देकर मांग भर,.....कर साजन सिंगार ||

 

सूनी सेज न भाय रे, छलकें छल-छल नैन |

पी-पी कर रतिया कटे,....दिन करते बेचैन ||

 

उस आँगन की धूल भी, करती है तकरार |

अपनेपन से लीपकर , जहां बिछाया प्यार ||

 

हरियाली घटने लगी, कृषक हुए सब दीन |

राजनीति जब देश की, खाने लगी जमीन ||

 

टहनी के हों पात या, हों फुनगी के फूल |

दोनों तरु की शान हैं, तरु दोनों का मूल ||…

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Added by Ashok Kumar Raktale on October 8, 2015 at 7:00pm — 8 Comments

अब समाचार ब्यापार हो गए

अब समाचार ब्यापार हो गए

किसकी बातें सच्ची जानें
अब समाचार ब्यापार हो गए

पैसा जब से हाथ से फिसला
दूर नाते रिश्ते दार हो गए

डिजिटल डिजिटल सुना है जबसे
अपने हाथ पैर बेकार हो गए

रुपया पैसा बैंक तिजोरी
आज जीने के आधार हो गए

प्रेम ,अहिंसा ,सत्य , अपरिग्रह
बापू क्यों लाचार हो गए

सीधा सच्चा मुश्किल में अब
कपटी रुतबेदार हो गए

मौलिक और अप्रकाशित

मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on October 8, 2015 at 2:30pm — 2 Comments

गीतिका

गीतिका, आधार छंद- वाचिक महालक्ष्मी

(212 212 212)



शब्द अब गीत रचने लगे,

राज़ दिल के बिखरने लगे। /1/

दोस्त दुश्मन सभी दूर हैं

अब स्वयं को समझने लगे। /2/



नौकरी रिश्वतों से मिली,

आज अक्षम चमकने लगे। /3/



ठोकरें दीं सभी ने हमें,

पैर रखकर कुचलने लगे। /4/



प्रेम, दोस्ती रही आज तक,

शक हमें दूर रखने लगे। /5/



युग्म जुड़ कर करेंगे भला,

गीतिका-भाव भरने लगे। /6/



(मौलिक व अप्रकाशित)

_शेख़…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 8:07am — 9 Comments

नन्हें दिल की जीत (लघु कथा)

“बेटे सुजित, कहाँ हो” शर्मा जी अपनी चाबी से मुख्य दरबाजा खोलते ही अंदर अँधेरा देख बोले Iआबाज लगाते लगाते ही घर की बत्तियाँ जलाने लगे Iज्यों ही बेटे वाले कमरे की बत्ती का बटन दबाया, कक्षा दो  में पढ़ने बाले बेटे को मोबाइल पर अपने नन्हें दोस्तों से व्हाट्स एप पर चैटिंग करते देख डांटते  हुए बोले, “हर समय बस चैटिंग-चैटिंग, कुच्छ होम वर्क कर लेते I उठो, जाओ अपना होम वर्क करो I”

     “आइ एम सॉरी पापा --” रुआंसा हुआ सुजित बोला, “ पर पापा --आप सुवह मेरे स्कूल जाने से पहले आफिस निकल जाते हो और…

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Added by कंवर करतार on October 7, 2015 at 10:00pm — 6 Comments

लघुकथा तीसरी सवारी

"जल्दी करो भाई, देर हो  हो रही मुझे , आज तुझे छोड़, तेरी माँ को अस्पताल  भी दिखा कर फिर ड्यूटी जाऊँगा ” महिंद्र ने नवीन की तरफ देखते हुए कहा । मुश्किल से  दो घंटे की छुट्टी मिली थी ,जल्दी  चलें, तीनों बाहर आए और  मोटर साईकल पर सवार हो  घर से निकल पड़े, अभी चोंक पर आ के रुके तो ट्रैफिक पुलिस के मुलाज़िम ने रोक कर एक तरफ मोटर साईकल खड़ा करके कागज़ दिखाने के लिए कहा, तब महिंद्र ने  धीमी आवाज़ से  कहा “मुलाज़िम हूँ । बीवी ठीक नहीं है इसे अस्पताल दिखाने जा रहें हैं ।”  मगर ट्रैफिक पुलिस के मुलाज़िम…

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Added by मोहन बेगोवाल on October 7, 2015 at 9:30pm — 2 Comments

पुनर्जीवन (लघुकथा-3)

"गृहस्थी को ठीक ठाक से चलाते हुए कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।"

मनोज के मन में भारी द्वन्द्व चल रहा था।

अचानक पड़ी कठिनाई को हल कर पाने में स्वयम् को असमर्थ और असहाय महसूस कर रहा था वह।गृहस्थ जीवन के सम्बन्ध में दिमाग़ में आया अभी ही का विचार उसकी पीड़ा से धुन्धला हुआ जा रहा था।और उसने इह लीला समाप्ति को ही सभी समस्याओं का एक मात्र एवम् सम्पूर्ण हल समझ लिया।गहन गर्मी की उस दोपहर में मनोज सिर से सापा खोल अपने इरादे पर मुहर लगाने के लिए उसे हाथ में ले पेड़ पर चढ़ने… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 7, 2015 at 8:23pm — 6 Comments

"प्रत्युत्तर पैरोडी पर" - [लघु कथा]

क्रिकेट मैच जीतने के बाद मोहल्ले के लड़के जश्न मनाते हुए एक टीले पर बैठे हुए थे। मोटू सोनू ने अपनी टाइट शर्ट के बटन सही करते हुए कहा- "अब मैं करता हूँ आमिर खान की नकल ! टी.वी. पे वो नया विज्ञापन देखा है न....

"हम अब भी वहीं के वहीं खड़े हैं, न हम बदले, न हम मोटे हो रहे हैं।

ये तो कमबख़्त कपड़ों की है शरारत, जो अपने आप छोटे हो रहे हैं! "

"वाह, क्या बात है, इसी पे पैरोडी हो जाये। बोल संजू अब तू बोल "- उनमें से एक ने कहा।

संजू शुरू हो गया- "हम अब भी वहीं खड़े हैं, न हम बदले,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 7, 2015 at 11:00am — 6 Comments

''फ़लक पे सितारे चमक करके रोये'' (गज़ल)

१२२  /१२२  /१२२  /१२२

उजाले बहाये धधक करके रोये

फ़लक पे सितारे चमक करके रोये।

 

कोई चाँदनी बेवफ़ा तो थी वर्ना

क्यूँ सीना जलाये दहक करके रोये।

 

नमक इश्क का पी बहुत थीं ये आँखें

अदा अब ये सारे नमक करके रोये।

 

जो गम हम मिटाने चले जाम उठाने  

तो पैमाँ भराये छलक करके रोये।

तेरी खुश्बुओं से घर आँगन भराया

शजर फूल सारे महक करके रोये।

 

सलामत रहे तू दुआ है  हमारी

ये सुन गम…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 7, 2015 at 9:24am — 11 Comments

गजल(मनन)

गजल

2212 2212 2212

कुछ कुछ उठा कर कब्र से लाया गया

बिसरा हुआ संगीत सुनवाया गया ।

मतदान की होते यहाँ पर घोषणा

फिर कुंद वह हथियार चमकाया गया।

देते रहे गाली परस्पर थे बहुत

मिलकर गले उनके लिपट जाया गया।

देते रहे थे घाव अबतक तो वही

फिर से सभी जख्मों को' धुलवाया गया।

कितने अपावन हो गये जो साथ थे

जो था अपावन नेह नहलाया गया।

हम-तुम हमेशा साथ थे आगे रहें

ऐसा अभी फरमान चिपकाया गया।

घर-घर लगायी आग सब सोये रहे

संपर्क कर फिर वर्ग… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 6, 2015 at 11:09pm — 3 Comments

तुम न समझ पाओगे .....

तुम न समझ पाओगे .....

तुम न समझ पाओगे

मुहब्बत की ज़मीन पर

कतरा कतरा बिखरते

रूमानी अहसासों के सायों का दर्द

तुम तो बुत हो

सिर्फ बुत

जिसपर कोई रुत असर नहीं करती

तुम से टकराकर

हर अहसास संग -रेज़ों में तक़सीम जाता है

और साथ चलते साये का वज़ूद

सिफर में तब्दील हो जाता है

रह जाते हैं बस शानों पर

स्याह शब में गुजरे चंद लम्हे

जो आज मुझे किसी माहताब में

लगे दाग़ की तरह लगते हैं

तुम्हारी याद का हर अब्र

मेरी चश्म…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 6, 2015 at 9:42pm — 10 Comments

कस्तूर हो गयी हो

2212 122 2212 122



क्या आदतों से अपनी, मज़बूर हो गयी हो।

आँखों से मेरी काहें, तुम दूर हो गयी हो।।



सपनों में उनसे मिलता, कुछ हाल चाल कहता।

लेकिन बहुत बुरी हो, मग़रूर हो गयी हो।।



आती नहीं कभी भी, मिलने तू हमसे निदिया।।

यूँ छोड़ कर हमें तुम, मफ़रूर हो गयी हो।।



जगता रहा हूँ कब से, बीती हैं कितनी रातें।

पंकज से दुश्मनी कर, मशहूर हो गयी हो।।



तुझमें मेरे सनम में, कुछ साम्य लग रहा है।

सच सच बता रहा हूँ, कस्तूर हो गयी… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 6, 2015 at 6:13pm — 9 Comments

ममत्व -विस्तार/लघुकथा

'ममत्व-विस्तार'

'कितने दिन हो गए बेटा .....तुम्हे ...घर को छोड़े हुए।",बहुत दिन बाद मिले अपने बेटे को बूढ़ी माँ ने याचना पूर्वक कहा।

"बेटे! तुम्हे पढ़ाया-लिखाया,काबिल बनाया ताकि तुम ठीक प्रकार से अपनी गृहस्थी और काम सम्भाल सको।पर तुम पर पता नहीं किस पागलपन की धुन सवार है।जो किसी के बारे में नहीं सोचते और किसी कई भी नहीं सुनते।"

"ऐसा क्यों कहती हो माँ कि मैं किसी के बारे में कुछ नहीं सोचता?"

"सोचते तो ,ऐसा बर्ताव करते?कभी घर की सुध लेते हो?"

"माँ!तेरा ये लाल समाज और देश… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 6, 2015 at 6:02pm — 2 Comments

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