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जिंदा है आदमी यहाँ उम्मीदों के सहारे

जिंदा है आदमी यहाँ  उम्मीदों के सहारे

मझधार फंसी कश्ती भी लगती है किनारे

देखे नहीं गए हैं  कभी मुझसे दोस्तों

यारों की आँखों बहते हुए अश्कों के धारे

पागल भी, शराबी भी, दीवाना…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on June 6, 2013 at 12:27pm — 11 Comments

ग़ज़ल// कोई मौसम नहीँ होता!

किसी की याद आने का,कोई मौसम नहीँ होता,

अश्क फुरकत मेँ बहाने का,कोई मौसम नहीँ होता!



कौन जाने कब वफा से,बेवफा हो जाये को

फ़रेब इश्क मेँ खाने का,कोई मौसम नहीँ होता!

राहे उल्फ़त मेँ देखा है,हमने आसियां बनाकर,

दिल पे चोट खाने का,कोई मौसम नहीँ होता!

उम्र भर का निभाई साथ कोई,यह ज़रुरी तो नहीँ,

पल मेँ बिछड़ जाने का,कोई मौसम नहीँ होता!

अजनबी सी राहोँ मेँ हमसफर मिल जाते…

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Added by Abid ali mansoori on June 6, 2013 at 11:30am — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
विवाह की इकतीसवीं वर्षगाँठ :

 

सपना-अरुण निगम

(मदिरा सवैया = भगण X7+गुरु)

 

ब्याह हुये  इकतीस सुहावन  साल भये नहिं भान हुआ…

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Added by अरुण कुमार निगम on June 6, 2013 at 9:30am — 16 Comments

ओ बी ओ आभार

छपती नहिं कविता कभी, करे ताक कवि-ताक

कविता-संग्रह पर ग्रहण, अवसर-ग्रहण तपाक ।…

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Added by रविकर on June 6, 2013 at 8:30am — 8 Comments

हरी भरी धरती

हरी भरी धरती मन मोहती है ,

चहुं ओर फैली हरियाली मोहती है ,

मुसकुराते खिले कुसुम मोहते हैं,

झूमते पेड़ पौधे मन मोहते है ।

 

अद्भुत है धरती का सौंदर्य ,

कल कल करती नदिया बहती ,

चम चम करते पोखर तालाब ,

अद्भुत अनुपम धरा है दिखती।

 

किन्तु .....................

ऐ! धरती पुत्र आज तो ,

धरती माँ न ऐसी दिखती है,

टप टप गिरते आँसू बस रोती है,

मेरा श्रंगार करो बस ये ही कहती है।

 

किन्तु आज…

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Added by annapurna bajpai on June 6, 2013 at 8:00am — 18 Comments

ऐ दोस्त ! खुशतरीन वो मंज़र कहाँ गए

दोस्तो, एक और ग़ज़ल जो होते होते मुकम्मल हुई है, आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूँ जैसी लगे वैसे नवाजें   ....



ऐ दोस्त ! खुशतरीन वो मंज़र कहाँ गए

हाथों में फूल हैं तो वो पत्थर कहाँ गए



डरता हूँ मुझसे आज के बच्चे न पूछ लें

तितली कहाँ गईं हैं, कबूतर कहाँ गए…



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Added by वीनस केसरी on June 6, 2013 at 12:30am — 34 Comments

मेहनत |

हार जीत का खेल अजब है , यारों निराश ना होना |
मेहनत से कभी  ना डरना ,  देखो  साहस ना खोना | 
बिना पसीना खेती ना हो ,  फिर बदले मौसम का रोना | 
बिना पसीना खेती ना हो , …
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Added by Shyam Narain Verma on June 5, 2013 at 6:01pm — 5 Comments

अब तो कर दो बंद, लोगो प्रकृति का दोहन

दोहन करते प्रकृति का, बड़े बड़े विद्वान्

चला चला बस योजना, बनते खूब महान

बनते खूब महान , हरे जंगल कटवाते

दूषित कर परिवेश, कारखाने बनवाते

धरा बचाने आज, नहीं आने मनमोहन

अब तो कर दो बंद, लोगो प्रकृति का दोहन

 

संदीप पटेल “दीप”  

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 5:55pm — 13 Comments

मेरा ख्याल

बारिशो के 

मौसम में 
मन जब 
चाहे किसी के 
साथ दूर तक 
ठहल आने को …
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Added by दिव्या on June 5, 2013 at 5:00pm — 24 Comments

इनसे नाता जोड़



परिचय करते वक्त ही,  पहले पूछे नाम

परिचय सुद्रड़ हो तभी, करे बात की काम॥ 



परिचय देवे पेड़ का, बच्चे को बतलाय,

इनके क्या क्या नाम है,अच्छे से समझाय 

 

कन्द मूल खाकर रहे, वन में सीता राम,

चौदह वर्षों तक किया,…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 5, 2013 at 4:30pm — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
वो खुदाया पास मेरे आ रही है (ग़ज़ल)

बहर --रमल मुसद्दस सालिम 

2122   2122   2122

 

उम्र जितनी तेज़ बढती जा रही है 

वो खुदाया पास मेरे आ  रही है 

 

राह में किस मोड़ पर हो जाए मिलना  

जिन्दगी ये सोचती सी  जा रही है 

 

क्या किसी तूफ़ान का संकेत है ये 

रेत  में बुलबुल नहा कर  जा रही है

 

जानते हैं  भाग्य अपना पीत  पत्ते

फ़स्ल देखो पतझड़ों की आ रही है  

 

खुल गयीं  हैं जुल्फ उसकी आज शायद 

वादियों…

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Added by rajesh kumari on June 5, 2013 at 3:30pm — 33 Comments

प्रगति के महल

आओ ज़रा शहर निहारें

चमचमाती सड़कों पर

चमचमाती कारें

ऊँचे ऊँचे दीप्ति खंभ

अँधेरे को पीते

बड़े बड़े लट्टू

रग रग में संचरित होता दंभ



सुन्दर बाग़

ये महल अटारी

मशीन भारी भारी

और कुछ बड़ी बीमारी



सब तन रहा है

गाँव गाँव

अब शहर जो बन रहा है

बढ़ रहा है

धीरे धीरे

अटारी पर अटारी

तानी जा रही हैं

जो प्रगति की निशानी 

मानी जा रही है 



बेशुध हुआ सा आदम

भागा जा रहा है

अरमानों के…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 1:00pm — 6 Comments

"दर्श तुम्हारा"



साथी!

जिस राह पे चलकर तुम जाते

वह राह मनचली

क्यों मुड़ के लौट नही आती ...



ये बैरन संध्या

हो जाये बंध्या

न लगन करे चंदा से

न जन्में शिशु तारे

बस यहीं ठहर जाये



ये शाम मुंहजली

जो मुड़ के लौट नही पाती ...



श्वासों के तार

ताने पल पल

न टूट  जायें

ये अगले पल

ले जाओ दरस  हमारा

दे जाओ दरस तुम्हारा

यह लिखती पत्र पठाती



यह राह मनचली

जो मुड़ के…

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Added by वेदिका on June 5, 2013 at 11:00am — 25 Comments

पर्यावरण दिवस पर विशेष

(मत्तगयन्द सवैया छन्द ७ भगण २ गुरु)

सोच विचार करें अब भोग प्रसार कुनीति नहीं घटती हैं
मानव में पशु वास हुआ लख स्वार्थ प्रवृत्ति नहीं नटती हैं
वृक्ष चिरें वह वृक्ष नहीं नित भूमि भुजा सुन लो फटती हैं
गाय कटें वह गाय नहीं प्रिय नित्य यहाँ बस माँ कटती हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ


सर्वथा मौलिक सर्वथा अप्रकाशित

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 5, 2013 at 10:36am — 11 Comments

बिन तेरे//आबिद अली मंसूरी

कितने तल्ख हैँ लम्हे
तेरे प्यार के वगैर
यह ग़म की आंधियां
यह तीरगी के साये
जैसे कोई ख़लिश
हो हवाओँ मेँ..
डसती हैँ मुझको पल-पल
पुरवाइयां
तेरी यादोँ की
बे रंग सी लगती है
ज़िंदगी अब तो
कुछ भी तो नहीँ जैसे
इन फिज़ाओँ मेँ...बिन तेरे!

(मौलिक व अप्रकाशित)

__आबिद अली मंसूरी

Added by Abid ali mansoori on June 5, 2013 at 9:54am — 17 Comments

गज़ल - "परवाज़"

भले ही आज जीवन में, तेरे कायम अँधेरा है

इसी दुनिया में ही लेकिन, कहीं रौशन सवेरा है



मै इक ऐसा परिंदा हूँ, नही सीमाएं है जिसकी

मेरी परवाज़ की खातिर, ये दुनिया एक घेरा है



कभी हिंदू कभी मुस्लिम. रहे हैं हारते हरदम

सियासत खेल ऐसा है, न तेरा है न मेरा है



कुतरते ही रहे है देश को, हरदम जहाँ नेता

इसे संसद न कहियेगा, ये चूहों का बसेरा है



न जलती है न मरती है, महज़ कपड़े बदलती है

“ऋषी” इस रूह की खातिर, ये जीवन एक डेरा है …

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Added by Anurag Singh "rishi" on June 5, 2013 at 7:30am — 13 Comments

विश्व पर्यावरण दिवस और हम

विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून: क्या हम आप इसमें कहीं शामिल हैं? इस वर्ष खाद्यान्न की झूठन छोड़ने और संरक्षण न करने से होती बर्बादी को रोकने पर दृष्टि है.ध्येय नारा है: सोचो, खाओ, बचाओ. …



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Added by डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा on June 5, 2013 at 6:00am — 9 Comments

इश्क में हो गये है शेर सब

इश्क में हो गये है शेर सब 
शेरनी की गरज पर ढेर सब 

है बनी शायरी अब फुन्तरू 
आम से हो गये है बेर सब 

हां कलम भी कभी हथियार थी 
चुटकुला अब, समय का फेर सब 

जे छपे, वे छपे, हम रह गये 

चाटने में हुई है देर सब 

खो गये मीर, ग़ालिब, मुसहफ़ी 
लिख रहे है खुदी को जेर सब 
~अमितेष 
मौलिक व अप्रकाशित 

फुन्तुरु - मजाक 
मीर - मीर तक़ी 'मीर'

ग़ालिब - असद उल्लाह खां ग़ालिब 
मुसहफ़ी - शैख़ गुलाम हम्दानी मुसहफ़ी 

Added by अमि तेष on June 4, 2013 at 11:19pm — 10 Comments

"प्रकृति क्रीडा "

अडिग खड़ा है

चिर स्थिर

पुष्प से लदा

धरा से आलिंगन करता

तरुवर की निः स्वार्थ सेवा

सम भाव

वाह!

 

सब को देखने दो कुछ क्षण

रजत जड़ी ओस की डाल

चंचल है

हिला देती है बयार

तुम भी आओ मधुप

प्रतीक्षारत है कली

मृदुल होंठो के मकरंद पी लो

 

अरे ! ये क्या ?

मेघ भी उतर रहे हैं

हँसते हुए

शांत सरोवर

सरिता

बूदों संग मिलकर

अद्भुत संगीत सुनायेंगे

 

दादुर की व्याकुलता तो देखो…

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Added by ram shiromani pathak on June 4, 2013 at 10:00pm — 21 Comments

पहली बरसात में! (दोहे -जवाहर)

पुष्प वाटिका बीच मुदित, बाला मन को मोह 

सुमन पंखुरी सुघर मृदुल , श्यामा तन यूँ सोह!

पनघट पर सखिया सभी, करत किलोल ठठाहि ,

छलकत जल से गागरी, यौवन छलकत ताहि!

पुष्प बीच गूंजत अली, झन्न वीणा के तार .

तितली बलखाती चली, कली ज्यों करे श्रृंगार!

पीपल की पत्तियां भली, मधुर समीरण साथ,

देखत लोगन सुघर छवी, हिय हिलोर ले साथ.

पवन चले जब पुरवाई, ले बदरा को साथ 

मन विचलित गोरी भई, आंचल ढंके न माथ…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 4, 2013 at 9:30pm — 11 Comments

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