For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

नियति का अंत

प्लास्टर उतरी दीवारें खुद को अश्लील पोस्टरों में लपेटे कमरे में गुड़ी - मुड़ी पड़ी देह को खामोशी से देख रहीं थीं। दीवारों की सीलन सिसकियों के शोर के साथ गहरी होती जा रही थी।
" ओहो, तो तुम कौन सा पहली बार ऐसा होते देख रही हो! इतने सालों में न जाने कितनी ही बार तुमने ये सब देखा है", बन्द दरवाजे ने रुआंसी होती दीवारों को देखकर कहा। " पहले तो कभी तुम लोगों को ऐसा परेशान होते नही देखा!"
" चुप कर ! जन्म से यही दुनिया तो देखी थी, लगता था यही नियति होती है। मगर रात में सिसकती मजबूरियों ने जब हमसे लिपट- लिपट कर अपनी कहानी सुनाई तब सच का पता चला।", भूरी दीवार ने दरवाजे को डपटते हुए कहा।
" आज इस बेचारी की बदनसीबी इसे हमारे पास ले आई है। हाय, अभी बच्ची ही तो है ये , कल अपने सीने से गुड़िया को चिपका कर बैठी मुझे कितनी ही देर तक देखती रही थी।", बिस्तर के सामने वाली दीवार ने दर्द से भरी आवाज में कहा।
" आपा, मेरा जी भी दुखता है जब इन मजबूरियों के लुटेरों का पहरेदार बना कर मुझे खड़ा कर दिया जाता है, मगर चुपचाप देखते रहने के सिवा हम कुछ नही कर सकते ", दरवाजे ने अपने तेवर ढीले करते हुए सिर झुका लिया।
तभी बाहर से आती कुछ जोड़ी पदचापों को सुनकर सभी चुप हो गए।
" इसे तैयार करो, आज इसकी नथ उतराई होगी," दरवाजे के पल्लों को परे धकेलते हुए एक रौबदार महिला की आवाज सुनकर उस लड़की ने अपना सिर उठा कर देखा। अचानक चीते सी फुर्ती दिखाते हुए लड़की बाहर की तरफ भागी।
" पकड़ो इसे", महिला जोर से चिल्लाई मगर तभी छत ने बिना किसी चेतावनी के अपनी शहतीर उस महिला पर गिरा दी।
ये देखकर दरवाजा भी जोश में आ गया और पल्ले हिला हिलाकर कमरे से बाहर जाने वाले लोगों को रोकने की कोशिश करने लगा। इससे पहले कि और लोग उस लड़की को पकड़ने भागते नींव के पत्थरों ने अपने पैर समेटने शुरू कर दिए। कोठे की सभी दीवारें गिर रही थीं।" चलो, कम से कम एक ज़िन्दगी तो इस नरक से बची", धराशाही होने के पहले भूरी दीवार ने सड़क पर भागती लड़की को देख संतुष्टि से कहा।
मेघा राठी
मौलिक स्वरचित

Views: 65

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by vijay nikore on May 28, 2018 at 12:21pm

लघु कथा अच्छी लिखी है। हार्दिक बधाई।

Comment by Mahendra Kumar on May 28, 2018 at 11:01am

उम्दा लघुकथा है आदरणीया मेघा राठी जी. हार्दिक बधाई प्रेषित है. सादर.

Comment by TEJ VEER SINGH on May 26, 2018 at 12:29pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मेघा जी। लाज़वाब लघुकथा।

Comment by Neelam Upadhyaya on May 24, 2018 at 3:51pm

आदरणीय मेघा राठी जी, नमस्कार।  प्रतीकात्मक और हृदयस्पर्शी रचना।  प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई।

Comment by babitagupta on May 24, 2018 at 1:49pm

आदरणीया दी,संकेतात्मक शैली में लडकी के बचाव में आई सभी निर्जीव वस्तुओं का दर्शाना ,यह संदेश प्रेषित करता हैं की सहयोग और समुकिकता से बढ़ते अपराधों को रोका जा सकता हैं,प्रस्तुत रचना के लिए ढेर सारी बधाइयां स्वीकार करे.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 24, 2018 at 1:27am

बहुत परिश्रम से तैयार की गई बढ़िया प्रतीकात्मक/मानवेत्तर शैली की लघुकथा के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरमा मेघा राठी जी। थोड़ा और समय देकर कहीं-कहीं स्पष्टता बढ़ाई जा सकती है। कोठे की सभी निर्जीव चीज़ों को प्रतीक व मानवीकरण द्वारा बढ़िया रचना।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post कविता--कश्मीर अभी ज़िंदा है भाग-1
"सियासी चहरे बदलते रहते हैं । छप्पन इंच का सीना भी हिजड़ा नज़र आ रहा है और कश्मीर ख़ून में नहा रहा है…"
4 hours ago
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post तुम्हारे स्पर्श से....
"आदरणीय कबीर जी नमस्कार, आपकी शिर्कत के लिए बेहद शुक्रिया...., आपको कविता पसंद  आयी ...लिखना…"
4 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on Neelam Upadhyaya's blog post पापा तुम्हारी याद में
"वाह। गागर में यथार्थ का सागर! हार्दिक बधाई और आभार आदरणीया नीलम उपाध्याय जी"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Mohammed Arif's blog post कविता--कश्मीर अभी ज़िंदा है भाग-1
"पर सियासद कितने दिन जिंदा रहने देगी कश्मीर को ?  कश्मीर के दर्द को उकेरने के लिए आभार और बधाई…"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on gumnaam pithoragarhi's blog post ग़ज़ल .....
"बहुत खूब..."
5 hours ago
Samar kabeer commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (न मुँह को फेर के यूं आप जाएं ईद के दिन)
"जी,बहतर है ।"
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (न मुँह को फेर के यूं आप जाएं ईद के दिन)
"आ. भाई तस्दीक अहमद जी, ईद के मौके पर बेहतरीन गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
6 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani posted a blog post

मुफ़्त की ऑक्सीजन (लघुकथा)

"नहीं कमली! हम नहीं जायेंगे वहां!" इकलौती बिटिया केमहानगरीय जीवन के दीदार कर लौटी बीवी से उसकी बदली…See More
7 hours ago
Neelam Upadhyaya posted a blog post

पापा तुम्हारी याद में

जीवन की पतंग पापा थे डोरउड़ान हरदम आकाश की ओर पापा सूरज की किरणप्यार का सागर दुःख के हर कोने मेंखड़ा…See More
8 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan posted blog posts
8 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post पतझड़ -  लघुकथा –
"हार्दिक आभार आदरणीय समर क़बीर साहब जी।आदाब।आपको ईद मुबारक़।"
10 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (न मुँह को फेर के यूं आप जाएं ईद के दिन)
"मुहतरम जनाब समर साहिब आदाब  , ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया |…"
12 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service