For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"गृहस्थी को ठीक ठाक से चलाते हुए कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।"
मनोज के मन में भारी द्वन्द्व चल रहा था।
अचानक पड़ी कठिनाई को हल कर पाने में स्वयम् को असमर्थ और असहाय महसूस कर रहा था वह।गृहस्थ जीवन के सम्बन्ध में दिमाग़ में आया अभी ही का विचार उसकी पीड़ा से धुन्धला हुआ जा रहा था।और उसने इह लीला समाप्ति को ही सभी समस्याओं का एक मात्र एवम् सम्पूर्ण हल समझ लिया।गहन गर्मी की उस दोपहर में मनोज सिर से सापा खोल अपने इरादे पर मुहर लगाने के लिए उसे हाथ में ले पेड़ पर चढ़ने लगा।
"पेड़ की टहनी पर बैठकर गर्मी कम लगती है क्या?"
अचानक एक अज़नबी आवाज ने उसे चौकाया।
"पेड़ पर चढ़े जा रहे हो,इस लिए पूछा।अगर ऐसा है तो पहले मुझे चढ़ाओ। मेरा एक पैर काम नहीं करता।"
मनोज ने ठिठक कर देखा,आंगतुक एक टांग से लँगड़ा था।
"अरे नहीं.......!मैं ......तो....... ऐसे...... ही बस.....।आओ नीचे ही बैठते है।"
वृक्ष के नीचे दोनों बैठ गए।
मनोज ने पूछना चाहा,"भाई तुम........"
"मैं....मैं यहाँ अज़नबी ही हूँ। बड़ी मेहनत से अपना परिवार पाल रहा हूँ। यहीं पास के गाँव में मेरी बुआ दादी रहती है।कभी कभार तंगी में उनकी मदद करने आ जाता हूँ।अब यहां उनका कोई नहीं रहता।सो मैं ही.....।"
"तुम करते क्या हो भाई?और परिवार में और कौन है?"
"मैं खड्डी में बुनाई का काम करता हूँ।परिवार में पत्नी और बिटिया है।"
"तुम....... ठीक....... से काम ......कर लेते हो।"
थोड़ा सकुचाते हुए मनोज पूछ पाया।
"हा हा मेरी अपंगता को मैं लाचारी मान लेता तो ज़िन्दगी खत्म थी।हिम्मत और इच्छाशक्ति इंसान को पुनर्जीवन देती है।गृहस्थी को सम्भालने में मदद करती है।"
ऐसा कहकर आगन्तुक उठकर अपनी राह चल दिया।
अप्रकाशित एवम् मौलिक

Views: 473

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 8, 2015 at 12:41pm
सकारात्मक प्रतक्रिया देकर आशीर्वाद देने के लिए सादर आभार आ डॉ विजय शंकर सर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 8, 2015 at 12:39pm
मेरी इस रचना पर सकारात्मक टिप्पणी कर हौंसला बढ़ाने के लिए हार्दिक आभार आ जयप्रकाश जी
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 8, 2015 at 12:36pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय शैख़ सहज़ाद जी प्रस्तुति को पढ़ने एवम् हौसला अफ़जाई के लिए।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 8, 2015 at 11:05am
प्रेरक लघु - कथा , आदरणीय सतविंदर कुमार जी।
Comment by Jayprakash Mishra on October 8, 2015 at 9:34am
Laghukatha k dwaar samaaj ke udas logon ke liye achchha sandesh, Badhaai Satavinder ji
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 8:32am
वाह, बहुत ही प्रेरक और उत्कृष्ट लघु कथा का सृजन हुआ है आदरणीय सतविंदर कुमार जी।बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आपको।
_शेख़ शहज़ाद उस्मानी

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service