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पाँव में है कील पर रुकना मना है,

पाँव में  है पीर पर  रुकना मना है,
प्रगति की राहों में चल थकना मना है ।
--
छांव को छोड़ो पचाओ धूप को तुम ,
गिड़गिड़ा चहुं ओर अब तकना मना है।
--
दांव चलने में लगा हर एक मोहरा,
बेवजह यूं मौन रह, छलना मना है ।
--
उत्साह  के रंग में रंगा जो दिल तिरा ,
निःस्वांस में आलस्य को भरना मना है ।
--
सत्यजीवन भर जिया ले घाव दिल पे 
अवसाद में भी धाव का रिसना मना है ।
--
काफिले गर चल पड़े भरने उजाले ,
एक भी दीपक का अब बुझना माना है ।
--
"कल्प"छोड़ो चैन, मन धारो सजगता,
भूल में भी आँख का मलना मना है ॥ 
--
मौलिक व अप्रकाशित 
कल्पना मिश्रा बाजपेई 
21/10/15 

Views: 1227

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Comment by kalpna mishra bajpai on October 26, 2015 at 8:53pm

आदरणीय राजेश कुमारी दीदी आपको रचना पसंद आई मुझे हर्ष है ।सादर आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 26, 2015 at 9:47am
जीतने में सत्य को मिलते रहे है घाव भी,
अवसाद में भी धाव का रिसना मना है ।---वाह  क्या बात है 
बहुत बढ़िया प्रस्तुति कल्पना जी ,दिल से बधाई लीजिये 

 

Comment by kalpna mishra bajpai on October 23, 2015 at 11:49am

आदरणीय  मिथिलेश वामनकर  जी आभार आपका /सादर 

Comment by kalpna mishra bajpai on October 23, 2015 at 11:48am

आदरणीया kanta roy  जी आभार आपका /सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 22, 2015 at 11:53pm

आदरणीया कल्पना जी बहुत बढ़िया प्रस्तुति हुई है. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 

Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 10:21pm
छांव को छोड़ो पचाओ धूप को तुम ,
गिड़गिड़ा चहुं ओर अब तकना मना है।.....

लाजवाब पंक्तियाँ हुई है यहाँ आदरणीया कल्पना मिश्रा जी । जीवन के कठिन रास्तों का जिक्र ऐसा छेड़ा है आपने कि मेरे पैरों में भी कुछ कील सा चुभने का एहसास दे गया है । रचना वही सार्थक जिसे हर पढने वाला स्वंय के लिए ही रचित जाने । हृदय से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by kalpna mishra bajpai on October 22, 2015 at 4:00pm

आभार आदरणीय Sushil Sarna  जी आपका 

Comment by kalpna mishra bajpai on October 22, 2015 at 3:59pm

आभार आदरणीया pratibha pande  जी आपका 

Comment by kalpna mishra bajpai on October 22, 2015 at 3:58pm

आभार आदरणीय Ajay Kumar Sharma जी आपका 

Comment by Sushil Sarna on October 22, 2015 at 3:44pm

पाँव में है कील पर रुकना मना है,
प्रगति की राहों में चल थकना मना है ।
… वाह आदरणीया कल्पना जी बहुत सुंदर भावों को आपने अपनी प्रस्तुति में चित्रित किया है … हार्दिक बधाई।

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