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Dr Ashutosh Mishra's Blog (127)

मेरी आँखों में कभी अक्स ये अपना देखो

मेरी आँखों में कभी अक्स ये अपना देखो

इस बहाने ही सही प्यार का सहरा देखो

बेखबर गुल के लवों को छुआ ज्यों भँवरे ने

ले के अंगड़ाई कहा गुल ने ये पहरा देखो

वो नजाकत से मिले फिर उतर गये दिल में

अब कहे दिल की सदा हुस्न का जलवा देखो

मौला पंडित की लकीरों पे यहाँ सब चलते

तुम लकीरों से हटे हो तो ये फतवा देखो

वो भिखारी का भेष धरके बनेगा मालिक

अब सियासत में यूं ही रोज तमाशा देखो

साइकिल हाथ के हाथी के हैं जलवे देखे

अब कमल खिलने…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 27, 2018 at 5:30pm — No Comments

यहाँ जिंदा की है खबर नहीं यहाँ फोटो पे ही वबाल है

11212 11212 11212 11212 

यहाँ जिंदा की है खबर नहीं यहाँ फोटो पे ही वबाल है

जो टंगी कहीं थी जमाने से खड़ा अब उसी पे सवाल है

 

कई जानवर रहे घूमते बिना फिक्र के बिना खौफ के

हुए क़त्ल जब कोई समझा था बड़े काम वाली ये खाल है

 

कई हुक्मरान हुए  यहाँ सभी आँखे बंद किये रहे

कोई खोल बैठा जो आँख है सभी कह उठे ये तो चाल है

 

ये सियासतों का समुद्र है यहाँ मछलियों सी हैं कुर्सियां

सभी हुक्मरान सधी नजर सभी ने बिछाया जाल…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 4, 2018 at 6:00pm — 10 Comments

आप वादे बड़े  खूब करते रहे

२१२ २१२  २१२  २१२

हम तो बस आपकी राह चलते रहे

ये ख़बर ही न थी आप छलते रहे

बादलों से निकल चाँद ने ये कहा

भीड़ में तारों की हम तो जलते रहे

हिम पिघलती हिमालय पे ज्यों धूप  में

यूँ हसीं प्यार पाकर पिघलते रहे

चांदनी भाती , आशिक हूँ मैं चाँद का 

सच कहूं तो दिए मुझको  खलते रहे

जुल्फ की छांव में उनके जानो पे सर

याद करके वो मंजर मचलते रहे

एक दूजे को हम ऐसे देखा किये

अश्क आँखों से…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 2, 2018 at 2:30pm — 14 Comments

बदला परिवेश

“सर, दरवाजा खोलिए” प्रोफेसर राघव की शोध छात्रा नूर ने दरवाजे पर दस्तक देते हुए आवाज दी

“अरे! नूर तुम, दोपहर में अचानक, कैसे?” दरवाजा खोलते हुए प्रोफेसर राघव ने आने की वजह जाननी चाही

“ हाँ सर, एक रिसर्च पेपर में करेक्शन के लिए आई थी”

“ पर अभी तो मैडम घर पर नहीं हैं,और बाज़ार से कब तक लौटें इसका भी अंदाज नहीं है,आखिर तुम कब तक इस धूप में बाहर इंतज़ार करोगी”  प्रोफेसर राघव् ने त्वरित जवाब  दिया

“ बाहर क्यों सर ?” नूर ने कौतूहल से…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on November 26, 2017 at 2:30pm — 11 Comments

जनाजा

“क्या पढ़ रही हो बेटा, लैपटॉप पर इस कदर आखें गडाये?”-साहित्यकार मनमोहन ने अपनी बेटी रूपा से सवाल किया

“कुछ नहीं पापा, साहित्य सेवा मंच पर प्रकाशित रुपेश जी की कहानी पढ़ रही हूँ, लेकिन पापा इस शानदार रचना पर किसी की कोई भी प्रतिक्रिया नहीं है” रूपा ने जवाब देते हुए प्रश्न किया

“शानदार रचना! नहीं बेटा बड़ी कमियाँ हैं इसके लेखन में“

“कमियाँ हैं! कमियां हैं तब तो आपको निश्चित रूप से मंच से जुड़े हर सदस्य को इस पर प्रतिक्रिया करनी चाहिए थी”

“ हाँ, बेटा तुम सही कह रही हो, लेकिन ये… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on November 13, 2017 at 11:41am — 13 Comments

डूबता जहाज

"सारा शहर दिवाली के जश्न में डूबा है और तुम किस सोच में डूबे हो" दिवाली की पूजा ख़त्म होने के बाद राहुल से मुलाकात करने गए उसके मित्र रोहित ने उसकी ओर मुखातिब होते हुए पूंछा।

" कुछ नहीं! दिवाली मनाते हुए तो सालों गुजर गए पर आज न जाने क्यों दिवाली मुझे मेरी पहली मुहब्बत सी लगी"

"वो कैसे"

" अरे!पहली बार मुहब्बत में आँखों को जो कुछ भी भाया था उसके खतरे को भी नाक ने सूँघा था और फिर सारा दर्द दिल को ही हुआ था। और आज आतिशबाजी देखकर नाक खतरे से आगाह कर रही है पर सारा दर्द सारी तकलीफ दिल… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on October 20, 2017 at 11:21am — 11 Comments

हुआ क्या आपको जो आप कहती बढ़ गयी धड़कन

मुझे लगता है दिल जलता ये कैसी है मुझे तड़पन

उसे भी लग रहा कुछ तो हुआ जबसे बढ़ी धड़कन



दिखा है जबसे उसकी आँखों में वीरान इक सहरा

मुझे क्या हो गया जाने कहीं लगता नहीं है मन



गले को घेर बाँहों से बदन करती कमानी वो

मुझे भी दर्द सा रहता मेरा भी टूटता है तन



वो रो लेती पिघल जाता हिमालय जैसा उसका गम

मगर सूरज के जैसे जलता रहता है मेरा तन मन



नजर मिलते ही मुझसे झुकती उसकी पलकें औ गर्दन

ये मंजर देख उठती है काशिस क्यूँ खो गया… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 26, 2017 at 4:30pm — 14 Comments

घरोंदों को जलाया है किसी ने दोस्ती करके

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

घरोंदों को जलाया है किसी ने दोस्ती करके 

चिरागों को बुझाया है किसी ने दोस्ती करके 

सुकूं था जिसके जीवन में जिसे आती थी मीठी नींद 

उसे शब् भर जगाया है किसी ने दोस्ती करके 

जो दुश्मन था जमाने से जो प्यासा था लहू का ही 

उसी को अब बचाया है किसी ने दोस्ती करके 

अँधेरे में मेरा साया हुआ कुछ इस तरह से गुम

ज्यूँ रिश्ता हर भुलाया है किसी ने दोस्ती करके 

फकीरों की तरह जीता, था खुश तन्हाई…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 8, 2017 at 5:27pm — 5 Comments

पूर्वजों की विरासत

हे महान पूर्वजों गर्व करो

हम निखार रहे हैं

वो तमाम सम्पदा

जो सौंपी थी तुमने, हमें बिरासत में...

बहुत घने हो गए थे जंगल

खो जाते थे बेश- कीमती हांथी दांत

गल जाती थी शेर की खाल

हो जाता था सदैव

तुम्हारी सम्पदा का नुक्सान,

सहन नहीं होता था ये हमसे

इसलिए मार दिए हमने हांथी और शेर

काट दिए जंगल,

बना लिए सोफे, बेड, ड्रेसिंग टेबल और मकान,

इनपे बैठे , लेटे अपना चेहरा जब भी संवारते हैं

मकान में सजे हांथी दांत और शेर की खाल ,

पूरी… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 5, 2017 at 11:47am — 2 Comments

खुद आंसू पीते हैं

अहदे नौ में
माएं दूध पिलाती नहीं हैं
गायें भैसें  कसाईयों से बच पाती नहीं हैं
इससे तकलीफ उन्हें नहीं होती है
जो खरीद सकते हैं दूध
सोने की कीमतों पर…
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Added by Dr Ashutosh Mishra on April 22, 2017 at 5:51pm — 10 Comments

दो कवितायें

दो कवितायें

 

दोस्त

जब मेरे पास दोस्त थे

तब दोस्तों के पास कद हद पद नहीं थे

और जब दोस्तों के पास पद हद कद थे

मेरे पास दोस्त नहीं

 

धन 

 जब मेरे पास धन नहीं था

तब समझते थे सब मुझे बदहाल

पर मैं खुश था , बहुत खुश था

और जब मेरे पास है अकूत सम्पति

दुनिया मुझे खुशहाल समझती है

और मैं  तडपता हूँ बिस्तर पर

नींद के सुकून से भरे एक झोंके के…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on April 18, 2017 at 3:10pm — 10 Comments

अपूर्ण रह जाती है मेरी हर रचना -आशुतोष

अपनी जाई

गोद में खिलाई

लाडली सी बिटिया

जो कभी फूल

तो कभी चाँद नजर आती है/

जिसके लिए पिता का पितृत्व

और माँ की ममता

पलकें बिछाते हैं;

किन्तु उसी लाडली के

यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही,

उसके सुखी जीवन की कामना में जब

उसके हमसफ़र की तलाश की जाती है/

तब उसके चाल चलन

उसकी बोली , उसकी शिक्षा

रंग रूप , कद काठी

सब कुछ जांची परखी जाती है .....

किसी की नजर तलाशती है

उसमे काम की क्षमता

कोई ढूंढता है… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on March 4, 2017 at 11:33am — 9 Comments

सूंदर है हर रचना

सुंदर है हर रचना

रवि! बड़े परेशान लग रहे हो -क्या बात है"-रवि के जिगरी दोस्त अनिल ने बड़े ही सहज भाव से पूछा। "कुछ नहीं- बस यूँ ही" प्रत्यूतर में रवि ने कहा।"अरे!कुछ तो होगा ....तभी तो..."अनिल ने रवि ने वास्तविक कारण जानने के उद्देश्य से दुबारा पूंछा।"भाई जी-बस यूँ ही-अपनी नयी रचनाओं को लेकर परेशान था,अथक प्रयास के बाद भी रचनाओ में वो सुंदरता नहीं दिख पा रही है, जो सुंदरता के मानदंडों पर खरी उतर सके"अनिल को अपनी परेशानी से अवगत कराते हुए रवि न जवाब दिया।कुछ देर गंभीरता के साथ सोचने के बाद… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on February 28, 2017 at 11:40am — 12 Comments

आर टी ओ बिभाग की हकीकत

कविता 3

परिवहन बिभाग

एक दिन होकर तैयार

अपनी नयी नवेली कार पर सवार

मैंने बनाया लखनऊ शहर घूमने का बिचार

लाजवन्ती नव् बिवाहिता के हौले हौले हटते घूंघट की तरह

हौले हौले गाड़ी को आगे बढ़ाया

गोमती नगर से ज्यों ही गाड़ी आगे बढ़ाई

पोलिश चौकी नजर आयी

सिपाही से होते ही नजरें चार

सिपाही बोला आईये सरकार

हमने कहा फरमाईये

उसने कहा

आर सी और बीमा के कागज़ दिखाईये

मैंने बड़े आत्म बिश्वास से दिखाए

सिपाही ने जब जांचा तो सही पाये

सिपाही ने… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on February 19, 2017 at 7:38am — 8 Comments

हार में भी जीत-पहला प्रयास लघु कथा

अपने जीवन की पहली लघु कथा लिखने के बाद बार बार

उसे पढ़कर प्रकाशित करने की मनःस्थिति बना ही रहा था तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।" आओ -मित्र ! आओ "दरवाजा खोलते ही मैंने अपने मित्र आलोक से कहा।"आज कौन सी कविता ऑनलाइन प्रकाशित कर रहे हो"आलोक ने हमेशा की तरह पूंछा।"आज मैंने पहली लघु कथा लिखी है उसे ही प्रकाशित करने जा रहा हूँ"कंप्यूटर पर टाइप करते हुए मैंने जबाब दिया।" लेकिन-पहले प्रयास को सीधे प्रकाशित करते तुम्हे अजीब सा नहीं लग रहा है-"रचना के ठीक होने पर मिलने वाली संतोष जनक प्रतिक्रियाओ… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on February 13, 2017 at 3:04pm — 20 Comments

ओजोन की परत में अब छेद खल रहा है- आशुतोष

ओजोन  की परत में अब छेद खल रहा है

धरती झुलस रही है जग सारा जल रहा है

उन्नति के नाम पर हैं ये कारनामे अपने

तालाब पाट घर के हम बुन रहे हैं सपने

खेतों में चौगनी है माना फसल बढ़ी  पर

सब्जी अनाज फल में बिष खा रहे हैं अपने

नूतन प्रयोग अपना खुद हमको छल रहा है

धरती झुलस रही है जग सारा जल रहा है

ये गंदगी का ढेर जो चारो तरफ लगाया

इस गंदगी के ढेर को खुद हमने है बढ़ाया

हम खूब समझते है परिणाम जानते है

पर…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on January 1, 2017 at 3:33pm — 12 Comments

आओ मिलकर चमन सजायें -आशुतोष

नवबर्ष पर हार्दिक शुभकामनाये 

आओ मिलकर चमन सजायें

गीत नए फिर मिलकर गायें

कुमकुम रोली से रंग धरती

दर पर वन्दनवार लगाये

जान दे रहे हैं सरहद पर

आज भारती के जो लाल

उनके सीने हैं फौलादी

उन्हें डराएगा क्या काल

मुल्क पड़ोसी को अब आओ

हम उसकी औकात दिखाएं

आओ मिलकर चमन सजायें

गीत नए फिर मिलकर गायें

अश्क बहाने से होती

तौहीन शेर दिल वीरों की

अश्कों से बलिदान…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on January 1, 2017 at 1:38pm — 8 Comments

अगर बेटे की भाई से अदावत और हो जाती

1222 1222 1222 1222 तरही ग़ज़ल

अगर  बेटे की भाई से अदावत और हो जाती

मेरे अपने ही घर में इक बगावत और हो जाती

 

जहाँ खामोशी से मेरी जसामत और हो जाती

वहीं कुछ कहने से मेरे मुसाफत और हो जाती

  

हिमानी के शिखर पर डाल गलबहियाँ पलक मींचे

युगल प्रेमी यही सोचे क़यामत और हो जाती

 

सुलगती साँसे जलता तन पिला दो मय ये आँखों की

जहाँ सब कुछ हुआ इतनी इनायत और हो जाती

 

 इधर बेटा उधर भाई पिता करते तो क्या करते

अगर…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 28, 2016 at 5:07pm — 8 Comments

आदमी कब व्याधियों से मुक्त होगा रब ही जाने

2122    2122    2122    2122

शोध पेपर इक कहानी ऐसी बनते जा रहे हैं

जिसमे नित नव कल्पना के पंख लगते जा रहे है

सारी दुनिया के रसायन आज  हैराँ सोचकर ये

हम जहाँ जुड़ ही  नहीं सकते थे जुड़ते जा रहे हैं

आदमी कब व्याधियों से मुक्त होगा रब ही जाने

शोध', चूहे -खरहों के पर प्राण हरते जा रहे हैं

मोतियों से दांत दिखला पेस्ट जो करते प्रचारित

नीम की दातून से निज दांत घिसते जा रहे हैं

रोज अखबारों को पढ़कर दे रहे हैं…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on August 14, 2016 at 11:09am — 5 Comments

ज़िंदगी तेरी उदासी का कोई राज भी है

२१२२   ११२२  ११२२  २२/ ११२

ज़िंदगी तेरी उदासी का कोई राज भी है

तेरी आँखों में छुपा ख्वाब कोई आज भी है 

 

पतझड़ों जैसा बिखरता है ये जीवन अपना 

कोपलो जैसे नए सुख का ये आगाज भी है

 

गुनगुना लीजे कोई गीत अगर हों तन्हा 

दिल की धड़कन भी है साँसों का हसीं साज भी है

 

वो खुदा अपने लिखे को ही बदलने के लिए

सबको देता है हुनर अलहदा अंदाज भी है

 

काम करना ही हमारा है इबादत रब की

इस इबादत में छिपा  ज़िंदगी का…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 27, 2016 at 2:30pm — 14 Comments

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