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राजनीति (लघु-कथा)

"क्यों..भाई, क्या हुआ ? अतिवृष्टि से चौपट हुयी फसल का, मुआवजा दे रही है न राज्य-सरकार ?" रामभरोस ने बड़ी आशाभरी आवाज से पूछा.

"काकाजी..!! दे तो रही थी, पर विपक्ष के नेताओं ने, अगले महीने चुनाव आता देख, चुनाव-आयोग को शिकायत कर स्टे लगवा दिया.. अब देखो क्या होता है ", नितिन ने बड़ी निराशा से कहा.

"अरे बेटा ! सोच रहे थे, कुछ पैसे मिल जाते तो अगली फसल के लिए खाद पानी का जुगाड़ हो जाता, और दीवाली भी मना लेते...", रामभरोस ने कराहते हुए स्वर में कहा..



      …

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on October 18, 2013 at 12:30am — 25 Comments

किताबें

बड़े जतन से संजोई किताबें 

हार्ड बाउंड किताबें 

पेपरबैक किताबें 

डिमाई और क्राउन साइज़ किताबे 

मोटी किताबें, पतली किताबें 

क्रम से रखी नामी पत्रिकाओं के अंक 

घर में उपेक्षित हो रही हैं अब...

इन किताबों को कोई पलटना नही चाहता 

खोजता हूँ कसबे में पुस्तकालय की संभावनाएं 

समाज के कर्णधारों को बताता हूँ 

स्वस्थ समाज के निर्माण में 

पुस्तकालय की भूमिका के बारे में...

कि किताबें इंसान को अलग करती हैं हैवान से 

कि मेरे पास रखी इन…

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Added by anwar suhail on October 17, 2013 at 9:30pm — 11 Comments

मैडम

यह रचना मात्र हास्य के लिए लिखी गई है। इसका किसी भी व्यक्ति विशेष या जाति विशेष से कोई सरोकार नहीं है। कृपया इसे अन्यथा न लेकर मात्र एक हास्य के रूप में स्वीकार कर अपने आशीर्वाद से अनुग्रहित करें। सादर.....

मैडम

चौबे जी का मामला, लगता डाँवाडोल।

सिर से तो फुटबॉल है, और पेट है ढोल।।…

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Added by Sushil.Joshi on October 17, 2013 at 8:30pm — 24 Comments

वेदना (रवि प्रकाश)

वितान चाँदनी बुने न रात हो सुहावनी,

न बोलते विहंग हों न भोर हो लुभावनी।

बहार की पुकार पे हवा न गीत गा सके,

विमुक्तकण्ठ कोकिला न रागिनी सुना सके।



विलास हो न हास हो उदास हो वसुंधरा,

हताश अंतरिक्ष हो महान मौन से भरा।

वसंत की सुगंध में घुला हुआ विषाद हो,

बयार में,फुहार में विलाप का निनाद हो।



न प्रीत की परंपरा न गीत हो प्रयाण का,

उमंग की तरंग हो न संग हो कृपाण का।

जले न दीपमालिका न इष्ट देवता मिले,

न इन्द्रचाप सी कभी सुदर्श कल्पना… Continue

Added by Ravi Prakash on October 17, 2013 at 7:50pm — 17 Comments

ग़ज़ल; निलेश 'नूर' -झटक के ज़ुल्फ़

1212 1122 1212 22 

 

झटक के ज़ुल्फ़ किसी ने जो ली है अंगडाई,

ये कायनात लगे है हमें कुछ अलसाई.

**

किसी से प्यार न पाया सभी ने ठुकराया,

मिली यहाँ है मुहब्बत में सिर्फ रुसवाई.

**

किये थे रब्त सभी आपने कत’आ मुझसे,

जो कामयाब हुआ तब बढ़ी शनासाई. 

**

बता रहे थे मुझे, एक दिन, सभी पागल,

हुए सभी वो यहाँ लोग, आज सौदाई.

**

मुहब्बतों के सफ़र से ही लौट कर हमनें,

न करिए इश्क़ कभी, बात सबको समझाई.…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 17, 2013 at 3:30pm — 11 Comments


मुख्य प्रबंधक
शातिर (अतुकांत) ---गणेश जी बागी

बादलों से ढँका

नीला नही काला आकाश,

उचाईयों को मापता

उन्मुक्त पंछी,

चट्टान की ओट मे

फाँसने को आतुर बहेलिया,

आहा ! इधर ही आ रहा मूर्ख

फँसेगा, ज़रूर फँसेगा,

ओह ! बच गया,

शायद भांप गया । 



पुनः पेड़ की ओट मे,

वाह ! इधर ही आ रहा दुष्ट

आएगा इस बार

इस तीर की…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 17, 2013 at 3:30pm — 33 Comments

रंगीन पन्ने (लघु कथा)// शुभ्रांशु पाण्डेय

"धत्त्तेरे की... क्या भर देते हैं ये न्यूजपेपरों के बीच में..", मैने एकबारग़ी झल्लाते हुये कहा.



कई रंग-बिरंगे पैम्फलेट मेरे अखबार से निकल कर सरसराते हुए जमीन पर गिरते गये. इन रंगीन पन्नों में बच्चे के प्रेप में एडमिशन से…

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Added by Shubhranshu Pandey on October 17, 2013 at 2:37pm — 26 Comments

कुंडलिया छंद-लक्ष्मण लडीवाला

नारी का अपमान हो,सारे व्यर्थ विधान 
मूक बने शासक जहाँ, बढे  वही  हैवान  |
बढे  वही  हैवान, नहीं रहती मर्यादा 
नारी क्यों बेजान, प्रश्न है सीधा सादा | 
रखना अपना ध्यान, छोड़ दे अब लाचारी  
लेकर दुर्गा रूप, करे परिवर्तन  नारी |    
(2)
रखना धीरज होंसला, बन जायेगी बात,  
मन में उठे विचार तो, सुन लेना हे तात । 
सुन लेना  हे  तात,सुनकर मनन फिर करना 
बन सकती है बात, विद्वजन का…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 17, 2013 at 10:00am — 8 Comments

ग़ज़ल - मेरे महबूब कभी मिलने मिलाने आजा ( सलीम रज़ा रीवा )

मेरे  महबूब  कभी  मिलने  मिलाने  आजा !

मेरी   सोई   हुई   तक़दीर  जगाने   आजा !!

तेरी आमद को समझ लूँगा मुक़द्दर अपना !

रूह बनके मेरी   धड़कन मे समाने आजा !!

मैं तेरे  प्यार  की   खुश्बू  से महक जाऊगा !

गुलशने  दिल को मुहब्बत से सजाने आजा !!

 

तेरी    उम्मीद   लिए    बैठे    हैं    ज़माने  से !

कर  के  वादा  जो  गये  थे वो निभाने आजा !!

बिन तेरे सूना है ख़्वाबो का ख़्यालो का महल !

ऐसी    वीरानगी  …

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Added by SALIM RAZA REWA on October 17, 2013 at 9:30am — 16 Comments

ग़ज़ल -निलेश 'नूर' $अगर राधा न बन पाओ बनो मीरा मुहब्बत में$

१२२२, १२२२, १२२२, १२२२,

**

हुआ है तज्रिबा मत पूछ हम को क्या मुहब्बत में,........पहले तज़ुर्बा लिखा था जो गलत था .. अत: मिसरे में तरमीम की है. 

लगा दीदा ए तर का आब भी मीठा मुहब्बत में.

**

जो चलते देख पाते हम तो शायद बच भी सकते थे,

नज़र का तीर दिल पे जा लगा सीधा मुहब्बत में.

**

ख़ुमारी छाई रहती है, ख़लिश सी दिल में होती है,      

अजब है दर्द जो ख़ुद ही लगे चारा मुहब्बत में.

**

रवायत आज भी भारी ही…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 17, 2013 at 9:00am — 16 Comments

मुक्तक

1.

जो चाहते हो सब मिलेगा, कोशिश करके तो देख,

अंधेरा मिट जायेगा, एक दीप जला करके तो देख,

आंसू बहाने से कभी मंजिल नहीं है मिला करती,

तू मझधार में अपनी नाव कभी उतार करके तो देख।



2..

करके अहसान किसी पर जताया मत कीजिये,

अपने काम को दुनिया में गिनाया मत कीजिये,

मेरे बिना चलेगा नहीं यहां किसी का काम,

ऐसे विचार दिल में कभी लाया मत कीजिये।

3.

आओ अब अंधविश्वासों को भुला कर देखते है,

इस धरा पर प्रेम की गंगा बहा कर देखते…

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Added by Dayaram Methani on October 17, 2013 at 12:00am — 13 Comments

विचारो का बीज.............

हाथ में कुछ बीज

यूँ ही ले के कागजो

पे बोने आ गयी हूँ

विचारो के बीज

सबको कहाँ मिलते हैं

मुझे भी बस एक ही मिला

एक बाग़ लगाना है

इसलिए मुट्ठी

कस कर बंद हैं

इस बीज को वृक्ष

वृक्ष से फिर बीज

इसी तरह

तो लगेगा बाग़

माली ने बताया था

माली वो जो

सबके भीतर हैं

मुझे मिला था

एक रोज जब

उसी ने दिया था

 ये एक बीज

''विचारो का बीज ''

"मौलिक व…

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Added by savita agarwal on October 16, 2013 at 8:30pm — 15 Comments

ग़ज़ल (५) : वो शाइरी सी है !

फ़िदा है रूह उसी पर, जो अजनबी सी है 

वो अनसुनी सी ज़बाँ, बात अनकही सी है//१ 

.

धनक है, अब्र है, बादे-सबा की ख़ुशबू है 

वो बेनज़ीर निहाँ, अधखिली कली सी है//२ 

.

कभी कुर्आन की वो, पाक़ आयतें जैसी 

लगे अजाँ, कभी मंदिर की आरती सी है//३ 

.

ख़फ़ा जो हो तो, लगे चाँदनी भी मद्धम है 

ख़ुदा का नूर है, जन्नत की रौशनी सी है//४ 

.

वो…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 16, 2013 at 5:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल (४) : बताओ माँ, मेरी चादर कहाँ है !

कहाँ है कील, शर, नश्तर कहाँ है

मेरा काँटों भरा, बिस्तर कहाँ है//१

.

उठा के मार, मंदिर में पड़ा ‘वो’  

भला क्या पूछना, पत्थर कहाँ है//२

.

तभी सोंचू के, मैं क्यूँ उड़ रहा हूँ

अमीरों क़र्ज़ का, गट्ठर कहाँ है//३

.

लगे मय पी रहा है, आज वो भी

जहर पीता था, वो शंकर कहाँ है//४

.

बुराई झाँकती है, देख दिल से

छुपा उसको, तेरा अस्तर कहाँ है//५

.

सपोलें मारने से, कुछ न होगा 

चलो खोजें छिपा, अजगर कहाँ…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 16, 2013 at 4:30pm — 19 Comments

तान्या : वो लम्हा चित्रलिखित सा

हर इंसान के जीवन में

एक लम्हा

ऐसा आता है /

वक़्त नहीं थमता,

वह लम्हा

रह जाता है खड़ा हुआ

ज्यों चित्रलिखित सा ।

और कभी

जब चलते चलते

थक जाता है वक़्त

तो

इस लम्हे की छाया में

कुछ देर बैठ कर सुस्ताता है|

और कभी

जब बदली छा जाती है ,

और मन का पंछी

घबरा जाता है

तो यह लम्हा

इन्द्रधनुष सा

आसमान में बिखर जाता है /

और ये मौसम पहले जैसा खुशगवार

फिर हो जाता है ।

मै तो ऐसा…

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Added by ARVIND BHATNAGAR on October 16, 2013 at 4:27pm — 15 Comments

आख़िरी पड़ाव:दीपक पांडेय

तिमिर में जो दीप्ति अवलोकित अंतिम वही ठिकाना

पथ खोजने पड़ेंगे खुद को, नही चलेगा कोई बहाना

कलेवर की पीर भूलकर लक्ष्य प्राप्ति की करों कामना

कर्म को तुम समझो गुरुवर, वेदनाओं को पाहूना



अंगीकार हो जहाँ पर सुख कहलाए वो आशियाना

मानव की काया नश्वर चरित्र ही असली गहना

रण की सफलता दिखलाए हर अराति को आईना

विजय प्राप्त मैं करता जाऊं सभी की यही तमन्ना



थकी भुजाएँ, लक्ष्य ओझल फिर भी अदम्य पराक्रम

अंकुश रहे चित्त पर यद्यपि प्रदर्शित धैर्य व… Continue

Added by DEEPAK PANDEY on October 16, 2013 at 12:45pm — 11 Comments

वक़्त बदला, हैं बदले ख़यालात से ...

ग़ज़ल -

 

२१२  २१२  २१२  २१२ 

 

वक़्त बदला, हैं बदले ख़यालात से 

रौंदता ही रहा हमको लम्हात से  . 

 

क्यों मयस्सर नहीं जिंदगी में सुकूँ 

जूझता ही रहा मैं तो हालात से   . 

 

माँगता था दुआ में तिरी रहमतें

उलझनें सौंप दी तूने इफरात से .

 

जुर्रतें वक़्त की कम हुईं हैं कहाँ 

खेलती ही रहीं मेरे जज़्बात से.

तू बरस कर कहीं भूल जाये न फिर 

भीगता ही रहा पहली बरसात से. 

 

बात…

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Added by dr lalit mohan pant on October 16, 2013 at 11:00am — 16 Comments

आज फिर...वही...

आज फिर एक सफ़र में हूँ...

आज फिर किसी मंज़िल की तलाश में,

किसी का पता ढूँढने,

किसी का पता लेने निकला हूँ,

आज फिर...

सब कुछ वही है...

वही सुस्त रास्ते जो

भोर की लालिमा के साथ रंग बदलते हैं,

वही भीड़

जो धीरे-धीरे व्यस्त होते रास्तों के साथ

व्यस्त हो जाती है,

वही लाल बत्तियाँ

जो घंटों इंतज़ार करवाती हैं,

वही पीली गाड़ियाँ

जो रुक-रुक कर चलती हैं,

कभी हवा से बात करती हैं,

तो कभी साथ चलती अपनी सहेलियों से…

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Added by Manoshi Chatterjee on October 16, 2013 at 8:33am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
देख तो ले तिलमिला कर ( गज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122         2122

खुश हुआ खुद को भुला कर

या कहूँ मै तुझको पा कर

खुद को भी मै ने सताया 

दोस्ती को आजमा कर

ज़िंदगी का बोझ सर पे

चल रहा हूँ लड़खड़ा कर…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on October 16, 2013 at 8:30am — 32 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
रिश्ते (अतुकान्त) // --सौरभ

बर्ताव

बर्ताव का अर्थ -- स्पर्श !

मुलायम नहीं..

गुदाज़ लोथड़ों में

लगातार धँसते जाने की बेरहम ज़िद्दी आदत



तीन-तीन अंधे पहरों में से

कुछेक लम्हें ले लेने भर से…

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Added by Saurabh Pandey on October 16, 2013 at 2:00am — 43 Comments

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