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ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

चादर झीनी देख कबीरा

मैली ओढ़ी देख कबीरा

जीना मरना सब साथ चले

काया साझी देख कबीरा

ईश भगत का रिश्ता ऐसा

भूखा रोटी देख कबीरा

ऊँच नीच का अंतर कैसा

काया माटी देख कबीरा

यम इक राजा मिलना चाहे

आत्मा रानी देख कबीरा

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

आपके सुझाओं व समालोचना की प्रतीक्षा में ......

Added by gumnaam pithoragarhi on January 23, 2015 at 7:29pm — 14 Comments

दान (लघुकथा)

ठण्ड भयानक पड़ने लगी थी और विभिन्न समाजसेवी संस्थाएं रोज लोगों से अपील कर रही थीं कि सड़क के किनारे रह रहे लोगों को गर्म वस्त्र दान करें | सड़क पर तमाम न्यूज़ चैनल की गाड़ियां घूम रही थीं और इन कार्यक्रमों को दिखा रही थीं |

उस मोहल्ले के आखीर में भी एक भिखारी सड़क पर पड़ा हुआ था | कुछ लोगों ने उसे ऊनी कम्बल इत्यादि दान किये और ये भी उन चैनल्स ने कैमरों में कैद किया लेकिन उसकी हल्की बुदबुदाहट पर किसी ने ध्यान नहीं दिया |

सुबह वो भिखारी मरा पड़ा था | लोग खाने के लिए देना भूल गए थे…

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Added by विनय कुमार on January 23, 2015 at 6:00pm — 22 Comments

आज की प्रलय

"आज की प्रलय"

कोहरे का कहर सांझ घिरने के साथ साथ बढ़ता जा रहा था, गंगाजी से उठती ठंडी हवा शरीर को छूरी की तरह काट रही थी। विश्वा को लगने लगा था कि आज की रात रेतीली जमीन पर बिछे चिथड़े भी उसको इस प्रलय से नही बचा पायगें। मानवीय आस तो बाकी थी नही सो विश्वा अपने ईष्ठ देव को ही बार बार याद करने लगा।

"भाई ये बहुत अच्छा हुआ जो सुरज ढलने से पहले संस्कार हो गया ।"

"सही कहा भैयाजी नही तो सारी रात ठंडी में गंगा किनारे ही बितानी पड़ती।"

सामने से गुजरते कुछ लोगो की आवाजे सुनकर…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on January 23, 2015 at 4:30pm — 10 Comments

प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो ....

प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो ....

तुम ही आदि हो तुम ही अनन्त हो

प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो

नयन आँगन का तुम मधुमास हो

रक्ताभ अधरों की तुम ही प्यास हो

तुम ही सुधि हो मेरे मधु क्षणों की

मेरे एकांत का तुम ही अवसाद हो

नयन पनघट का  मिलन  पंथ हो

तुम ही आदि हो तुम ही अनन्त हो

प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो



इस  जीवन  की  तुम  हो परिभाषा

मिलन- ऋतु  की  तुम  अभिलाषा

भ्रमर  आसक्ति  का  मधु  पुष्प हो…

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Added by Sushil Sarna on January 23, 2015 at 1:06pm — 19 Comments

सात फेरों की रस्में निभाओ मगर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    1221    2212

**********************

रूह  प्यासी  बहुत  घट ये  आधा न दो

आज ला के निकट कल का वादा न दो



रूख  से  जुल्फें  हटा  चाँदनी  रात में

चाँद को  आह  भरने  का मौका न दो



फिर  दिखा  टूटता नभ  में तारा कोई

भोर  तक  ही  चले  ऐसी आशा न दो



प्यार  के  नाम  पर  खेल कर देह से

रोज  मासूम  सपनों  को धोखा न दो



सात फेरों  की  रस्में  निभाओ  मगर

देह  तक ही  टिके  ऐसा  रिश्ता न दो



चाहिए  अब …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 23, 2015 at 11:00am — 10 Comments

कितनी अपनी है जिंदगी --- डॉ o विजय शंकर

अपनी होते हुए भी कितनी अपनी है जिंदगी ,

हम नाचते हैं जिंदगी भर , नचाती है जिंदगी।



बस में बिलकुल नहीं है किसी के भी जिंदगी

खुद पर जिंदगी भर कितनी हावी है जिंदगी।



हसरत है तुझे जी लें एक बार अपने ही ढंग से

पर तू तो अपने ही ढंग से जिलाती है जिंदगी।



वो नाचने वाला है ,हुनर है , यही रोजी है उसकी ,

उसको भी अपने ही ढंग से नचाती है जिन्दंगी |



उसकी मर्जी ,करम कैसे - कैसे कराती है जिंदगी

निष्ठुर अपने ही ढंग से हँसाती-रुलाती है जिंदगी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 23, 2015 at 10:42am — 15 Comments

गुरू लीला (लघुकथा) : कान्ता राॅय

धर्म के प्रति प्रगाढ़ आस्था के कारण ही सुधा आज घर द्वार सब त्याग गुरू आश्रम चली आई ।



"सुना है गुरूदेव आज रात खास आयोजन करने वाले है । जाने आज किसका भाग्योदय होने वाला है? " आश्रम में सुगबुगाहटें जारी थी ।



लगभग १२ बजे सभा गृह में सब गुरू सेविकायें उपस्थित थी कि सहसा गुरूदेव का आगमन हुआ । पीताम्बर धारण किये हुए, सिर पर मोर मुकुट सजाये हुए आज गुरूदेव कृष्ण रूप में रास के लिए राधा का चयन करने वाले थे ।



कृष्ण रूपी गुरूदेव जब सुधा के सामने ठिठके तो उसका हृदय रो उठा…

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Added by kanta roy on January 23, 2015 at 8:30am — 26 Comments

हिम्मत साथ नहीं देती है

हिम्मत साथ नहीं देती है

किसको अपना दर्द बतायें कौन सुनेगा अपनी बात

सुनने वाले व्याकुल हैं अब अपना राग सुनाने को

हिम्मत साथ नहीं देती है खुद के अंदर झाँक सके

सबने खूब बहाने सोचे मंदिर मस्जिद जाने को

कैसी रीति बनायी मौला चादर पे चादर चढ़ती है

द्वार तुम्हारे खड़ा है बंदा , नंगा बदन जड़ाने को

दूध कहाँ से पायेंगें जो, पीने को पानी न मिलता

भक्ति की ये कैसी शक्ति पत्थर चला नहाने को

जिसे देखिये मिलता है अब चेहरे पर मुस्कान लिए…

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Added by Madan Mohan saxena on January 22, 2015 at 5:00pm — 5 Comments

सांस है मुसाफिर......(एक रचना )

सांस है मुसाफिर.......(एक रचना )

सांस है मुसाफिर इसको  राह में ठहर जाना है

जिस्म के  पैराहन को  जल के बिखर जाना है

दुनिया को मयखाना  समझ नशे में ज़िंदा रहे

होश आया तो समझे कि ख़ुदा  के घर जाना है

याद किसकी सो  गयी  बन के अश्क आँख में

धड़कनें समझी न ये  जिस्म  को मर जाना है

ज़िंदगी समझे जिसे  दरहक़ीक़त वो ख़्वाब थी

सहर होते ही जिसे बस रेत सा बिखर जाना है

कतरा-कतरा  प्यार  में जिस के हम मरते रहे …

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Added by Sushil Sarna on January 22, 2015 at 3:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल - दर-दर फिरते लोगों को : सलीम रज़ा रीवा

22 22 22 22 22 2

.

दर-दर फिरते लोगों को दर दे मौला :

बंजारों को  भी अपना घर  दे  मौला :



जोऔरों की खुशियों  में खुश होते  हैं :

उनका भी घर खुशियों से भर दे मौला :



दूर गगन में उड़ना चाहूँ   चिड़ियों सा :

मुझ को भी वो ताक़त वो पर दे मौला :



ज़ुल्मो सितम हो ख़त्म न हो दहशतगर्दी :

अम्नो अमां की यूं बारिश  कर  दे मौला :



भूके प्यासे मुफ़लिस और  यतीम हैं जो :

नज़्र-ए-इनायत उनपर भी कर दे मौला :



जो करते हैं खून…

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Added by SALIM RAZA REWA on January 22, 2015 at 2:00pm — 10 Comments

मुक्ति--

फिर आधी रात को उनकी आँख खुल गयी , पसीने से तरबतर वो बिस्तर से उठे और गटागट एक लोटा पानी हलक में उड़ेल दिया | ये सपना उन्हें पिछले कई सालों से परेशान कर रहा था | अक्सर वो देखते कि एक हाँथ उनकी ओर बढ़ रहा है और जैसे ही वह उनके गर्दन के पास पहुँचता , घबराहट में उनकी नींद खुल जाती |

अब वो जिंदगी के आखिरी पड़ाव में थे और अब खाली समय था उनके पास | रिटायरमेंट के बाद वो और पत्नी ही रहते थे घर में , बच्चे अपने अपने जगह व्यस्त थे | पत्नी भी परेशान रहती थी उनकी इस हालत से और कई बार पूछती थी कि क्यों…

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Added by विनय कुमार on January 22, 2015 at 12:12pm — 14 Comments

चुनावी जिन्न

चुनावी जिन्न(कविता )

जांचे परखें और चुनें

चलों नया देश बुनें

रूढ़ परिपाटी हों छिन्न

सच्च हों ,अच्छे दिन |

ये भाषण का व्यवहार

और सतरंगी इश्तिहार

कायाकल्प हो सर्वांगीण

ना केवल चाय नमकीन |

बंद तोड़फोड़ और धरने

सियासी नफ़ा आमजन मरने

पहुंच जाएँगे बुलंदी पर

चटाकर हमें जमीन |

झाड़ू हाथी कमल हाथ

क्रांति जाति धर्म सब-साथ

एक थैली के ही चट्टे-बट्टे

देखों ना इन्हें भिन्न |

अज़ीब-अज़ीब…

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Added by somesh kumar on January 22, 2015 at 10:30am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
डरी आँखों ने देखा वो नज़ारा कैसे---(ग़ज़ल 'राज')

१२२२  १२२२  १२२२ २ 

कभी फुर्सत मिले तो सोच हारा कैसे

बिना तैरे मिले किसको किनारा कैसे

 

जहाँ लगती दिलों की भी बराबर कीमत

वहाँ पैसों बिना भी हो गुज़ारा  कैसे

 

जिसे भाने लगे  कबसे रकीबों के घर

भला दिल से कहें उसको हमारा कैसे

 

मुहब्बत की जहाँ रिमझिम फुहारें गिरती  

सुलग उट्ठा वहाँ अदना शरारा कैसे

 

जहाँ मासूम लाशें हर तरफ फैली थी

डरी आँखों ने देखा वो नज़ारा  कैसे

 

 

नहीं मिलती…

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Added by rajesh kumari on January 22, 2015 at 10:25am — 17 Comments

पंचायत (लघुकथा)

"भीखू, तुम्हारे बेटे पर चौधरी साहब की बेटी से बलात्कार करने का अपराध साबित हो गया है। अब पंचायत अपना फैसला सुनाएगी।"
"मैं भरी पंचायत में यह यकीन के साथ कह सकता हूँ यह मेरा बेटा नहीं हो सकता है। हमारे खून में इतनी हिम्मत नहीं है किसी के साथ जबरदस्ती करे। यह जरूर किसी.........।"


मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on January 22, 2015 at 10:00am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
' मै कभी नहीं मरता ' --अतुकांत -- गिरिराज भंडारी

मै कभी नहीं मरता

******************

आप बच नहीं सकते

उलझने से

ऐसा इंतिज़ाम है मेरा

फैला दिया है मैने मेरा अहंकार हर दिशाओं मे

हर दिशाओं के हर कोणों में

बस मैं हूँ , मैं

 

कहीं भी जायें, उलझेंगे ज़रूर

जब भी कोई उलझता है , मेरे मैं से 

चोटिल करता उसे

तत्काल मुझे ख़बर लग जाती है , और तब

मुझे खड़ा पाओगे तुम उसी क्षण

अपने विरुद्ध

तमाम हथियारों से सुसज्जित

 

ये भी तय है ,

हरा…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 22, 2015 at 9:30am — 18 Comments

महिला पार्षद (लघुकथा) :कान्ता राॅय

हर जगह चुनावी माहौल, पार्षद के चुनाव में जाने कहाँ-कहाँ से कुकुरमुत्ते की तरह  नई नई पार्टियां दिखाई देने लगी । जिन्होंने कभी घर से बाहर कदम नहीं निकाले वे स्त्रियां भी गले में माला डाले गली गली घूम रही है । जाने कौन कौन से कोटे के तहत चुनाव लड रही है । बात करने गई तो मालूम हुआ बात करने में नेताईन को पसीना भी आता है ।

"जीत जायेंगी तो कैसे संभालेंगी इतनी जिम्मेदारी ।"

पूछने पर हँसते हुए कहती है ,  

"अरे, मै कहाँ यह सब तो हमारे "वो" ही संभालेंगे । बस मुझे आप लोग जीतवा देना ।…

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Added by kanta roy on January 22, 2015 at 8:00am — 21 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : वात्सल्य (गणेश जी बागी)

च्ची को मोटरसाइकिल पर बैठा छोड़ कस्टमर दुकान के अंदर आया और बोला,

"भाई साहब जरा बिटिया के लिए टॉफी और बिस्किट देना"

अभी मैं बिस्किट निकालने के लिए मुड़ा ही था कि बाहर धड़ाम की आवाज के साथ मोटरसाइकिल गिर गयी और बच्ची भी। कुछ लोगो ने बच्ची को उठाया और उसके हाथ व पैर में लगी चोटों को देखने लगे । इधर कस्टमर भी दौड़ कर बाहर भागा और जल्दी से मोटरसाईकिल उठाया तथा टूटी हुई हेड लाइट को देखते ही चटाक की आवाज ।

बच्ची के गाल पर उँगलियों की छाप व आँखों में…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 21, 2015 at 5:56pm — 38 Comments

विकल नारी आत्मा के स्वर -एक फैंटेसी

 घुप अँधेरे में

रात के सन्नाटे में

मै अकेला बढ़ गया

गंगा के तीर

नदी की कल-कल से

बाते करता

पूरब से आता समीर

न धूल न गर्द

वात का आघात बर्फ सा सर्द

मैंने मन से पूछा –

किस प्रेरणा से तू यहाँ आया ?

क्या किसी अज्ञात संकेत ने बुलाया

अँधेरा इतना कि नाव तक न दिखती

कोई करुणा उस वात में विलखती 

मैं लौटने को था

वहां क्या करता

पवन निर्द्वंद

एक उच्छ्वास सा भरता

तभी मै…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2015 at 4:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल

कर नहीं सकता मैं करतब क्या करूँ

हो गई ताज़ा ग़ज़ल अब क्या करुँ

कोई ना पूछे तो लब ख़ामोश हैं

और जो कोई पूछ ले तब क्या करुँ

तेरी ना अहली पे जब उठठे सवाल

मेरे कहने का है मतलब क्या करुँ

फिर जिहालत का अँधेरा छा गया

तू ही बतलादे मेंरे रब क्या करुँ

अपनी मर्ज़ी से तो जी सकता नहीं

मुझको लिखकर दीजिये कब क्या करुँ

आख़िरत में सुर्ख़रू करना मुझे

लेके इस दुनिया का मनसब क्या…

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Added by Samar kabeer on January 21, 2015 at 2:00pm — 23 Comments

इंसानियत (लघुकथा)

"उतारो कपड़े इसके , देखो किस तरफ का है " , भीड़ चिल्ला रही थी और वो थर थर काँप रहा था | शहर में अचानक दंगा भड़क उठा था और वो भाग रहा था कि किसी तरह अपने घर पहुँच जाए | लेकिन जैसे ही एक मोहल्ले में घुसा , सामने से आ रही भीड़ ने उसे घेर लिया |
अभी वो कपड़ा उतारने ही जा रहा था कि पुलिस की गाड़ी के सायरन की आवाज आई और भीड़ भाग खड़ी हुई | अब वो पुलिस की जीप में बैठा सोच रहा था कि आज वो तो नंगा होने से बच गया , लेकिन इंसानियत नंगी हो गयी |

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मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on January 21, 2015 at 2:00am — 23 Comments

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