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इजाजत हो तुम्हारी तो चिरागों को बुझा लूँ मैं

नजर अपनी उठा लो तो गिले शिकवे भुला लूँ मैं
मुझे बस एक पल दे दो है क्या दिल में बता लूँ मैं

निगाहें तो मिला लेता मगर ये खौफ है दिल में
कही ऐसा न हो दिल का चमन खुद ही जला लूँ मैं

कभी तो मेरी गलियों से मेरा वो यार गुजरेगा
मेरा भी फ़र्ज़ बनता है गुलों से रह सजा लूँ मैं

तुम्हारे पग जहाँ पड़ते वहीं पर फूल खिल जाते
है हसरत दिल के सहारा में हसीं गुल इक ऊगा लूँ मैं

अगर ओंठों से निकली शै तो हंगामा खड़ा होगा
उन्हें बस हो खबर हर राज आँखों से जता लूँ मैं

तुम्हारे मरमरी तन से निकलता नूर ही काफी
इजाजत हो तुम्हारी तो चिरागों को बुझा लूँ मैं 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Samar kabeer on February 13, 2019 at 4:02pm

जनाब डॉ. आशुतोष मिश्रा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'उन्हें बस हो खबर हर राज आँखों से जता लूँ मैं'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें, 'हर' की जगह "तो" कर लें तो ऐब निकल जायेगा ।

'तुम्हारे मरमरी तन से निकलता नूर ही काफी'

इस मिसरे में 'मरमरी' को "मरमरीं" कर लें ।

कुछ टंकण त्रुटियाँ भी देख लें ।

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