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मुंतजिर हूँ मैं इक जमाने से।
आ जा मिलने किसी बहाने से।।

उनकी गलियों से जब भी गुजरा हूँ।
ज़ख़्म उभरे हैं कुछ पुराने से।।

दिल की बातें ज़ुबां पे आने दो।
कह दो! मिलता है क्या छुपाने से।।

मेरे घर भी कभी तो आया कर।
ज़िन्दा हो जाता तेरे आने से।।

इश्क़ की आग राम है ऐसी।
ये तो बुझती नहीं बुझाने से।।

मौलिक/अप्रकाशित

राम शिरोमणि पाठक

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Comment by vijay nikore on May 28, 2018 at 12:18pm

इस अच्छी गज़ल के लिए बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 23, 2018 at 7:15pm

हार्दिक बधाई , आदरणीय..

Comment by ram shiromani pathak on May 23, 2018 at 1:13pm

नीलेश भाई बहुत बहुत आभार अपकल

Comment by ram shiromani pathak on May 23, 2018 at 1:12pm

आरिफ़ भाई  उत्साह वर्धन हेतु आभार आपका

Comment by ram shiromani pathak on May 23, 2018 at 8:19am

ग़ज़ल।।

मुंतजिर हूँ मैं इक जमाने से।
मिलने आ जा किसी बहाने से।। आ जा मिलने भी ठीक लग रहा है मुझे

उनकी गलियों से जब भी गुजरा हूँ।
ज़ख़्म उभरे हैं कुछ पुराने से।।

दिल की बातें ज़ुबां पे आने दो।
कह दो! मिलता है क्या छुपाने से।।

मेरे घर भी कभी तो आया कर।
साँसे आती है तेरे आने से।।मैं जी उठता हुुु तेरे आने से

इश्क़ की आग राम है ऐसी।
ये तो बुझती नहीं बुझाने से।।

बहुत बहुत आभार आदरणीया सुझाव व अनुमोदन हेतु।।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2018 at 8:13pm

आ. राम शिरोमणि जी,
ग़ज़ल के लिए बधाई... और थोडा वक़्त दीजिये ..कई मिसरे और निखरेंगे 
सादर 

Comment by Mohammed Arif on May 22, 2018 at 6:52pm
आदरणीय राम शिरोमणि जी आदाब,
बहुत ही रोमाण्टिक अंदाज़ की ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें । जमाने/ज़माने देखिएगा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आदरणीया राजेश कुमारी जी की इस्लाह का संज्ञान लें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 22, 2018 at 6:05pm

अच्छी ग़ज़ल कही है बधाई आपको राम भैया 

जहाँ कहीं सुधार चाहती है उसकी कोशिश कर  रही हूँ 

मुंतजिर हूँ मैं इक जमाने से।
आ जा मिलने किसी बहाने से।।------मिलने आजा किसी बहाने से 

मेरे घर भी कभी तो आया कर।
ज़िन्दा हो जाता तेरे आने से।।-----इसमें बार बार मात्रा गिराने से ली गड़बड़ है 

मिलती/आती  साँसे तेरे ही आने से 

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