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कुंडलिया छंद-लक्ष्मण लडीवाला

नारी का अपमान हो,सारे व्यर्थ विधान 
मूक बने शासक जहाँ, बढे  वही  हैवान  |
बढे  वही  हैवान, नहीं रहती मर्यादा 
नारी क्यों बेजान, प्रश्न है सीधा सादा | 
रखना अपना ध्यान, छोड़ दे अब लाचारी  
लेकर दुर्गा रूप, करे परिवर्तन  नारी |    
(2)
रखना धीरज होंसला, बन जायेगी बात,  
मन में उठे विचार तो, सुन लेना हे तात । 
सुन लेना  हे  तात,सुनकर मनन फिर करना 
बन सकती है बात, विद्वजन का यह कहना 
कहते है  कविराय, उचित लगे वही करना,        
सब संभव हो पाय, धीरज सदा ही रखना।   
(मौलिक व् अप्रकाशित)
 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 19, 2013 at 11:35am

कुंडलिया छंद के भाव पसंद करने और कमियों की ओर ध्यान दिलाने के लिए हार्दिक आभार श्री सुशिल जोशी जी | 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 19, 2013 at 11:31am

सभी सुधि पाठको का हार्दिक आभार | 

Comment by वेदिका on October 18, 2013 at 5:08pm

सुन लेना  हे तात, सुनकर मनन फिर करना//

मनन सुनकर ही करना !!

बधाई !!

Comment by Sushil.Joshi on October 17, 2013 at 9:02pm

बहुत ही सुंदर भावों से सुसज्जित कुंडलिया छंद बने हैं आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी.... बधाई हो..... किंतु प्रथम छंद में रोला की तृतीय पंक्ति के सम चरण में मात्रा दोष प्रतीत हो रहा है.... शायद कोई वर्ण छूट गया लगता है..... कृपया पुन: जाँच लें.....

रखना अपना ध्यान, छोड़ दे लाचारी

इसी प्रकार दूसरे छंद में भी रोला की प्रथम पंक्ति के सम चरण में मात्राओं का योग 14 हो रहा है....

सुन लेना  हे  तात, सुनने में नहीं  बुराई,  

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 17, 2013 at 4:23pm

 नर नारी दोनों को अच्छी सीख दी बधाई  लक्ष्मण भाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 17, 2013 at 1:59pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई सुन्दर कुंडलियाँ के लिये आपको हार्दिक बधाई !!!!!

Comment by Sarita Bhatia on October 17, 2013 at 1:04pm

हार्दिक बधाई भाई लक्ष्मण जी 

Comment by Shyam Narain Verma on October 17, 2013 at 12:19pm
भावनाओं से ओतप्रोत रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें.... 

कृपया ध्यान दे...

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