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आओ ज़रा शहर निहारें
चमचमाती सड़कों पर
चमचमाती कारें
ऊँचे ऊँचे दीप्ति खंभ
अँधेरे को पीते
बड़े बड़े लट्टू
रग रग में संचरित होता दंभ

सुन्दर बाग़
ये महल अटारी
मशीन भारी भारी
और कुछ बड़ी बीमारी

सब तन रहा है
गाँव गाँव
अब शहर जो बन रहा है
बढ़ रहा है
धीरे धीरे
अटारी पर अटारी
तानी जा रही हैं

जो प्रगति की निशानी 

मानी जा रही है 

बेशुध हुआ सा आदम
भागा जा रहा है
अरमानों के मकाँ बनाने
प्रगति के ऊँचे शिखर
ऊँचे ऊँचे

बहुत ऊँचे

इनमें है मजबूती बला की
जिनकी नींव में दफ़न है

हरे भरे जंगल
खेत खलिहान
चिड़ियों की चहक
मिटटी की महक
और गाँव का दाना पानी
खून पसीना
संभ्यता संस्कृति
की निशानी 

ये नींव की ईंटें 

जिन पर खड़े होते हैं 

प्रगति के महल

जो रौंद देते हैं 

पिछड़ेपन की सारी निशानियाँ 

मैं भी अरमान सजाता हूँ 

और खडा करना चाहता हूँ 

प्रगति के महल 

किन्तु 

ये ईंटें लगा पाने का

साहस नहीं है मुझ में 

मैं देखता हूँ 

इन्हें अल्हड 

लहलाहते 

चहचहाते 

अपनी धुन मैं 

और लौट आता हूँ 

अपने पिछड़ेपन के साथ 

लिए इन सुनहरी

ईंटों की कुछ यादें

जिनमें धुंधला सा दीखता है

एक नक्शा , अधूरा सा  

प्रगति के महल  का 

धत्त तेरी की 

हम पिछड़े लोग 

प्रगति के दुश्मन 

संदीप पटेल “दीप”

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on June 7, 2013 at 2:49pm

रचना का विषय अच्‍छा एवं बड़ा ही लोकप्रिय है जिसमें संवेदना एवं कसावट दोनों की दरकार है ।  मेरे हिसाब से थोड़ा छोटी होती एवं अधिक कसावट लिए होती तो बेहतर होता । लंबी रचना अगर गेय ना हो तो मुझे थोड़ा कष्‍ट होता है पढ़ने में

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 6, 2013 at 11:31am

भाई संदीप कुमार पटेल जी,जयपुर जैसे शहर का खांका तो खिंचा, कथ्य भी सारे समाये पर रचना गद्य सी लग रही है |

बहरहाल सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारे 

Comment by विजय मिश्र on June 6, 2013 at 9:59am
दो स्तरों पर विकसित हो रहे इस नई संस्कृति का सार्थक चित्रण और एक कचोट.संदीपजी!
व्यंगभाव से परिपूर्ण एक कटाक्ष युक्त सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकारे .

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 6, 2013 at 7:55am

आदरणीय संदीपजी, आपकी अतुकांत रचनाओं के ऊपर अंतर्निहित अभिव्यक्ति को संयत करने और तदनुरूप संप्रेषित करने का बहुत बड़ा दायित्त्व है.  हो सकता है मैं स्पष्ट नहीं कर पा रहा होऊँ. लेकिन वह कुछ अवश्य है जिससे पद्यांश एक सुगढ़ रचना बनते-बनते रह जाते हैं.

प्रयास के लिए हार्दिक बधाई

Comment by ram shiromani pathak on June 6, 2013 at 12:38am

बहुत ही सुन्दर आधुनिकता पर सुन्दर व्यंग भाई संदीप जी ///हार्दिक बधाई

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 5, 2013 at 10:46pm
आदरणीय..संदीप जी, अति सुंदर रचना आपकी..अपनी पंक्तियों में सच कहा आपने "बेशुध सा आदम भागा जा रहा है " ...आदरणीय बधाई स्वीकार करें

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