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लघुकथा " घात"

"घात"



"" अरे तु चल मेरे साथ दो हाथ जमा उंगा तो सब कबूल देगा कमीना। रात दिन भैया ,भैया करता रहा और हमसे ही इतनी बड़ी गद्दारी। "" मोहन जैसे आगबबूला हुए जा रहा था।

""नहीं ,नहीं एकदम से कैसे कहेगें ,हमारे पास कोई सबूत गवाह भी तो नहीं है। "" रीमा ने रुआंसी आवाज में कहा !



"अरे क्या सबूत क्या गवाह तुझे विश्वास है ना ये उसी ने किया है तो फिर । "" अरे पुलिस के चार डण्डे पडेगें ना तो सब कबूल लेगा। अरे तुम्हारी सारी कमाई ले गया ! ""

" पुलिस नहीं नहीं पुलिस को मत कहो ! यदि… Continue

Added by babita choubey shakti on July 30, 2015 at 6:49am — 3 Comments

ग़ज़ल :- "ग़ालिब" से माज़रत के साथ

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



इस तरफ़ भूल कर नहीं आती

ये ख़ुशी मेरे घर नहीं आती



आप रूठे हुए हैं जिस दिन से

"कोई उम्मीद बर नहीं आती"



बच निकलने की,ज़िन्दगी तुझसे

"कोई सूरत नज़र नहीं आती"



"मौत का एक दिन मुअय्यन है"

वक़्त से पैशतर नहीं आती



दिन में सोते हैं और पूछते हैं ?

"नींद क्यूँ रात भर नहीं आती"



देख लेती थी जो पस-ए-दीवार

वो नज़र,अब नज़र नहीं आती



"काबा किस मुंह से जाओगे",बोलो

शर्म तुमको "समर"… Continue

Added by Samar kabeer on July 29, 2015 at 9:38pm — 10 Comments

ये ज़िंदगी ....

ये ज़िंदगी ....

ज़िंदगी हर कदम पर रंग बदलती है

कभी लहरों सी मचलती है

कभी गीली रेत पे चलती है

कभी उसके दामन में

कहकहों का शोर होता है

कभी निगाहों से बरसात होती है

संग मौसम के

फ़िज़ाएं भी रंग बदलती हैं

कभी सुख की हवाएँ चलती हैं

कभी हवाएँ दुःख में आहें भरती हैं

बड़ी अजीब है ज़िंदगी की हकीकत

जितना समझते हैं

उतनी उलझती जाती है

अन्ततः थक कर

स्वयं को शून्यता में विलीन कर देती है

न जाने कब

ज़हन में यादों का…

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Added by Sushil Sarna on July 29, 2015 at 8:10pm — 2 Comments

ताज़ा ग़ज़ल : टूट के कर गया आशियां दर ब दर

बह्र  212 212 212 212

टूट के  कर गया आशियां दर ब दर

घूमते फिर रहे हम यहां दर ब दर

 

आ गये  लौट कर अक्‍ल वाले सभी    

पर जुनूं में हुए लामकां दर ब दर

 

कमसिनी छोड़कर अब महकने लगे 

जख्‍म मेरे हुए बेकरां दर ब दर

 

खाल में भेड़ की भेडि़ये घुस गये

मर गये मेमने बकरियां दर ब दर

 

हो सकी क्‍या हमें खुद हमारी सनद

फिर रहा आदमी बेनिशां दर ब दर

हम कहां से चले थे कहां आ गये

कर…

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Added by Ravi Shukla on July 29, 2015 at 6:00pm — 10 Comments

दुनियादारी निभा रहा हूं! (कविता)

आंखों में आंसू हैं, और गीत ख़ुशी के गा रहा हूं!

कुछ नहीं यारों, मैं तो बस दुनियादारी निभा रहा हूं!!

कुछ अपनों ने लूटा हमको,

कुछ गैरों ने सताया..

मौका मिला जिसे भी, उसने

जी-भर हमें रुलाया..

सबपे किया भरोसा, उसकी क़ीमत चुका रहा हूं!

नित सांझ ढले यादों की,

बारात जब आती है..

भर रहे ज़ख्मों को,

फिर से कुरेद जाती है..

मैं दिल के घाव पे तो, मरहम लगा रहा हूं!

उजड़ गया वो…

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Added by जयनित कुमार मेहता on July 29, 2015 at 12:47pm — 3 Comments

गोलियों के बाद

खौफ् कॆ बारुद्

फिज़ा मॆं उड गयॆ

नक़ाब् के चह्ररॆ

श्हर् मॆं मिल् गयॆ

गॊलियॊ कि अवाज़्

कुछ् ऐसॆ बिखर् गयी

दॆखते ही देखते धर्रती

कि सुरत् बदल् गयी

कि कॊइ रॊता भी नही

कॊइ मुस्कुरता भी नही

कॊइ सॊता भी नही

कॊइ जागता भी नही

कॊइ चलता भी नहीं

कॊइ रुक्तता भी नही

कॊइ हारता भी नही

कॊइ हराता भी नही

कॊइ सहमता भी नही

कॊइ शर्रमाता भी नही

कॊइ खॊता भी नही

कॊइ पाता भी नही

कॊई आता भी नही

कॊई जाता भी… Continue

Added by S.S Dipu on July 29, 2015 at 9:20am — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मज़बूत बुनियाद - (लघुकथा) - मिथिलेश वामनकर

“मम्मा मेरे लिए ब्रेकफास्ट में केवल फ्रूट सलाद बनाना.”

“आज फ्रूट्स नहीं है... कुछ और बना दूं ?”

“नहीं” - परी ने मना कर दिया क्योकिं पार्टी में हैवी डाईट के कारण ब्रेकफास्ट लाईट करना चाहती थी. तभी बेडरूम से पापा बाहर आये. अपनी इकलौती बेटी को देर रात से घर आने के लिए समझाते रहें और मॉर्निंग-वाक के लिए निकल गए.

“मम्मा... ये पापा सुबह-सुबह चालू हो जाते है, ये करो, ये मत करो.... ये लेट नाईट पार्टीज हमारा कल्चर नहीं है. ब्ला ब्ला ब्ला.......”

“तुम्हारी केयर करते है पापा, इसलिए…

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Added by मिथिलेश वामनकर on July 29, 2015 at 2:58am — 23 Comments

खिजाँ आयी है किस्मत में बहारों का भी दम निकले ( इस्लाही ग़ज़ल )

खिजाँ आयी है किस्मत में बहारों का भी दम निकले,

जहाँ ढूँढू मैं अरमां को , वहां अरमां भी कम निकले |



हजारों गम मेरे दिल में न मुझको राख ये कर दें ,

कहीं इन सुर्ख आँखों से नदी बन के न हम निकले |



तुम्हें लिख-लिख के ख़त अक्सर कभी मैं भूल जाता था,

पुराने ख़त दराजों से जो निकले आज, नम निकले |



किसी की जुस्तजू करके कि खुद को खो चुका हूँ मैं,

उधर से बेरुखी उनकी इधर दुनिया से हम निकले |



जगह छोड़ी है जख्मों ने कहाँ अब 'हर्ष' सीने में,…

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Added by Harash Mahajan on July 28, 2015 at 7:00pm — 4 Comments

एक ग़ज़ल - सुधिजनो द्वारा परिमार्जन हेतु

खूब सूरत है नज़ारे क्‍या करें

गुरबतों के लोग मारे क्‍या करें

 

सो गए फुटपाथ पर जोखिम मगर

नींद जो उनको पुकारे क्‍या करें

 

साल मे इक माह मिलती छुट्टियां

चॉंद को गर ना निहारे क्‍या…

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Added by Ravi Shukla on July 28, 2015 at 5:30pm — 9 Comments

आशा का लाभ (लघुकथा)

बर्न वार्ड के बाहर भैंसे  पर सवार यमराज खड़े थे 

" प्रभु क्या सोच रहे हैं ? जल्दी प्राण हरिये और चलिए I आप तो मेरे ऊपर सवार घंटे भर से उस स्त्री को देखे जा रहे हैं,मेरी पीठ की दशा का भी कुछ ध्यान है ?"

"इस पुरुष ने अपनी पत्नी को जलाने का प्रयास किया और स्वयं जल गया I और ये स्त्री ,अपने सारे गहने बेच कर इसका इलाज करवा रही है, देखो कैसे बदहवास बाहर खड़ी रोये जा रही है Iमैं सोच रहा हूँ पुत्र ..............."

"कि इसके प्राण छोड़ दूं .,यही ना प्रभु ?और ये पुरुष ठीक होकर फिर से…

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Added by pratibha pande on July 28, 2015 at 9:30am — 22 Comments

"श्रद्धा" - लघुकथा

"अमर! गाडी पंडितजी के घर के आगे लगाकर जरा उन्हे तनिक बाहर बुला लाओ।" सेठ जी ने अपने ड्राईवर को आज्ञा दी।......

कुछ ही क्षण बाद अमर के पीछे पंडितजी बाहर आते नजर आये। "सेठजी राधे राधे। मैं गीता पाठ कर रहा था आप के आने की बात सुन पाठ छोड़ चला आया, कहिये कैसे याद किया आपने?"

"राधे राधे पंडितजी।" सेठजी मुस्कराने लगे। "कुछ खास नही, आप के लिये कुछ वस्त्र लिये थे सोचा गुजरते हुये देता चलूँ।"

पंडितजी से 'आयुष्मान भव:' का आशिर्वाद पा सेठजी की गाडी आगे चल पड़ी। अमर 'बैक मिरर' में सेठजी…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on July 28, 2015 at 8:00am — 13 Comments

श्रद्धांजलि

आधुनिक भारत के भगवान चले गए।
इस देश के असली स्वाभिमान चले गए।।

धर्म को अकेला छोड़ विज्ञान चले गए।
एक साथ गीता और कुरान चले गए।।

मानवता के एकल प्रतिष्ठान चले गए।
धर्मनिरपेक्षता के मूल संविधान चले गए।।

इस सदी के श्रेष्ठ ऋषि महान चले गए।
कलयुग के इकलौते इंसान चले गए।।

ज्ञान राशि के अमित निधान चले गए।।
सबके प्यारे अब्दुल कलाम चले गए।।

=============================
मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 27, 2015 at 10:30pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक पहाड़ी स्त्री का दर्द

एक पहाड़ी स्त्री का दर्द

 

मेरे और उनके बीच

एक पारदर्शी दीवार खड़ी है.

वे हँसती, ठिठोली करती

कभी बुरांश की लाली को छेड़ती

चाय के बागानों में उछलती कूदती

मुझे बुलाती हैं –

मैं पारदर्शी दीवार के इस पार

छटपटाकर रह जाती हूँ.

जब काले-सफेद बादलों के हुजूम

आसमान से उतरते, वादियों से चढ़ते

उन्हें घेर लेते,

वे ओझल हो जाती हैं और,

मैं प्यासी, बोझिल ह्र्दय ले

पारदर्शी दीवार के इस पार

छटपटाकर रह जाती…

Continue

Added by sharadindu mukerji on July 27, 2015 at 9:30pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
छन के रौजन से आती हुई रौशनी

212 212 212 212

छन के रौजन से आती हुई रौशनी

ख़्वाब के कण उड़ाती हुई रौशनी

 

तीरगी से गुज़रती हुई फ़र्श पर

डर के पैकर बनाती हुई रौशनी

 

मैं किसी के तसव्वुर में खोया था और

आई दिल को जलाती हुई रौशनी

 

रात भर का जगा ग़म से बेज़ार दिल

और मुझको सताती हुई रौशनी

 

इस तग़ाफ़ुल से नाशाद हो मुझसे वो

रुठ के दूर जाती हुई रौशनी

-मौलिक व अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on July 27, 2015 at 9:01pm — 6 Comments

गजल

दर्द होता अब नया है
मर्ज तू ही,तू दवा है।
बात तेरी पुरशकूं बस,
और सारी तो हवा है।
बादलों से माँगकर,लो
बेखुदी मन दे गया है।
ओढ़ ले या ले पहन तू
वक्त तेरा हो गया है।
मेघमाला सी बरस तू
खेत धानी रो रहा है।
देख तेरा ही जगाया,
अब सपन भी सो गया है।
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on July 27, 2015 at 12:30pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दर्द ...(लघुकथा “राज”)

“ये देखो विज्ञान आज कितनी तरक्की कर रहा है कितनी अद्दभुत मशीन बना डाली, पुरुष भी महसूस करके देख सकते हैं अब प्रसव वेदना को|" टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में हेडिंग Chinese men get a taste of labor pain with a machine को पढ़ते हुए प्रोफ़ेसर बक्शी अपनी पत्नी से अचानक बोल उठे

”पापा क्या कभी कोई ऐसी मशीन भी बन पाएगी जो रेप के दर्द को भी पुरुष महसूस कर सकें” थोड़ी दूरी पर बैठी बेटी के अचानक इस प्रश्न ने पापा को अन्दर तक झिंझोड़ कर रख दिया बेटी के सिर पर…

Continue

Added by rajesh kumari on July 27, 2015 at 10:00am — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल--पागल! वहाँ से दूर रख (मिथिलेश वामनकर)

2122 / 2122 / 2122 / 212     (इस्लाही ग़ज़ल)

 

बेबसी को याख़ुदा मुझ नातवाँ से दूर रख        

या तो ऐसा कर मुझे मुश्किल जहाँ से दूर रख

 

उस परीवश को घड़ी भर आज जाँ से…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on July 26, 2015 at 11:58pm — 37 Comments

ग़ज़ल :- वाक़ई,ये ज़िन्दगी जंजाल है

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन



क्या कहूँ तुमसे,ये मेरा हाल है

ख़ाली तर्कश,हाथ में इक ढाल है



रिश्तेदारों का ये इक जम्मे ग़फ़ीर

वाक़ई, ये ज़िन्दगी जंजाल है



क्यूँ रहे,इतनी ख़बर भी आप को

क्या महीना,कौन सा ये साल है



लग गई है उसको बीमारी अजीब

पास दौलत है मगर कंगाल है



न कोई तालीम है,न तरबियत

ये तो बस तहज़ीब का नक़्क़ाल है



जानवर की खाल दे देते हैं बस

और फिर ख़ाली,ये बैतुलमाल है



कुछ का कुछ आने लगा इसमें… Continue

Added by Samar kabeer on July 26, 2015 at 11:34pm — 16 Comments

चुभन ( लघुकथा )

" ये कैसा बकवास प्रोजेक्ट तैयार किया है । छोड़ो , तुमसे न होगा ।अब सुरेखा ही इस प्रोजेक्ट पर काम करेगी । " कहते हुए प्रोजेक्ट की ' हार्ड कॉपी 'अनीता के बॉस ने अपने पास रख ली ।
आज सुरेखा को उस प्रोजेक्ट को प्रजेंट करना था । प्रोजेक्टर पर प्रजेंटेशन चल रहा था , अनीता विस्मित हो मामूली हेर-फेर से अपने ही प्रोजेक्ट पर तालियों की चुभन महसूस कर रही थी ।सहसा उसकी नज़रें बॉस की ओर घूम गईं , जो शरारती अंदाज़ में कह रही थीं , " और झटको मेरा हाथ ।"

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by shashi bansal goyal on July 26, 2015 at 10:31pm — 8 Comments

खुद को रावण सा लिक्खूँगा

मानवता की नए सिरे से

नूतन परिभाषा लिक्खूँगा।

राम कृष्ण सब लिखो स्वयं को।

खुद को रावण सा लिक्खूँगा।।



जब तक जला नहीं लेता मैं

खुद के भीतर की कामुकता।

जब तक खत्म नहीं हो जाती

शक्ति बाहुबल की अभिलाषा।



जब तक मनस नगर में पुष्पित

है अक्षय स्पृहा वाटिका।

तब तक नैतिकता पर कैसे

कहिये अभिभाषण लिक्खूँगा।।

राम कृष्ण सब लिखो स्वयं को।

खुद को रावण सा लिक्खूँगा।।



जब तक इन आँखों में छाये

हुए रहेंगे लोभ के बादल।

जब… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 26, 2015 at 9:52pm — 12 Comments

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