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समय की लाठियां (लघुकथा)

पार्क की ओर जाते हुए उन दोनों बुज़ुर्ग दोस्तों के दरमियाँ चल रही बातचीत और उनके हाथों में लहरा सी रही लाठियां नये दिवस की भोर के पूर्व, उनके अनुभव की लाठियां साबित हो रहीं थीं।


"... 'सही नीयत और सही तरक़्क़ी'! यह दावा करते हैं आजकल के दोगले नेता अपने मुल्क की ज़मीनी हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ करते हुए!" उनमें से एक ने कुछ झुंझलाते हुए कहा।


"... 'शाही नीयत और शाही तरक़्क़ी' है दरअसल! हम तो यही कहते हैं, यही देखते हैं हर तरफ़ और यही तो सुनते हैं!" दूसरे साथी बुज़ुर्ग ने व्यंग्यात्मक लहज़े में कहते हुए अपनी लाठी पार्क की नज़दीक़ी बस्तियों की ओर घुमाते हुए कहा।


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 31, 2018 at 9:26pm

टिप्पणियों के लिए पुनः हार्दिक आभार आदरणीय महेंद्र कुमार जी।

Comment by Mahendra Kumar on May 31, 2018 at 10:46am

शंका निवारण हेतु बहुत-बहुत आभार आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी. सादर.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 30, 2018 at 1:46am

"लहराती सी लाठियां"  से दरअसल यहाँ  ' झूमती लाठियां' है। प्रायः हाथों में ली इन लाठियों का जानवर भगाने के अलावा कोई उपयोग नहीं होता, केवल हाथों मेंं 'झूमती सी' रहती हैं। बहुआयामी मतलब देने हेतु ऐसा शीर्षक दिया था। सुझाव हेतु सादर हार्दिक धन्यवाद आदरणीय महेंद्र कुमार जी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 30, 2018 at 1:41am

मेरी इस रचना के अवलोकन, अनुमोदन और प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद और आभार आदरणीय महेंद्र कुमार जी और आदरणीया बबीता गुप्ता जी।

Comment by Mahendra Kumar on May 28, 2018 at 10:33am

सही कहा आपने, मुँह पर "सही नीयत और सही तरक़्क़ी" और दिल में "शाही नीयत और शाही तरक़्क़ी". यही है आजकल की राजनीति का चेहरा. इस बढ़िया लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय शेख़ शहजाद उस्मानी जी. 

1. //लहरा सी रही लाठियां// क्या लाठियां सच में नहीं लहरा रही हैं? यदि 'हाँ' तो कोई कोई बात नहीं, पर यदि 'नहीं' तो इसे "लहराती लाठियां" अथवा "लहरा रही लाठियां" होना चाहिए. 

2. शीर्षक पर पुनर्विचार निवेदित है.

सादर.

Comment by babitagupta on May 27, 2018 at 8:35pm

लघु  कथा का माध्यम से लाठी के दबदबे का सही कटाक्ष किया हैं,प्रस्तुत रचना पर बधाई .

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