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शोधन मन का बहुत जरूरी!

शोधन मन का बहुत जरूरी,
क्यों खलता है खालीपन ?
**
बैठो कभी सरित के तट पर
गाते हैं मधुवन
बजते स्वर सुधियों के मद्धिम 
मधुरिम सा गुंजन
 
नयन उघारो अंतर मन के
देखो नव जीवन ।
**
खोलो कभी हृदय के फाटक
बचा हुआ है गीलापन
स्वप्न लिए हैं रंग हजारों
कविता के गुंफन,
 
चित्र अधूरा मत छोड़ो तुम
रंग भरो नूतन ।
**
भला-बुरा सब चला बिसरने
मुखरित नव-नव क्षण
दिनकर देता नव्य दिवस नित
क्यों हैं तू उन्मन ?
 
मन में सुघर भाव को भर के  
करता चल तर्पण ।
क्यों खलता है खालीपन ?
**
मौलिक व अप्रकाशित  
कल्पना मिश्रा बाजपेई

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Comment

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Comment by Nita Kasar on October 27, 2015 at 10:22am
बेहद प्रेरक उम्दा प्रस्तुति है बधाईयां आपको आद० कल्पना मिश्रा जी ।
Comment by Rahila on October 25, 2015 at 4:13pm
बहुत सुन्दर नवगीत ।यूं लगा हर शब्द के साथ मन शीतल होता गया । बहुत बधाई आपको आद. कल्पना जी ।
Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 10:26pm
खोलो कभी हृदय के फाटक
बचा हुआ है गीलापन.... वाह !!! अद्भुत कोमल भाव समेटे हुए है इस पद्य के कण - कण में । फीचर पोस्ट में सम्मानित होने का गौरव तो मिलना ही था । ढेरों बधाई आपको आदरणीया कल्पना जी ।
Comment by kalpna mishra bajpai on October 21, 2015 at 6:13pm

आभार आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर आपका /सादर 

Comment by kalpna mishra bajpai on October 14, 2015 at 9:00pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी ,आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 14, 2015 at 8:19pm

आदरणीया कल्पना जी , प्रस्तुति के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 14, 2015 at 8:08pm

आदरणीया - तरपन तो तड़पन भी हो सकता है सही शब्द तर्पण है .

Comment by kalpna mishra bajpai on October 14, 2015 at 7:38pm

आदरणीय Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"जी हार्दिक आभार

Comment by kalpna mishra bajpai on October 14, 2015 at 7:37pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी हार्दिक आभार /सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 14, 2015 at 3:54pm

आदरणीया इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

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