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( ग़ज़ल ) कोई ये कहे कैसे , मैं ही था गलत यारों - ( गिरिराज भंडारी )

212  1222     212    1222

क्या हुआ है रातों में, झुरमुटों से पूछो तुम

रो रहीं हवायें क्यूँ , डालियों से पूछो  तुम

 

ग़ायबाना भौंरों  के , फूल  क्यूँ   अधूरे हैं    --  ग़ायबाना - अनुपस्थिति में

सच तुम्हें बतायेंगीं , तितलियों से पूछो तुम

 

क्या हुआ है चंदा को, क्यूँ नज़र नहीं आता

ये चकोर क्या जाने, बदलियों से पूछो तुम

 

कोई ये कहे कैसे , मैं ही था गलत यारों

गोलियाँ चलीं कैसे , घाटियों से पूछो तुम

 

बे सदा  रहें तो क्यों , रिश्ते टूट  जाते हैं

दम ब दम बढ़ीं कैसे , दूरियों से पूछो तुम

 

बे गरज़ हक़ीकत अब , बोल कौन पाता है

तल्ख़ियाँ सहन हों तो , आइनों से पूछो तुम  

 

उम्र मेरी कितनी है , दर्द है कहाँ मुझको

किस तरह यहाँ पहुँचा , सीढ़ियों से पूछो तुम

**************************************** 

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 22, 2015 at 7:37am

आदरणीय कृष्णा सिंग भाई , आप जैसे गज़ल कार ने मेरी गज़ल सराही , बहुत खुशी हुई , आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 22, 2015 at 7:34am

आदरणीया राजेश जी , आपकी प्रशंसा ने ग़ज़ल कहना सार्थक कर दिया । आपकी सराहना के लिये हार्दिक आभार ।

Comment by Krishnasingh Pela on January 21, 2015 at 10:55pm
"कोई ये कहे कैसे मैं ही था ग़लत यारो" क्या बात ! और ये तरन्नुम भी आनंददायक है । बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाइ क़बूल करें आ. गिरिराज जी !

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 21, 2015 at 11:21am

बे गरज़ हक़ीकत अब , बोल कौन पाता है

तल्ख़ियाँ सहन हों तो , आइनों से पूछो तुम  

 

उम्र मेरी कितनी है , दर्द है कहाँ मुझको

किस तरह यहाँ पहुँचा , सीढ़ियों से पूछो तुम--ये दोनों ही शेर विशेष प्रभाव डालने में सक्षम हैं 

वैसे पूरी ही ग़ज़ल शानदार है दिल से बधाई कबूलें आ० गिरिराज जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 21, 2015 at 10:11am

आदरणीय बाग़ी भाई जी , आपकी उपस्थिति मात्र उत्साह भरने के लिये काफ़ी  है , आपकी सराहना सर माथे पर । आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 21, 2015 at 10:09am

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपकी स्नेहिल सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 21, 2015 at 10:09am

आदरणीय मिथिलेश भाई , होता है , उत्साह मे ये भी हो जाता है , स्वाभाविक है , मुझे अच्छा लगा आपका मेरी रचना से जुड़ाव और आपका उत्साह ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 21, 2015 at 10:06am

आदरणीय विजय भाई , आपकी इनायतों का शुक्रिया ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 20, 2015 at 4:11pm

क्या कहने आदरणीय गिरिराज भाई साहब, प्रस्तुत ग़ज़ल तरन्नुम में पढ़ गया, बहुत बढ़िया, सभी अशआर अच्छे लगें, बहुत बहुत बधाई.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 20, 2015 at 11:52am

अनुज

बहुत बेहतरीन i  बड़ी रवानी है इन शेरो में i सादर i

कृपया ध्यान दे...

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