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जब ये तपन दूर हो जाये |

दहक  रहा हर कोना कोना   ,  सूरज बना आग का गोला |
मुश्किल  हुआ निकलना घर से ,  लू ने आकर धावा बोला |
तर बदन होता पसीने से   ,  बिजली  बिना तरसता   टोला  |
बाहर कोई कैसे जाये    , विकट   तपन  ने जबड़ा  खोला |
 
पशु पक्षी ब्याकुल गरमी से , जान बचाते हैं   छाया में |
चले राही लाचार होकर    ,  आग लगी है  जब काया में  |
तेज तपन लाये  लाचारी , पवन थमा  जलती  माया में |
दहक  बढ़ाया है  बीमारी ,  गिरे पड़े लू की साया में   |
 
गरमी  घोर  तांडव मचायी , कोई   इससे बचना चाहे  |
हर तरफ   बेचैनी सताये   , सूने सड़क और चौराहे | 
झुलस रहें हैं खेत बाग वन , तेज अगन  से भरते आहें | 
चेहरे को जला देती   हैं ,  लू की  गर्म थपेड़ी  बाहें | 
 
हर मौसम है  प्यारा लेकिन , गरमी तो दिन रात सताये  |
जगह ढूढता  कोई शीतल  , बैठ कर लेते कहीं  छाये  | 
जल्दी से अब बारिश आये , हर कोई बस  यहीं मनाये |
वर्मा कब ये गरमी जाये , जब ये  तपन  दूर हो जाये  | 
श्याम नारायण वर्मा 
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Shyam Narain Verma on May 29, 2018 at 12:38pm
रचना पर आपकी उत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से धन्यवाद .सादर
Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on May 29, 2018 at 8:37am

आदरणीय श्यामनारायण जी प्रचण्ड ग्रीष्म का  यथार्थचित्रण मनमोहक है दिली बधाई स्वीकार करें

कृपया ध्यान दे...

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