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November 2014 Blog Posts


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : श्रेष्ठ कौन ? (गणेश जी बागी)

                     पीतल और ऐलुमिनियम के बर्तनों में वर्चस्व की लड़ाई होने लगी, आखिर तय हुआ कि चाँदी महाराज से निर्णय करवाया जाये कि कौन श्रेष्ठ है । पीतल ने कहा कि उसके बर्तनों में देवों को भोग लगाया जाता है, कुलीनजनों के पास उसका स्थान है जबकि ऐलुमिनियम के बर्तनों में झुग्गी-झोपड़ी के लोग खाते हैं और तो और इसका कटोरा भिखमंगे लेकर घूमते रहते हैं । 

                    ऐलुमिनियम अपने पक्ष में कोई विशेष दलील नहीं दे सका…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 10, 2014 at 4:21pm — 31 Comments

रहस्य-भावानुभूति

रहस्य-भावानुभूति

पा लेने की प्यास

खो देने की तड़प

ज्वालामुखी अग्नि हैं दोनों

बिछोह के धुँए को आँखों में सहते

गहरापन ओढ़े

गुज़र जाते हैं एक के बाद एक

खुशिओं के त्योहार

खुशियों में शून्यताओं की पीड़ाएँ अपार

नहीं ठहरती है हाथों में

खुशी, मुठ्ठी में रेत-सी

पर मौसम कोई भी हो

अकुलाती रहती है पैरों के तलवों के नीचे

तपती रेत की अग्नि-सी…

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Added by vijay nikore on November 10, 2014 at 3:30pm — 12 Comments

दीनों का बस एक गुज़ारा ठाकुरजी

दीनों का बस एक गुज़ारा ठाकुरजी

कष्टनिवारक नाम तुम्हारा ठाकुरजी

 

जग ने हमको दुत्कारा है हर युग में

रखना तुम तो ध्यान हमारा ठाकुरजी

 

साख भराऊं तुमरे सूरज चंदा से

देहातों में है अँधियारा  ठाकुरजी

 

युगों युगों से खोज रहा हूं मैं ख़ुद को

दर दर भटकूं मारा मारा ठाकुरजी

 

सप्त सिंधु है बेबस तेरी अँजुरी में

मेरे होठों पर अंगारा ठाकुरजी

 

बीच भँवर में नैया डोले टेर सुनो

टूटा चप्पू दूर…

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Added by khursheed khairadi on November 10, 2014 at 2:30pm — 7 Comments

रेत की ढेरी - कविता

ऐ दिल

ख्वाबोँ की बस्ती से

निकल चल तो अच्छा हो

ये वो रँग हैँ

बिगाड देँगे जो

जिंदगी की तस्वीर

को तेरी

 

ले समझ

उस क्षितिज से आगे

है और भी दुनिया

सरकती जाती है सीमायेँ

और राहेँ साथ चलती हैँ

हर सजग राही की

बन चेरी

 

है गम

हार का अच्छा

न जश्न

किसी जीत का बेहतर

हवाओँ के रुख के साथ

बदलती रह्ती है

मरु मेँ रेत की

ये ढेरी

 

मौलिक…

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Added by Mohinder Kumar on November 10, 2014 at 12:30pm — 4 Comments

निर्माल्य

छंद- गीतिका

लक्षण – इसके प्रत्येक चरण में (14 ,12 )पर यति देकर 26 मात्रायें होती हैं I इसकी 3सरी, 10वीं, 17वीं और 24वीं मात्रा  सदैव लघु होती है I चरणांत में लघु –दीर्घ होना आवश्यक है

 

मिट चुकी अनुकूलता सब अब सहज प्रतिकूल हूँ I

मर चुका जिसका  ह्रदय वह एक  बासी फूल हूँ II

 

किन्तु तुम  संजीवनी हो ! प्राणदा हो ! प्यार हो !

हो अलस  संभार…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 10, 2014 at 12:00pm — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - क़सम ले लो उन्हें फिर भी न मैं बुरा कहता --( गिरिराज भंडारी )

क़सम ले लो उन्हें  फिर भी न मैं बुरा कहता

****************************************

१२१२      ११२२     १२१२     २२ /११२ 

वो मेरे दिल में न होते  तो मैं  ज़ुदा  कहता

क़सम ले लो उन्हें  फिर भी न मैं बुरा कहता

 

वो जिसकी  ताब ने ज़र्रे  को आसमान किया  ( ओ बी ओ को समर्पित )

उसे न कहता तो फिर किसको मैं ख़ुदा कहता

 

रहम  दिली  पे  मुझे  खूब  है यकीं  उनकी

करूँ क्या ? वक़्त मिला  ही न  मुद्दआ  कहता 

 

तवील …

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Added by गिरिराज भंडारी on November 10, 2014 at 8:57am — 24 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

दिल ये मेरा फ़क़ीर होना चाहे

घर फूँके बिन कबीर होना चाहे

 

तकसीम मज़हबों में करके हमको

तू बस्ती का वज़ीर होना चाहे

 

किस्मत में न सही तू ,पर तेरे ही

हाथों की वो लकीर होना चाहे

 

माँ की बराबरी करना छोडो तुम

गो ,खिचड़ी आज खीर होना चाहे

 

शोख नज़र दिलनशी अदा ये रूखसार

देख तुझे दिल शरीर होना चाहे

 

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on November 10, 2014 at 7:00am — 5 Comments

दोहे १८(विविधा)

मन को दुर्बल क्यों करें'क्षणिक दीन अवसाद।

आगे देखो है खड़ा'आशा का आह्लाद।।

रिश्ते भी अब हो गये'ज्यों दैनिक अखबार।

आज पढ़ लिया प्रेम से'कल फिर से बेकार।।

ह्रदय प्रेम से भर गया'देखा अनुपम प्यार।

कामदेव दुन्दुभि लिये'आये मेरे द्वार।।

खुद को भी आवाज़ दे,खुद को ज़रा पुकार!

एक रात तू भी कभी,खुद के साथ गुजार।!

आप कहो कुछ मै कहूँ'बातें हो दो चार।

तुम खुश मैं भी खुश रहूँ'बना रहेगा…

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Added by ram shiromani pathak on November 9, 2014 at 1:58pm — 16 Comments

लिव इन रिलेशनशिप

रविवार का दिन था। सज्‍जनदासजी के घर पड़ौसी प्रकाश चौधरी आ कर चाय का आनंद ले रहे थे।

बातों बातों में प्रकाशजी ने कहा- ‘क्‍या जमाना आ गया, देखिए न अपने पड़ौसी, वे परिमलजी, कोर्ट में रीडर थे, उनके बेटे आशुतोष की पत्‍नी को मरे अभी साल भर ही हुआ है, मैंने सुना है, उसने दूसरी शादी कर ली है। बेटा है, बहू है और एक साल की पोती भी। अट्ठावन साल की उम्र में क्‍या सूझी दुबारा शादी करने की। पत्‍नी नौकरी में थी, इसलिए पेंशन भी मिल रही थी। अब शादी करने से पेंशन बंद हो जाएगी। यह तो अपने पैरों पर…

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Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on November 9, 2014 at 9:30am — 7 Comments

मोक्ष की अभिलाषा

मोक्ष की अभिलाषा

क्या मेरा जीवन निर्धारण
करेगी मेरी जन्म कुंडली
कर्म बंधेगा नव ग्रहों से
होगा भाग्य चक्र निर्धारित इनसे
मुझे नहीं जिज्ञासा
क्या लिख चुका
क्या लिख रहा विधाता
मैं अनंत का पंछी
मुझे नहीं मोक्ष की अभिलाषा

© हरि प्रकाश दुबे
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Hari Prakash Dubey on November 8, 2014 at 8:00pm — 16 Comments

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण रामानुज

अविनाशी प्रभु अंश ही, कृष्ण रहे बतलाय

मोह रहे न कर्म सधे, कर्म सधे फल पाय

कर्म सधे फल पाय, राह चलकर पथ पाते

हर पल चाहे लाभ, निभे क्या रिश्ते नाते

लक्ष्मण कहते संत, रहे मानव मितभाषी

आत्मा छोड़े देह, जो है अमर अविनाशी |

 

गंगा मात्र नदी नहीं, समझे इसका सार

गंगा माँ को मानते जीवन का आधार |

जीवन का आधार, इसी से भाग्य जगा है

कूड़ा कचरा डाल, मनुज ने किया दगा है

कह लक्ष्मण कविराय, रहोगे तन से चंगा

धोते सारे पाप,  रखे…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 8, 2014 at 6:20pm — 17 Comments

ग़ज़ल

करें कैसे भरोसा जिन्दगी का !
नहीं है आदमी जब आदमी का !!

नहीं फिर लूट पाता वो हमें भी !
वहाँ पर साथ होता गर किसी का !!

करे वो प्यार भी तो पागलो सा !
मगर ये खेल लगता दिल्लगी का

नहीं करता अगर हम को इशारे !
न होता सामना नाराजगी का !!

इबादत से डरे क्यों हम खुदा की !
मिले है रास्ता जब बंदगी का !!

अगर अपना समझ कर साथ में हो
भरोसा तो करो फिर दोस्ती का !!
.
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Alok Mittal on November 8, 2014 at 2:30pm — 14 Comments

धर्म....(लघुकथा)

जानकीप्रसाद जी सेवानिवृत्ति के पश्चात कई वर्षों से अपनी पत्नि के साथ, बड़े प्यार से अपना बचा हुआ जीवन व्यतीत कर रहे है. दीपावली के आते ही घर में रंगरोगन का काम शुरू होने वाला है. जानकीप्रसाद जी ने अपने पडौसी से कहकर, दीवारों पर रंग करने के लिए एक पुताई वाले को बुलवाया है. उस पुताई वाले  नौजवान को देख अकेले रह रहे बुजुर्ग दंपति बहुत खुश है. क्युकी दो-तीन दिनों के लिए एक मेहमान आया है

 

“बेटा! तुम्हारा क्या नाम है..? “ जानकीप्रसाद जी ने बड़े ही स्नेह से पूछा

 

प्रश्न…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2014 at 10:23am — 24 Comments

उमेश कटारा ग़ज़ल --------चाँद ने मुस्कराकर जलाया बहुत

212 212 212 212

------------------------------------

एक किस्सा उसी ने बनाया मुझे

फिर तो पूरे शह़र ने ही गाया मुझे



बात आँखों से आँखों ने छेडी ज़रा

रात को छत पे उसने बुलाया मुझे



चाँद शामिल रहा फिर मुलाकात में

प्यार का गीत उसने सुनाया मुझे



रात चढ़ती गयी बात बढ़ती गयी

उसने बाहों में भरके सुलाया मुझे



मिल गये दिल, बदन से बदन मिल गये

पंछियों की चहक ने ज़गाया मुझे



सुब्ह होने से पहले दिखा आयना

खुद हक़ीक़त…

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Added by umesh katara on November 8, 2014 at 10:00am — 22 Comments

तो फिर बात ही क्या थी

सफ़र तय किये हमने मोहब्बत में साथ चलकर

इश्क़ में बुने सपने तुम्हारे साथ जो मिलकर

हकीक़त हो गये होते ,तो फिर बात ही क्या थी

होते तुम हमारे साथ ,तो फिर बात ही क्या थी |



राह कांटों भरी मोहब्बत की फिर भी चल दिए हम तुम

मिले जो दर्द ज़माने से उसे भी सह लिए हम तुम

जहाँ देता न ये दर्द ,तो फिर बात ही क्या थी

होते तुम हमारे साथ ,तो फिर बात ही क्या थी |



तेरे ख्वाबों का वस्त्र धारण कर लिया मैंने

तेरी चाहत रूपी शस्त्र धारण कर लिया मैंने

स्वीकृत… Continue

Added by maharshi tripathi on November 7, 2014 at 9:27pm — 8 Comments

कुर्सी वाले लोग

क्या क्या मँशा उनसे बैठे पाले लोग

क्या करते हैँ सत्ता के ठैले वाले लोग

 

यहाँ दिन भर खटकर  चुल्हा जलता

कुछ जनता की खाते बैठे ठाले लोग

 

सरकारेँ बनती पूँजीपतियोँ के पैसे से

ताकत वोट की समझेँ भोले-भाले लोग

 

कुछ सालोँ बाद हवा खुद बदलती है

बुझा पुरानी नई मशाल सँभालेँ लोग

 

कुर्सी पर बैठे लोगोँ के हैँ ऊँचे सपने

जनता को सपने बेचेँ कुर्सी वाले लोग

देश विदेश के दौरे  हैँ उनकी…

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Added by Mohinder Kumar on November 7, 2014 at 3:30pm — 5 Comments

केतली में उज़ाला

उसने खौला लिया था सूरज एक चम्मच चीनी के साथ

वह जीवन के कडुवे अंधेरों में कुछ मिठास घोलना चाहता था 

उसके दिन के उजाले चाय के कप में डूबे हुए थे 

और उसका सूरज

ताजगी देता हुआ जीवन की उष्मा से भरपूर

गर्म शिप बनकर उतर आता था लोगों की जिव्हा पर …

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Added by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on November 7, 2014 at 11:00am — 16 Comments

गुनाह होना आम हो गया - डॉo विजय शंकर

वो गुनाह को पनाह देते रहे

वो पनपता रहा , वो मौज करते रहे .

गुनाह होना रोज का काम हो गया

ऐसा काम , कि बस आम हो गया ,

जब चाहे , जहां हो जाये ,

कौन जानें , कब , कहाँ हो जाये .

हालात ये हैं कि अब लोग चौंकते नहीं ,

कहीं , कुछ भी , हो जाए बोलते नहीं ,

कहीं , किसी से , कुछ पूछतें नहीं

उस तरफ , उफ्फ … देखते नहीं ,

ये हालात हैं , जो शर्मिन्दा कभी हुए नहीं ,

जब कि गुनाह खुद बेइंतहा शर्मिन्दा है ....

कि लोगो में उसके लिए कोई खौफ नहीं है

इस… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on November 7, 2014 at 10:59am — 22 Comments

“मुझे पत्थरों से टकराने दो”

तुम बने रहो अविनाशी
मेरा सर्वनाश हो जाने दो
स्वयं बने रहो अजन्मे
मुझे जनम-जनम भटकाने को
रहो तुम बैठे मंदिरों में
मुझे यायावर बन जाने दो
करवाओ खुद पर फूलों की वर्षा
मुझे पत्थरों से टकराने दो
मुझे पत्थरों से टकराने दो !!
© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Hari Prakash Dubey on November 6, 2014 at 7:00pm — 9 Comments

नैन कटीले …

नैन कटीले …

नैन कटीले होठ रसीले
बाला ज्यों मधुशाला
कुंतल करें किलोल कपोल पर
लज्जित प्याले की हाला
अवगुंठन में गौर वर्ण से
तृषा चैन न पाये
चंचल पायल की रुनझुन से मन
भ्रमर हुआ मतवाला
प्रणय स्वरों की मौन अभिव्यक्ति
एकांत में करे उजाला
मधु पलों में नैन समर्पण
करें प्रेम श्रृंगार निराला

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on November 6, 2014 at 6:18pm — 26 Comments

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