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दीनों का बस एक गुज़ारा ठाकुरजी

दीनों का बस एक गुज़ारा ठाकुरजी

कष्टनिवारक नाम तुम्हारा ठाकुरजी

 

जग ने हमको दुत्कारा है हर युग में

रखना तुम तो ध्यान हमारा ठाकुरजी

 

साख भराऊं तुमरे सूरज चंदा से

देहातों में है अँधियारा  ठाकुरजी

 

युगों युगों से खोज रहा हूं मैं ख़ुद को

दर दर भटकूं मारा मारा ठाकुरजी

 

सप्त सिंधु है बेबस तेरी अँजुरी में

मेरे होठों पर अंगारा ठाकुरजी

 

बीच भँवर में नैया डोले टेर सुनो

टूटा चप्पू दूर किनारा ठाकुरजी

 

तेरी माया तू ही जाने रघुनंदन

नदियाँ मीठी सागर खारा ठाकुरजी

 

चाह यही है मातृधरा की सेवा में

अर्पित कर दूं जीवन सारा ठाकुरजी

 

गीत झरोखे से इतना सुख झरता है

कट जायेगी गम की कारा ठाकुर जी 

.

 मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 12, 2014 at 11:12am

सार्थक और सुंदर भाव रचित गजल मन को छू गयी | बहुत बहुत बधाई श्री खुर्शीद खैराडी जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 12, 2014 at 10:55am

बहुत ही सहजता के साथ बड़ी गहन गहन बातें करते अशआर बहुत पसंद आये 

हर शेर बहुत सुन्दर हुआ है 

हार्दिक बधाई आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 11, 2014 at 3:21pm

बेहतरीन , लाजवाब ,अति सुन्दर i बधाई हो i

Comment by Mohinder Kumar on November 11, 2014 at 11:09am

आदरणीय खुर्शीद जी सार्थक सात्विक विचार प्रवाह लिये आपकी रचना को  पढना अत्यंत सुखकर लगा.  लिखते रहिये

 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 11, 2014 at 8:30am

बहुत सुंदर गजल. इस गजल को पढ़कर मन को तसल्ली होती रही, वैसे ही जैसे अत्यधिक धुप से छाँव में आ गये हों. ह्रदय से बधाई स्व्वीकरिये आदरणीय खुर्शीद साहब

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 10, 2014 at 10:51pm

कष्टनिवारक नाम तुम्हारा ठाकुरजी
रखना तुम तो ध्यान हमारा ठाकुरजी
बहुत सही लिखा है , हम ईश्वर का ध्यान इसलिए रखते हैं ताकि वह हमारा ध्यान रखे।
बहुत ही सारगर्भित प्रस्तुति आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी , बधाई , सादर।


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 10, 2014 at 6:35pm

इस ग़ज़ल को पढ़कर रूह तक ठंडक पहुंची है आ० खुर्शीद खैराड़ी साहिब। इस लाजवाब प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकारें।

कृपया ध्यान दे...

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