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मुख्य प्रबंधक
ग़ज़ल (गणेश जी बागी)

पाँच बरस तक कुछ न कहेंगे कर लो अपने मन की बाबू ।

बात चलेगी, तो बोलेंगे, अपनी ही थी गलती बाबू ।।

चाँद-चाँदनी, सागर-पर्वत, चाहत कहाँ किसानों की है ?

मुमकिन हो तो इनके हिस्से लिख दो थोड़ी बदली बाबू ।।

खाली थाली, खाली तसला, टूटा छप्पर, चूल्हा गीला,

रोजी-रोटी बन्द पड़ी जब, क्या करना जन-धन की बाबू ।।

जो काशी बन जाए क्योटो, या दिल्ली हो जाए लंदन ।

प्यासा जन बस जल पा जाये, गाँव लगे शंघाई बाबू ।।

अच्छे-दिन, काले-धन की…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 22, 2018 at 3:30pm — 17 Comments

ग़ज़ल(2122 1212 22)

मुंतजिर हूँ मैं इक जमाने से।
आ जा मिलने किसी बहाने से।।

उनकी गलियों से जब भी गुजरा हूँ।
ज़ख़्म उभरे हैं कुछ पुराने से।।

दिल की बातें ज़ुबां पे आने दो।
कह दो! मिलता है क्या छुपाने से।।

मेरे घर भी कभी तो आया कर।
ज़िन्दा हो जाता तेरे आने से।।

इश्क़ की आग राम है ऐसी।
ये तो बुझती नहीं बुझाने से।।

मौलिक/अप्रकाशित

राम शिरोमणि पाठक

Added by ram shiromani pathak on May 21, 2018 at 11:30pm — 8 Comments

कितने रोगों से बच जाते

जब कागज के ये रुपये

सुन्दर सिक्कों में ढल जाते

तब सचमुच अच्छा होता

कितने रोगों से बच जाते



कम से कम गंदे नोटों को

हमें नहीं छूना पड़ता

जिनमें गुटखा पीक लगा हो

और हिसाब लिखा चुभता



तभी पुराने महाराजे

सुन्दर सिक्के गढ़वाते थे

जो भी हो , गंदे सिक्के

पानी  से तो धुल जाते थे

सिक्कों की प्राचीन प्रथा

सचमुच में कितनी अच्छी थी

स्वस्थ रहे जनता अपनी

यह सुभग भावना सच्ची…

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Added by Usha Awasthi on May 21, 2018 at 7:30pm — 2 Comments

स्मृति ...

स्मृति ...

ज़िंदगी
जब
ढलान पर होती है
उसके अंतस में
बुझे अलाव होते हैं
एक शाश्वत डर की आहट होती है
कुछ अनसुलझे सवाल होते हैं
कुछ अधूरे जवाब होते हैं

ज़िंदगी
धीरे -धीरे
बिना पड़ाव के पथ पर
अग्रसर होती है
आँखों में ओस होती है
प्रभात और साँझ एक हो जाते हैं
आहट यथार्थ हो जाती है
और एक श्वास
अंतिम हो जाती है
ज़िंदगी
स्मृति हो जाती है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 21, 2018 at 5:45pm — 1 Comment

बुद्धिजीवी कौन? (लघुकथा)

"कहते हैं साहित्यकारों, लेखकों, खिलाड़ियों, वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का कोई धर्म या मज़हब नहीं होता!" युवा दोस्तों के समूह में से एक ने कहा।



"शिक्षकों, छात्रों, और राजनेताओं का भी तो क़ायदे से कोई धर्म या मज़हब नहीं होता!" दूसरे दोस्त ने अपना किताबी ज्ञान झाड़ा।



"अबे, तो क्या ड्राइवरों, पुलिस, सैनिकों और वकील-जजों का भी कोई धर्म या मज़हब नहीं होता?" तीसरे साथी ने झुंझलाकर कहा।



"हां कहा तो यही जाता है कि किसी भी तरह के कलाकारों का भी इसी तरह न कोई धर्म होता…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 21, 2018 at 2:34pm — No Comments

ग़ज़ल --- इक फ़रिश्ता है मेहरबाँ मुझ पर / दिनेश कुमार / ( इस्लाह हेतु )

2122---1212---22

.

जो भी सोचूँ, उसी पे निर्भर है

मेरी दुनिया तो मेरे भीतर है

.

इक फ़रिश्ता है मेहरबाँ मुझ पर

स्वर्ग से ख़ूब-तर मेरा घर है

.

जिसमें जज़्बा है काम करने का

कामयाबी उसे मयस्सर है

.

जीत कैसे मिली, है बेमानी

जो भी जीता, वही सिकन्दर है

.

कोई क़तरा भी भीक में माँगे

और हासिल किसी को सागर है

.

ज़ह्र-आलूदा इन हवाओं में

साँस लेना भी कितना दूभर है

.

हाँ, ये जादूगरी है लफ़्ज़ों की

( हाँ,…

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Added by दिनेश कुमार on May 21, 2018 at 10:00am — 7 Comments

ग़ुलामी बहुआयामी (अतुकान्त कविता)

डिजिटल ग़ुलामी है बहुआयामी

शारीरिक नुमाइश हुई बहुआयामी

हैरत है, कहें किसको नामी और नाकामी

अनपढ़, ग़रीब, शिक्षित या असामी।

योग ग़ज़ब के हो रहे वैश्वीकरण में

मकड़जाले छाते रहे सशक्तिकरण में

छाले पड़े आहारनलिकाओं में

ताले संस्कृति और संस्कारों में

अधोगति, पतन सतत् रहे बहुआयामी

हैरत है, कहें किसमें खामी और नाकामी

अनपढ़, ग़रीब, शिक्षित या असामी।

शिक्षा, भिक्षा, रक्षा सभी बहुआयामी

लेन-देन, करता-धरता, कर्ज़दाता भी…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 20, 2018 at 9:00pm — 4 Comments

ख़ास ये कैसी गुज़ारी जिंदगी



2122 2122 212

आँख   मुद्दत   से  चुराती   जिंदगी ।

लग  रही थोड़ी  ख़फ़ा सी जिंदगी ।।

तोड़ती  अक्सर  हमारी  ख्वाहिशें ।

हो  गयी  कितनी सियासी जिंदगी ।।

सिर्फ मतलब पर किया सज़दा उसे ।

जी   रहे   हम  बेनमाज़ी  जिंदगी ।।

रोटियों के फेर में कुछ इस तरह ।

मुद्दतों तक तिलमिलाई जिंदगी ।।

हम जमीं  पर  पैर पड़ते  रो  पड़े ।

दे…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 20, 2018 at 8:28pm — 1 Comment

ग़ज़ल --- मैं अपने काम अगर वक़्त पर नहीं करता / दिनेश कुमार / इस्लाह हेतु.

1212--1122--1212--22

.

मैं अपने काम अगर वक़्त पर नहीं करता

तो कामयाबी का पर्वत भी सर नहीं करता

.

हसीन ख़्वाब अगर दिल में घर नहीं करता

तवील रात से मैं दर-गुज़र नहीं करता

.

हरेक मोड़ पे ख़ुशियों तो कम हैं,दर्द बहुत

कहानी वो मेरी क्यों मुख़्तसर नहीं करता

..

सिखा दिया है मुझे ग़म ने ज़िन्दगी का हुनर

किसी भी हाल, मैं अब आँख तर नहीं करता

.

मैं अपने अज़्म की पतवार साथ रखता हूँ

मेरे सफ़ीने पे तूफ़ाँ असर नहीं करता

.

ग़ुरूर साथ…

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Added by दिनेश कुमार on May 20, 2018 at 6:00pm — 3 Comments

पश्चाताप (लघुकथा)



"अपने पुत्र को समझाओ गांधारी। वासुदेव कृष्ण की माँग सर्वथा उचित है। 'पांडवो के लिये पाँच गाँव!' भला इससे कम और क्या हो सकता है?’’

"नहीं आर्यपुत्र, अब वह समझाने की सीमा में नहीं रहा। पानी सिर से ऊपर बहने लगा है।" गांधारी की आवाज सदैव की भांति स्थिर थी। 'मैंने आप से अनगिनित बार उसे समझाने के लिये कहा लेकिन आप के 'पुत्र-मोह' ने उसे कभी समझाना ही नहीं चाहा। परिणामतः हम जहां आ चुके है, वहां से लौटना संभव नहीँ।"

........... युद्ध की कालिमा छंट चुकी थी लेकिन सभी पुत्रों को खो चुके…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 20, 2018 at 5:17pm — 5 Comments

बोलती निगाहें (लघुकथा)

"बिटिया, कितनी बार कहा है कि अॉनलाइन शॉपिंग वग़ैरह के अॉफरों और प्रलोभनों में अपना समय और पैसा यूं मत ख़र्च करो!" अशासकीय शिक्षक ने अपनी कमाऊ शादी योग्य बेटी से कहा ही था कि उनकी पत्नी बीच में टपकीं और बोलीं- "तुम अपने काम से काम रखो। बिटिया तुम से ज़्यादा कमा कर अपने दम पर अपना दहेज़ जोड़ रही है और पैसे भी! ... और रिश्ता भी!"

"आप लोग यूं परेशान न हों! ...मम्मी तुम्हें पापा से इस तरह नहीं बोलना चाहिए। मुझे पता है प्राइवेट नौकरी में क्या-क्या और कैसे सब कर पाते हैं!" बिटिया ने…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 20, 2018 at 6:31am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शज़र जब सूख जाता है कोई पत्ता नहीं रहता (तरही ग़ज़ल 'राज')

1222  1222  1222  1222

 मुख़ालिफ़ होअगर मौसम तो कुछ अच्छा नहीं रहता 

बदलते वक्त में कोई कभी अपना नहीं रहता 





कोई इंसान रिश्तों के बिना जिंदा नहीं रहता 

मुहब्बत के बिना पक्का कोई रिश्ता नहीं रहता





बुजुर्गों को दुखी करने से पहले सोच ये लेना 

शज़र जब सूख जाता है कोई पत्ता नहीं रहता 





जहाँ पर मुफलिसी बच्चों से बचपन छीन लेती है 

किसी बच्चे के दिल में भी वहाँ बच्चा नहीं रहता 





ज़रूरत ज़िस्म की जिनको मशीनों सा बना…

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Added by rajesh kumari on May 19, 2018 at 10:46pm — 15 Comments

याद आऊं तो निशानी देखना

2122 2122 212

छेड़ कर उसकी कहानी देखना ।

फिर तबाही आंसुओं की देखना ।।

यूँ ग़ज़ल लिक्खी बहुत उनके लिए ।

लिख रहा हूँ अब रुबाई देखना ।।

अब नुमाइश बन्द कर दो हुस्न की ।

हैं कई शातिर शिकारी देखना ।।

हिज्र ने हंसकर कहा मुझसे यही ।

वस्ल की तुम बेकरारी देखना ।।

वह बहक जाएगा इतना मान लो ।

एक दिन फिर जग हँसाई देखना ।।

तिश्नगी झुक कर बुझा देती है वो ।

बा…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 19, 2018 at 10:30pm — 3 Comments

नंगापन (लघुकथा)

स्कूल की छत और कुछ दरख़्तों पर कुछ बंदर अपनी शैली में आनंद ले रहे थे। कक्षा में छात्रों ने उनके 'उत्पात' देखने हेतु आगे पढ़ने से मना कर दिया। दरअसल मॉरल साइंस (नैतिक शिक्षा) के शिक्षक इत्तेफ़ाकन गांधी जी के 'तीन बंदरों' की प्रतीकात्मकता की व्याख्या करते हुए 'सादा जीवन उच्च विचार' के बारे में उन्हें समझा रहे थे!



"ये मज़बूर और परेशान बंदर हैं! किसी तलाश में राह भटक गये हैं!" अपनी बत्तीसी निपोरते एक बंदर की ओर इशारा करते हुए शिक्षक ने कहा।



"नहीं, सर! ये हमारी तरह…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 19, 2018 at 7:02pm — 3 Comments

ग़ज़ल (दोस्तों वक़्त के रहबर का तमाशा देखो)

(फाइला तुन _फ इलातुन _फ इ ला तुन _फेलुन)

दोस्तों वक़्त के रहबर का तमाशा देखो |

कोई तकलीफ में, खुश कोई है फिरक़ा देखो |

कोई पत्थर की तरह आपकी ठोकर में है

मेरे महबूब ज़रा गौर से कूचा देखो |

आपको करना है दीदार गरीबी का अगर

जाके फुट पाथ का रातों में नज़ारा देखो |

हर किसी शख्स के हाथों में नहीं यूँ पत्थर

फ़िर कोई आ गया कूचे में दिवाना देखो |

गिडगिडाने से कभी हक़ नहीं मिल पाएगा

कर के तब्दील ज़रा…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 19, 2018 at 10:30am — 8 Comments

ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)

लाज माँ बाप की बचा भाई.
हो सके तो कमा के खा भाई.

सौ में नम्बर मैं सौ भी ले लूँगा.
नौकरी है कहाँ बता भाई.

खून का रंग एक है लेकिन.
राज जातों में बाँटता भाई.

नूर भी आफ़ताब से लेता.
चाँद में रोशनी कहाँ भाई.

आज 'हिन्दोस्तान' को देखो.
दीखता है खफा खफा भाई.
(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on May 18, 2018 at 4:27pm — 4 Comments

लेकिन कज़ा के बाद से मक़तल उदास है

221 2121 1221 212



आया सँवर के चाँद चमन में उजास है ।

बारिश ख़ुशी की हो गयी भीगा लिबास है ।।

कसिए न आप तंज यहां सच के नाम पर ।

लहजा बता रहा है कि दिल में खटास है ।।

मिलता नशे में चूर वो कंगाल आदमी ।

शायद खुदा ही जाम से भरता गिलास है ।।

उल्फत में हो गए हैं फ़ना मत कहें हुजूर ।

जिन्दा अभी तो आपका होशो हवास है ।

पीकर तमाम रिन्द मिले तिश्नगी के साथ ।

साकी तेरी शराब में कुछ बात…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 17, 2018 at 11:24pm — 2 Comments

दोहे(विविधा)

मुझे देख उनको लगा,हुआ मुझे उन्माद।।

नयनों से वाचन किया,अधरों से अनुवाद।।1

अभी पुराने खत पढ़े,वही सवाल जवाब।

देख देख हँसता रहा,सूखा हुआ गुलाब।।2

मन को दुर्बल क्यों करें,क्षणिक दीन अवसाद।

आगे देखो है खड़ा,आशा का आह्लाद।।3

विविध रंग से हो भरा,भावों के अनुरूप।।

स्नेह इसी अनुपात में ,मैं प्यासा तुम कूप।।4

करुणा प्यार दुलार औ,इक प्यारी सी थाप।

माँ ही पूजा साथ में,है मन्त्रों का जाप।।5

स्वाभिमान को…

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Added by ram shiromani pathak on May 17, 2018 at 3:01pm — 2 Comments

ज़रा से रूठ जाने पर ...

ज़रा से रूठ जाने पर ...





अजब

मिज़ाज है

नादाँ दिल का

तोड़ देता है

हर रस्म

उनके

ज़रा से रूठ जाने पर



जो लम्हे

मेरी हयात

बन कर आये थे

तारीकियों में

रूठ गए

हयात-ए-शरर के

ज़रा से रूठ जाने पर



क्या ख़बर

बाद मेरे फ़ना होने के

क्या गुजरी होगी

ख्वाब-ए-माहताब पर

यक़ीनन

मैंने ही नहीं

उनके लम्हों ने भी

पायी होगी सज़ा

ज़ार ज़ार रोने की

तन्हाईयों में

ख़ुद के ही

ज़रा से रूठ… Continue

Added by Sushil Sarna on May 17, 2018 at 1:01pm — No Comments

टेली फोन के कारनामें [कविता] [विश्व संचार दिवस पर ]

मुंह अँधेरे ही भजन की जगह,फोन की घंटी घनघना उठी,

घंटी सुन फुर्ती आ गई,नही तो,उठाने वाले की शामत आ गई,

ड्राईंग रूम की शोभा बढाने वाला,कचड़े का सामान बन गया,

जरूरत अगर हैं इसकी,तो बदले में  कार्डलेस रख गया,

उठते ही चार्जिंग पर लगाते,तत्पश्चात मात-पिता को पानी पिलाते,…

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Added by babitagupta on May 17, 2018 at 12:00pm — No Comments

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