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जिंदा है आदमी यहाँ उम्मीदों के सहारे

जिंदा है आदमी यहाँ  उम्मीदों के सहारे

मझधार फंसी कश्ती भी लगती है किनारे

देखे नहीं गए हैं  कभी मुझसे दोस्तों

यारों की आँखों बहते हुए अश्कों के धारे

पागल भी, शराबी भी, दीवाना भी कहा है

जिसको लगूँ मैं  जैसा मुझे बैसे पुकारे

नजरें टिकी हुई हैं जमाने की चाँद पर

हम गाफिलों को आज भी प्यारे हैं सितारे

इंसान गर न बोता कभी शूल यहाँ पर

होते नहीं फिर ऐसे यहाँ आज नज़ारे

इंसान ही जब बन गया भगवान् जहाँ का

इंसानों को मुश्किल से यहाँ कौन उबारे ?

नर-नारी बाल-बृद्ध सभी का है एक सवाल

अहसान फरामोशों क्यूँ भला नित नए नारे 

यह रचना मौलिक और अप्रकाशित है”

डॉ आशुतोष मिश्र , निदेशक ,आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश मो० ९८३९१६७८०१

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Comment by अरुन 'अनन्त' on June 8, 2013 at 1:55pm

आदरणीय ओ बो ओ पर आपका हार्दिक स्वागत है, प्रयास हेतु आपको हार्दिक बधाई किन्तु शिल्प और कत्थ कसावट और श्रम की मांग कर रहे हैं, कई जगह बात स्पष्ट नहीं हो पा रही है. इस पंक्ति हेतु विशेष तौर पर बधाई स्वीकारें.

नजरें टिकी हुई हैं जमाने की चाँद पर

हम गाफिलों को आज भी प्यारे हैं सितारे

Comment by Roshni Dhir on June 8, 2013 at 12:40pm

अच्छा लिखा है आपने युही लिखते रहिये 

आभार 

Comment by shalini rastogi on June 7, 2013 at 5:54pm

प्रथम रचना का हार्दिक अभिनन्दन!

Comment by D P Mathur on June 7, 2013 at 5:11pm

इंसान ही जब बन गया भगवान जहाँ का,
इंसानों को मुश्किल से यहाँ कौन उबारे ?
बहुत खुब !!!

Comment by वेदिका on June 7, 2013 at 2:27pm
हकीकत से परिचय करता हुआ गीत ....

जिंदा है आदमी यहाँ  उम्मीदों के सहारे

मझधार फंसी कश्ती भी लगती है किनारे

 
बधाई आपकी प्रथम प्रस्तुती पर ....!
Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 2:21pm

ओबीओ पर आपकी पहली रचना देखकर बहुत खुशी हुई। मेरी बधाई स्वीकार करें।
सादर!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 7, 2013 at 8:55am

सुन्दर भाव अभिव्यक्ति की लिए हार्दिक बधाई डॉ आशुतोष मिश्र जी 

Comment by yogesh shivhare on June 7, 2013 at 7:41am

बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ

Comment by Abid ali mansoori on June 6, 2013 at 6:11pm
आदरणीय डॉ.साहब बधाई!
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 6, 2013 at 5:50pm

इंसान ही जब बन गया भगवान् जहाँ का

इंसानों को मुश्किल से यहाँ कौन उबारे ?

बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ ! बधाई स्वीकारें!

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