दुआओं में याद कीजियेगा ,
जब याद कीजियेगा ,
दुआ कीजियेगा।
मिलते हैं तो कहते हैं ,
आपकी सुबह अच्छी हो ,
शाम अच्छी हो ,
रात अच्छी हो,
जितनी बार मिलते हैं , हर बार कहते हैं ।
दिन रहते , विदा होते हैं , तो
आपका दिन अच्छा हो , कहते हैं ।
दुआओं में असर होता है ,
लोग यूँ भी दुआ करते हैं ,
हाथ मिला कर कहते हैं,
सिर को थोड़ा झुका कर कहते हैं ,
मुस्कुरा कर कहते हैं ,
जिसे जानते हैं , उस से कहते हैं ,
नहीं जानते , उस से भी…
Added by Dr. Vijai Shanker on January 18, 2015 at 11:30am — 14 Comments
“अरे क्या हुआ ये भीड़ कैसी है, कोई मर गया है क्या ?”
“हाँ यार वो साहब का नौकर, अरे वही यार जो साहब के घर के सारे काम करता था, झाड़ू - पोछा, चूल्हा-चौका ,बर्तन माँजने से लेकर सब्जी-भाजी लाने तक....जिसे साहब गाँव से लेकर आये थे, कहते थे चपरासी रखवा दूंगा डिपार्टमेंट में !”
“ओह वो गूंगा, वो तो बड़ा ही भला था और ठीक-ठाक भी, कैसे मरा ?”
“दोस्त, सब कह रहें हैं आत्महत्या कर ली, पर यार तू बताना मत किसी को, मेमसाहब की चेन चोरी हो गयी थी, कल रात पुलिस भी आई थी, बहुत मारा उसे, पर वह…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on January 18, 2015 at 1:57am — 20 Comments
२१२२ २१२२
घिर गया है मर्द यारा !
कौन है हमदर्द यारा !!
लोग आते बात करते !
दे गये सरदर्द यारा !!
आज गुस्से में है बीवी !
दे दिया है दर्द यारा !!
यार अब तो बात करना !
मत दिखाना फर्द यारा !! (फर्द -सूची )
वो परेशां है बहुत अब !
उसको देना कर्द यारा !!
मत खड़े हो सब यहाँ पर !
लो गिरी है गर्द यारा !!
लो रजाई साथ में भी !
रात होती सर्द यारा…
ContinueAdded by Alok Mittal on January 17, 2015 at 2:00pm — 7 Comments
Added by Rahul Dangi Panchal on January 16, 2015 at 10:26pm — 26 Comments
ग़ज़ल
2122 2122 2122 212
याद करे दुनिया तुझे ऐसी निशानी छोड़ जा,
जोश भर दे जो सभी में वो जवानी छोड़ जा।
नाम पर तेरे कभी कोई उदासी हो नहीं,
प्यार से भरपूर कुछ यादें सुहानी छोड़ जा।
देश की खातिर लुटाओ जान अपनी शान से,
हर किसी की आँख में दो बूँद पानी छोड़ जा।
हो भरोसा हर किसी को तेरी बातों पर सदा,
देश हित की प्रेरणा दे वो बयानी छोड़ जा।
मौत आतीे है सभी को देख ‘‘मेठानी’’ यहां,
गर्व हो अपनाें को कुछ ऐसी…
Added by Dayaram Methani on January 16, 2015 at 9:55am — 16 Comments
" मिल गया चैन तुमको , हो गयी तसल्ली " , उसके पिता खुद को संभाल नहीं पा रहे थे | " कितनी बार मना किया था कि उसे वहां मत भेजो , अब खो दिया न उसको "| बेटी की असमय मौत ने उनको तोड़ दिया था |
टूट तो मैं भी गयी थी लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि बेटी को उसकी मर्ज़ी की जगह नौकरी करने की वकालत करके मैंने कौन सा गुनाह कर दिया था | उसकी कही बात जेहन में घूम रही थी " जाना तो एक दिन सब को है माँ , तो क्यों न निडर होके अपने तरीके से जिया जाए | अपना आसमाँ खुद ढूंढा जाए "| बेहद मुश्किल था अब लेकिन…
Added by विनय कुमार on January 16, 2015 at 1:00am — 12 Comments
अखण्ड आर्यावर्त की, उमंग वंदे मातरम् !
सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!
बुद्ध-कृष्ण-राम की, पुनीत –भूमि पावनी !
सुहार्द सम्पदा अनन्त, श्ष्यता संवारती !
सतार्थ धर्मं युद्ध में, सशक्त श्याम सारथी !
परार्थ में दधीचि ने, स्वदेह भी बिसार दी !!
निनाद कर रही उभंग, बंग वंदे मातरम् !
सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!
धर्मं-जाति-वेश में, जरूर हम अनेक हैं !
परम्परा अनेक और बोलियाँ अनेक हैं…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on January 16, 2015 at 12:30am — 20 Comments
बेटियाँ
बेटियों की ज़मीन को सींचो
उग रही पौध को नहीं खींचो
ये हमारे समाज की जड हैं,
इन जडों के शरीर मत भींचो।
मौलिक व अप्रकाशित
Added by सूबे सिंह सुजान on January 15, 2015 at 11:12pm — 4 Comments
कोई पत्थर और कोई आईने ले के
आ रहा हर एक अपने दायरे ले के
यूँ चले हो रात को दीपक बुझे ले के
खुद अँधेरा भी परेशाँ है इसे ले के
बस ठिठुरते रह गए दरवाजे बाहर ख्वाब
ये सुबह आई है कितने रतजगे ले के
जिंदगानी तंग गलियां भी न दे पाई
मौत हाजिर हो गई है हाइवे ले के
आपका आना तो कल ही सुर्ख़ियों में था
आज फिर अख़बार आया हादसे ले के
साकिया यूँ बेरुखी से मार मत हमको
रिन्द जायेगा कहाँ ये प्यास ले ले के
कुछ न कुछ…
Added by भुवन निस्तेज on January 15, 2015 at 7:30pm — 16 Comments
1222 1222 1222 1222
पहन रख पैरहन, उरियानियाँ अच्छी नहीं लगतीं
कि बद को भी, कभी बदनामियाँ अच्छी नहीं लगतीं
फसादी हो अगर, तो बोलियाँ अच्छी नहीं लगतीं
वहीं बेवक़्त की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं
खुला आकाश हो सबका ,परों मे ताब हो सबके
कफस अंदर की ये आज़ादियाँ, अच्छी नहीं लगतीं
भरम रख़्ख़ें वे मौसम का , कहे कोई उन्हें जा कर
कभी बे वक़्त छाई बदलियाँ, अच्छी नहीं लगतीं
चला आया है जुगनू…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on January 15, 2015 at 5:30pm — 23 Comments
ग़म मौत के ......(.एक रचना )
ग़म मौत के कहाँ जिन्दगी भर साथ चलते हैं
चराग़ भी कुछ देर ही किसी के लिए जलते हैं
इतने अपनों में कोई अपना नज़र नहीं आता
अब तो रिश्ते स्वार्थ की कड़वाहट में पलते हैं
दोस्ती राहों की अब राह में ही दम तोड़ देती है
अब किसी के लिए कहाँ दर्द आंसुओं में ढलते हैं
मिट जाते हैं गीली रेत पे मुहब्बत भरे निशाँ
फिर भी क्यूँ लोग गीली रेत पे साथ चलते हैं
सच को छुपा कर लोग…
Added by Sushil Sarna on January 15, 2015 at 4:10pm — 10 Comments
सचमुच,कुछ बदला है क्या?
हाँ ...
बदली हैं सरकारें, लेकर लुभावने वादे,
खाऊँगा न खाने दूंगा,
साफ़ करूंगा, साफ़ रखूंगा,
मेक इन इण्डिया
मेड इन इण्डिया
‘सायनिंग इण्डिया’ का नया…
ContinueAdded by JAWAHAR LAL SINGH on January 15, 2015 at 10:39am — 17 Comments
हुई क्यों दूर दिल से मैं मिले फुरसत बता देना
बनाना इक कहानी तुम मुझे फिर वो सुना देना
बनी दुल्हन चली आई सजन मैं साथ में तेरे
करोगे प्यार मुझको तुम यही अरमान थे मेरे
मगर टूटे सभी अरमा जला दिल मैं दिखाऊँ क्या
नजर के पास रह कर भी बढी दूरी बताऊँ क्या
न आना पास अब मेरे सभी सपने जला देना
बनाना इक कहानी तुम मुझे फिर वो सुना देना
हुई क्यों दूर दिल से तुम मिले फुरसत बता देना
मिला है तन तुझे मेरा नहीं क्यों मन लिया तुमने
कभी भी प्यार के इक…
Added by Akhand Gahmari on January 15, 2015 at 10:29am — 8 Comments
नहीं राजी हुआ कोई ,मेरा किरदार करने को
बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को
..
कोई सोये कहीं भूख़ा ,ज़लाये मुल्क़ भी कोई
इन्हें बस वोट लेने हैं, मज़े सरक़ार करने को
..
कोई मौजूद था मेरा ,मेरे दुश्मन की महफ़िल में
रची साजि़श उसी ने थी, मुझे गद्दार करने को
..
तुम्हारे इक इशारे पर , मेरी ये ज़ान जानीं है
मग़र ज़िन्दा जो रक़्खा हैं,गुनाह स्वीकार करने को
..
चली आयी तसव्वुर में , तेरी तस्वीर धुँधली सी
मेरी ये जान बाक़ी है ,फ़क़त दीदार…
Added by umesh katara on January 15, 2015 at 8:58am — 18 Comments
मेरा जीवन पी गया, तेरी कैसी प्यास । |
पनघट से पूछे नदी, क्यों तोड़ा विश्वास ।१। |
|
मन में तम सा छा गया, रात करे फिर शोर। |
दिनकर जो अपना नहीं, क्या संध्या क्या भोर ।२।… |
Added by मिथिलेश वामनकर on January 14, 2015 at 10:30pm — 33 Comments
Added by विनोद खनगवाल on January 14, 2015 at 9:33pm — 7 Comments
212 212 22
ज़िन्दगी अपनी छोटी है
बस जरा सी ये खोटी है
हादसों को बुरा मत कह
यार मेरा लंगोटी है
चाँद कहते महल वाले
झोपड़ी कहती रोटी है
इस सियासत की चौपड़ में
स्वार्थ की फैली गोटी है
झूठ की सत्य की देखो /p>
हो गई बोटी बोटी है
मौलिक व अप्रकाशित
गुमनाम पिथौरागगढ़ी
Added by gumnaam pithoragarhi on January 14, 2015 at 6:30pm — 10 Comments
दादीसा के भजनों जैसी मीठी दुनिया
पहले जैसी कहाँ रही अब अच्छी दुनिया
प्यार मुहब्बत , भाईचारे ,मानवता की
नहीं समझती बातें सीधी सादी ,दुनिया
दिन सी उजली रातें भी हो जाये यारों
अँधियारे में रहे भला क्यूं आधी दुनिया
घर से ऑफिस ऑफिस से घर फिर कुछ ग़ज़लें
सिमट गई है इतने में ही मेरी दुनिया
नटखट बच्चे घर की खटपट मेरी बाँहें
कितनी छोटी सी है यारों उसकी दुनिया
शहरों में है झूठे दर्पण…
ContinueAdded by khursheed khairadi on January 14, 2015 at 1:26pm — 13 Comments
आपसी ताप से जलती टहनियाँ
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आँधियों की छोड़िये
हवा थोड़ी भी तेज़ बहे, स्वाभाविक गति से
टहनियाँ रगड़ खाने लगतीं हैं
एक ही वृक्ष की
आपस में ही
पत्तियाँ और फूल न चाहते हुये भी
कुसमय झड़ जाने के लिये मजबूर हो जाते हैं
टहननियों की अपनी समझ है ,
परिभाषायें हैं खुशियों की ,
गमों की
फूल और पत्तियाँ असहाय
जड़ें हैरान हैं , परेशान हैं
वो जड़ें ,
जिन्होनें सब टहनियों के लिये…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on January 14, 2015 at 1:16pm — 17 Comments
कुछ माह पहले
पैरों में लिपटते थे सांप
कीचड में सनते थे
पैर और वाहन
पसीने से चुभते थे वपुष में कांटे
धुप में झुलसी जाती थी देह
कुछ माह पहले
नभ से बरसता था
थका-थका मेह
पुरवा से ऐठती थी ठाकुर की देह
क्वार की धूप में हांफता था बैल
कुछ माह पहले
हवा में नमी थी
चलता न वात
पंखा हांकने से सूखता न गात
बरगद के नीचे भी ठंढी…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 14, 2015 at 12:05pm — 13 Comments
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